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देश में चिटफंड स्कीमों पर बैन, मोदी कैबिनेट का बड़ा फैसला

नई दिल्ली,  केंद्र सरकार ने छोटे निवेशकों की हितों की रक्षा के लिए अनिगमित जमा योजना प्रतिषेध विधेयक 2018 तथा चिट फंड (संशोधन) विधेयक 2018 को मंजूरी दे है जिसमें पोंजी स्कीमों को पूरी तरह से प्रतिबंधित किया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आज यहां हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में दोनों विधेयकों के मसौदे तथा इन्हें संसद पेश करने के प्रस्ताव का अनुमोदन किया गया। अनिगमित जमा योजना प्रतिषेध विधेयक 2018 अनिगमित जमा योजनाओं को पूरी तरह से प्रतिबंधित करने का प्रस्ताव किया गया है।

इसका मकसद देश में अवैध रुप से जमा योजनाओं पर रोक लगाना है। इसमें इस तरह की जमा योजनाएं चलाने वाली कंपनियों और लोगों के खिलाफ कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है। इस तरह के प्रावधान करने की घोषणा वित्त वर्ष 2016-17 के आम बजट में की गयी थी। अवैध जमा योजनाओं से प्रभावित ज्यादातर ऐसे लोग गरीब और वंचित होते हैंं जिनकी निगमित जमा तंत्र तक पहुंच नहीं होती है।

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चिट फंड (संशोधन) विधेयक 2018 में इससे संबंधित उद्योग की ढ़ांचागत अड़चनें दूर करने और इसे विकसित करने के लिए नए प्रावधान किए गए हैं। इसके जरिए चिट फंड अधिनियम 2018 में संशोधन किया जाएगा। इससे चिट फंड कंपनियां नए वित्तीय उत्पाद बाजार में उतार सकेंगी। संशोधन के जरिए चिट फंड कंपनियों की संचालन प्रक्रिया में बदलाव किया गया है।

महानदी जल विवाद समाधान के लिए बनेगा प्राधिकरण
सरकार ने ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच महानदी जल विवाद के निपटारे के लिए प्राधिकरण के गठन की आज मंजूरी दे दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल की आज यहाँ हुई बैठक में इसकी मंजूरी दी गयी। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, ओडिशा के अनुरोध पर “महानदी जल विवाद प्राधिकरण” के गठन के प्रस्ताव को मंजूरी दी गयी है।

प्राधिकरण महानदी के बेसिन में उपलब्ध पानी की मात्रा, बेसिन में स्थित सभी राज्यों के योगदान, उनमें पानी के मौजूदा इस्तेमाल तथा भविष्य में विकास की संभावनाओं के आधार पर राज्यों के बीच जल बँटवारे पर फैसला करेगा। उम्मीद है कि प्राधिकरण के फैसले से ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच लंबे समय से चले आ रहे विवाद पर विराम लग जायेगा।

प्राधिकरण का गठन अंतर राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत किया गया है। अधिनियम के अनुसार, प्राधिकरण में अध्यक्ष के साथ दो और सदस्य होंगे जिनका मनोनयन प्रधान न्यायाधीश करेंगे। सभी सदस्य उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश होंगे। प्राधिकरण को अपनी रिपोर्ट सौंपने तथा फैसला देने के लिए तीन साल का समय दिया जायेगा जिसे अपरिहार्य परिस्थितियों में दो साल के लिए बढ़ाया भी जा सकता है।

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