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भगवान बाहुबली का महामस्तकाभिषेक : जानिए कौन थे भगवान बाहुबली और क्या थे 4 प्रमुख उपदेश

जैन महाकुंभ 2018 की शुरुआत पवित्र तीर्थस्थल धर्म के पवित्र तीर्थस्थल त्रवणबेलगोला हो चुकी है। भगवान बाहुबली के महामस्तकाभिषेक का कार्यक्रम 12 साल में एक बार होता है। हर 12 वें साल में होने वाले महामस्तकाभिषेक कार्यक्रम में भगवान बाहुबली का अभिषेक किया जाता है।

श्रवणबेलगोला में जैन महाकुंभ शुरू,
श्रवणबेलगोला में जैन महाकुंभ शुरू,

भगवान बाहुबली के मस्तकाभिषेक के का कार्यक्रम 20 दिनों तक चलेगा। लेकिन क्या आपको पता है कि भगवान बाहुबली कौन थे। जैन धर्म के पहले तीर्थंकर ऋषभ देव थे। जैन धर्म के अनुसार तीर्थंकर नामक एक प्रकार का पुण्यकर्म होता है। तीर्थंकर वह कहलाता है जो काम, क्रोध, लोभ, मोह और इर्ष्या आदि पर विजय प्राप्त की हो।

ऋषभदेव

जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के दो पुत्र हुए जिसमें एक का नाम भारत और दूसरे का नाम बाहुबली था। भगवान बाहुबली को विष्णु का अवतार माना जाता है। जैन धर्म के अनुसार वे अयोध्या के राजा थे और उनकी दो रानियाँ थीं। उनमें से एक रानी से 99 पुत्र और एक पुत्री की प्राप्ति हुई थी। दूसरी रानी से गोम्म्टेश्वर भगवान बाहुबली और एक सुन्दरी पुत्री हुई थी।

भगवान बाहुबली

बाहुबली अपने भाई भरत से भरत से उनके शासन, सत्ता के लोभ और चक्रवर्ती बनने की इच्छा के कारण दृष्टि युद्ध, जल युद्ध और मल्ल युद्ध हुआ था। इसमें बाहुबली विजयी रहे, लेकिन उनका मन ग्लानि से भर गया और उन्होंने सब कुछ त्यागकर तप करने का निर्णय लिया। अत्यंत कठोर तपस्या के बाद मोक्ष को प्राप्त हुए।

4 प्रमुख उपदेश

जैन धर्म में भगवान बाहुबली को पहला मोक्षगामी माना जाता है। भगवान बाहुबली ने इंसान के अध्यात्मिक उत्थान के साथ-साथ मानसिक शांति के लिए चार प्रमुख बताई थी।  जैन अनुयायी के अनुसार यही हमारी काशी है। यही हमारा कुंभ है। इस आयोजन में जैन ही नहीं बल्कि दूसरे धर्म, संप्रदाय के लोग भी हिस्सा लेते हैं। महामस्तकाभिषेक के दौरान यहां जैन साधु, मुनि, त्यागी, संत, माताएं सभी होती हैं। भगवान बाहुबली के सत्य,अहिंसा और शांति के रास्ते पर चलने का संदेश देती हैं, ताकि विश्व के मानव समाज में शांति की स्थापना की जा सके।

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