इस गांव हर कुत्ता हैं जमींदार, यह कुत्तें वर्षों से कर रहे हैं करोड़ों की कमाई !

गुजरात के इन करोड़पति कुत्तों ने दुनिया को डाल दिया हैरानी में

मेहसाणा ।  आज के दौर में इंसान पैसों के पीछे भाग रहा है। पैसा ऐसी चीज है जिसके बिना जीवन जीना मुश्किल है। जहां पैसों के चलते इंसान ही इंसान का दुश्मन बनता जा रहा है इसी बीच गुजरात के करोड़पति कुत्तों ने दुनिया को हैरानी में डाल दिया है। लोग सोचने को मजबूर हो गए हैं कि क्या वाकई कोई कुत्ता करोड़पति बन सकता है। दरअसल गुजरात के मेहसाणा स्थित पंचोट गांव के जमींदार कुत्ते हैं। यह कुत्तें वर्षों से करोड़ों की कमाई कर रहे हैं।
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पंचोट गांव में ‘मढ़ नी पती कुतरिया ट्रस्ट’ है जिसके पास 21 बीघा जमीन है। इसकी कीमत 3.5 करोड़ रुपए प्रति बीघा है। इस जमीन से होने वाली सारी आय इन कुत्तों के नाम कर दी जाती है। ट्रस्ट के पास करीब 70 कुत्ते हैं जिस हिसाब से यहां का हर कुत्ता 1 करोड़ रुपए का मालिक है। ट्रस्ट के अध्यक्ष छगनभाई पटेल के अनुसार कुत्तों के लिए अलग हिस्सा रखने की परंपरा सदियों पुरानी है। इस परंपरा की शुरुआत अमीरों ने जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों को दान करके की थी। पटेल ने बताया कि उन दिनों जमीन की कीमत ज्यादा नहीं हुआ करती थी। कुछ मामलों में लोगों ने टैक्स ना चुका पाने की परिस्थिति में जमीन दान की थी।
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पटेल किसानों के एक समूह ने 70-80 साल पहले जमीन का रख-रखाव करना शुरू किया था। 70 साल पहले यह जमीन ट्रस्ट के पास आई थी। गांव के विकास के साथ ही जमीन के दाम बढ़ने शरू हो गए। जिसके बाद लोगों ने लोगों ने जमीन दान करना बंद कर दिया। फिलहाल जो जमीनें दान की गईं उनके लिए कोई कागजी कार्रवाई नहीं हुई और आज भी कागजों में उनके मालिकों का नाम ही दर्ज है।
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फसल बुवाई से पहले ट्रस्ट अपने हिस्से के एक प्लॉट की हर साल नीलामी करता है। जो शख्स सबसे ज्यादा बोली लगाता उसे एक साल के लिए उस प्लॉट पर जुताई का हक मिल जाता है। नीलामी से मिलने वाली रकम करीब 1 लाख के आसपास होती है जिसे कुत्तों की सेवा में खर्च कर दिया जाता है। इसके साथ ही ट्रस्ट के लोग हर जानवर और पक्षी का ख्याल रखते हैं। ट्रस्ट को हर साल करीब 500 किलो दान में अनाज मिलता हैं। जिससे वे पक्षियों की देखभाल करते हैं। गांव में ही बने एक अन्य ट्रस्ट ‘अबोला’ ने गायों के इलाज के लिए एक एसी वॉर्ड खोल रखा है। इसके अलावा बंदर, पक्षी और अन्य पशुओं के इलाज की भी व्यवस्था है।

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