क्या बेरोजगारी का मुद्दा देश की राजनीति का प्रमुख मुद्दा बनेगा ?

by Yogendra Yadav
क्या हम एक राष्ट्रव्यापी युवा आंदोलन की शुरुआत देख रहे हैं? क्या दुनिया के इस सबसे युवा देश में युवाओं के मुद्दे और उनकी ऊर्जा वर्तमान राजनीति को संचालित करेगी?पिछले एक सप्ताह से एसएससी विरोधी आंदोलन के कारण यह सवाल बहुत लोगों के मन में आया है. अगर इसका सिरा पकड़े रखें, तो यह सवाल हमें हमारी व्यवस्था के पूरे सच को उजागर करने में मदद देता है. पहले पायदान पर खड़े होकर देखें, तो यह मामला छोटा सा है. केंद्र सरकार के स्टाफ सलेक्शन कमीशन (एसएससी) की सीजीएल नामक परीक्षा के कुछ केंद्रों पर धांधली होने का आरोप था. इस धांधली के कुछ प्रमाण भी परीक्षार्थियों के हाथ लग गये.

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इस मुद्दे पर परीक्षार्थियों ने सीबीआई द्वारा स्वतंत्र निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की मांग को लेकर एसएससी के दफ्तर के बाहर मोर्चा संभाल लिया. पिछले एक सप्ताह में यह विरोध प्रदर्शन अब एक बड़ा रूप धारण कर चुका है. शुरुआत में एक विरोध प्रदर्शन के लिए इकट्ठे हुए युवा पिछले आठ-दस दिनों से वहीं दिन-रात टिके हुए हैं. सोशल मीडिया पर हजारों युवाओं ने इस आंदोलन का जमकर समर्थन करना शुरू किया. फिर अलग-अलग शहरों में इस आंदोलन के पक्ष में युवा संगठनों ने प्रदर्शन शुरू कर दिया है. अब तक जयपुर, लखनऊ, इलाहाबाद, रायबरेली, बनारस, पटना, भोपाल, बंेगलुरु और अन्य अनेक शहरों में प्रदर्शन हो चुके हैं।

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इस घटना से एक राष्ट्रव्यापी युवा आंदोलन की सुगबुगाहट महसूस होने लगी है. कई लोगों को गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन और बिहार आंदोलन की याद आने लगी है, जहां एक छोटे से मुद्दे से शुरू होकर एकाएक एक बड़ा युवा आंदोलन खड़ा हो गया था.ऐसे क्यों हुआ? यह सवाल हमें दूसरी पायदान पर उतरने को विवश करता है. हम पाते हैं कि यह मामला इतना छोटा भी नहीं था. केंद्र सरकार की यह संस्था सरकारी नौकरियों की हजारों नौकरियों की कई परीक्षाएं कराती है.इनमें परीक्षार्थियों की संख्या एक करोड़ से भी अधिक है. जिस सीजीएल परीक्षा में धांधली के सवाल पर आंदोलन शुरू हुआ था, उसमें कुल 8,000 नियुक्तियां होनी थी, जिसके लिए कोई 30 लाख लोगों ने आवेदन किया था. यूं भी एसएससी में घपले और घोटाले की यह कोई पहली शिकायत नहीं है.।

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पिछले कई सालों में एसएससी द्वारा आयोजित अनेक परीक्षाओं के बारे में शिकायतें आती रही है. एक बड़ी शिकायत एसएससी द्वारा परीक्षाएं आयोजित करने का ठेका एक प्राइवेट कंपनी को दिये जाने के बारे में है. यह कंपनी अनेक व्यावसायिक संस्थानों को परीक्षा केंद्र बना देती है. परीक्षा कैसे ली जा रही है, इस पर एसएससी का कोई नियंत्रण नहीं होता है. कई-कई साल तक परीक्षाएं टाली जाती हैं और परिणाम आने के बाद भी नियुक्ति पत्र नहीं मिलते. नौकरी में ज्वॉइनिंग नहीं करवायी जाती. कुल मिलाकर अंधेरगर्दी है. लेकिन, आज तक एसएससी इन शिकायतों के निवारण की कोई व्यवस्था नहीं बना पायी है.एक पायदान और उतरें, तो हम पायेंगे कि यह समस्या किसी एक संस्था या किसी एक सरकार तक सीमित नहीं है. केंद्र सरकार के साथ-साथ लगभग सभी राज्य सरकारों में भी नौकरियों की नियुक्ति में बड़े पैमाने पर धांधली की शिकायत आती रहती है.।

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मध्य प्रदेश का व्यापम कांड प्रसिद्ध हो गया. लेकिन सच यह है कि हर राज्य के अपने-अपने व्यापम हैं. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार के समय उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा की गयी नियुक्तियों में धांधली का मामला देश के सामने आया था. हाल ही में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में नियुक्ति के मामले में हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिकारियों की मिली-भगत का मामला सामने आया है. ध्यान से देखेंगे, तो हर राज्य में हर महीने ऐसा कोई ना कोई कांड खुलता रहता है. सरकारी नौकरियां बहुत कम हैं और उम्मीदवार बेहिसाब. इसलिए जाहिर है, इन चंद नौकरियों के लिए जानलेवा प्रतिस्पर्धा होती है. विद्यार्थी अपनी औपचारिक पढ़ाई को छोड़कर कई-कई साल तक तैयारी करते हैं, मां बाप के सीमित संसाधन में से किसी तरह पैसा निकालकर कोचिंग लेते हैं. सामान्य घर से आनेवाले इन विद्यार्थियों की पूरी जवानी इसी चक्कर में बीत जाती है. ।

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इसलिए जब इन परीक्षाओं में धांधली की बात सामने आती है, तो युवाओं के आक्रोश की कोई सीमा नहीं बचती.एक सीढ़ी और गहराई में जाने पर हम देखते हैं कि यह समस्या सिर्फ सरकारी नौकरियों में धांधली की नहीं है. इस समस्या की जड़ में है देश में व्यापक बेरोजगारी. हर साल कोई एक करोड़ युवा रोजगार के बाजार में उतरते हैं और हमारी व्यवस्था इनमें से मुट्ठी भर को ही कायदे का रोजगार दे पाती है. आंकड़ों में देखें, तो देश में आर्थिक वृद्धि हुई है. लेकिन, इसका रत्तीभर भी असर रोजगार के अवसरों में वृद्धि के रूप में दिखायी नहीं देता. रोजगार की तलाश में घूम रहे अधिकांश युवाओं को किसी ना किसी कच्ची नौकरी से संतोष करना पड़ता है. या तो असंगठित क्षेत्र की नौकरी, जिसमें जब मालिक का मन हुआ लगाया और जब मन हुआ हटा दिया. या फिर पिछले दो दशक में इसी कच्ची नौकरी के नये स्वरूप यानी कॉन्ट्रैक्ट की नौकरी. प्राइवेट सेक्टर ही नहीं, सरकारी नौकरी में भी अब इन्हीं अस्थायी कॉन्ट्रैक्ट नौकरियों की भरमार है. ।

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कहने को यहां नियुक्ति पत्र मिलता है, बैंक में वेतन भी मिलता है. लेकिन, व्यवहार में यह नौकरी असंगठित क्षेत्र की कच्ची नौकरी से बहुत अलग नहीं है. जिन्हें ये भी नसीब नहीं होता, वे बेरोजगारों की फौज में गिने जाते हैं. सचमुच बेरोजगारों की संख्या इस औपचारिक आंकड़े से बहुत अधिक है. एसएससी दफ्तर के बाहर शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन सिर्फ एसएससी नामक संस्था के विरुद्ध नहीं है. यह विरोध सिर्फ धांधली और भ्रष्टाचार के विरुद्ध ही नहीं, इस व्यवस्था के विरुद्ध है, जो नियमित रूप से बेरोजगारी को जन्म देती है.।सीबीआई द्वारा जांच की मांग में कहीं न कहीं इस व्यवस्था की पड़ताल की इच्छा दबी हुई है. जरूरत है इन अंतर्संबंधों का खुलासा करनेवाली दृष्टि और संगठन की. अगर हॉस्टल मेस के खाने की पड़ताल से शुरू हुआ नवनिर्माण आंदोलन गुजरात में सत्ता की जड़ हिला सकता है, तो एसएससी घोटाले के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन हमारी राजनीति के ढर्रे को बदल सकता है.।

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