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चीन और पाकिस्तान की सेनाओं की आधुनिकीकरण की तेज गति और सीमाओं पर बढ़ती आक्रामकता भारत के लिए गंभीर परेशानी चुनौती

देश की पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं पर बनी हुई युद्ध की चुनौती के बीच सेनाओं के आधुनिकीकरण की रफ्तार बेहद धीमी है। हालात ज्यादा चिंताजनक इसलिए हो गए हैं। क्योंकि चीन और पाकिस्तान इस मामले में काफी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। यह जानकारी मंगलवार को संसद में पेश की गई रक्षा मामलों की स्थायी समिति की रिपोर्ट में दी गई है।
समिति ने इस बाबत भारत की धीमी प्रगति के लिए रक्षा मंत्रालय को कड़ी फटकार लगायी है। साथ ही तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा है कि चीन और पाकिस्तान की सेनाओं की आधुनिकीकरण की तेज गति और सीमाओं पर बढ़ती आक्रामकता भारत के लिए गंभीर परेशानी का सबब बन सकती है। इसलिए इसे दुरुस्त करने के लिए तत्काल सुधारात्मक कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।
सरकार द्वारा आधुनिकीकरण व अन्य सैन्य जरुरतों को पूरा करने के लिए आवंटित की गई पूंजीगत बजट राशि में समिति ने कुल 12 हजार 296 करोड़ रुपए की कमी के तथ्य को उजागर किया है। पूंजीगत बजट से ही सेनाओं की सामरिक तैयारियों को अमलीजामा पहनाया जाता है।  
सरकार तय करे प्राथमिकता 
रक्षा मामलों की स्थायी समिति के अध्यक्ष मेजर जनरल बी़ सी़ खंडूरी ने  बातचीत में कहा कि किसी भी देश द्वारा अपनी सैन्य तैयारियों को बेहतर करने के लिए मौजूदा और भावी खतरे को ध्यान में रखकर योजनाएं बनायी जाती हैं। भारत में भी यही हो रहा है।
लेकिन समिति द्वारा विषयों का आकलन करते वक्त हमने कुछ ऐसे बिंदुओं पर सरकार का ध्यान दिलाने की कोशिश की है। जो उसकी जानकारी से या तो छूट गए या काफी दूर रह गए हैं। रिपोर्ट संसद के पटल पर रखे जाने के बाद अब यह सरकार पर है कि वह इन्हें प्राथमिकता में शामिल करके जरुरी कदम उठाए।
बजट को बताया नाकाफी 
समिति का कहना है कि दो मोर्चों पर युद्ध की चुनौती के अलावा भारत दक्षिण-एशियाई क्षेत्र में भी सुरक्षा कवर प्रदान करता है। लेकिन इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए आवंटित किया गया मौजूदा बजट बेहद कम है। कुछ मामलों का उदाहरण लें, तो उनमें की गई बढ़ोतरी मंहगाई और टैक्स पूर्ति के लिए भी पर्याप्त नहीं है।
आधुनिकीकरण के लिए दी गई 21 हजार 338 करोड़ रुपए की राशि पहले से तय व जारी 125 योजनाओं व आपात खरीद के लिए निधार्रित 29 हजार 33 करोड़ रुपए के भुगतान के तर्क के सामने नाकाफी नजर आती है। साथ ही 2017 की वचनबद्ध देनदारियां भी 2018 को हस्तांतरित की गई हैं।
अब इन्हें पूरा करते-करते नई योजनाओं के लिए पैसा खर्च हो पाना मुश्किल नजर आता है। इसलिए यह समस्या और जटिल हो गई है। जीएसटी की वजह से भी विभाग पर 5 हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्त भार पड़ा है। सैन्य ठिकानों पर बढ़ते फिदायीन हमलों के चलते उप-सेनाप्रमुख को दिए गए वित्तीय खर्च अधिकारों को लेकर भी राशि का आवंटन बजट में नहीं किया गया है। 
68 फीसदी हथियार पुराने 
सेनाओं के पास 68 फीसदी हथियार पुरानी श्रेणी के हैं, 24 फीसदी वर्तमान श्रेणी के हैं और मात्र 8 फीसदी स्टेट ऑफ द आर्ट हैं। मेक इन इंडिया अभियान की रफ्तार भी बेहद धीमी है।सेना ने अभियान के तहत 25 प्रोजेक्ट तय किए। लेकिन उनके लिए बजट अपर्याप्त था। ऐसे में ज्यादातर को सेना को जबरदस्ती बंद करना पड़ा। मौजूदा आवंटित बजट को देखने पर सामरिक भागीदारी मॉडल के भविष्य पर भी सवालिया निशान लगता हुआ नजर आ रहा है।
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