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काशी में बना है अविभाजित भारत के मानचित्र वाला अनोखा मंदिर, जानिए इसकी खासियत

वाराणसीः आज हम आपको वाराणसी में बने एक अनोखे ‘भारत माता मंदिर’ के बारे में बताने जा रहे हैं जहां दुनिया भर  से ऐसे मंदिर को जिसे जानने और समझने के साथ दर्शन पूजन के लिए  पर्यटक और श्रद्धालु आते हैं जहां संगमरमर पर अविभाजित भारत का नक्शा बना हुआ है। यह मंदिर विदेशियों को बहुत आकर्षित कर रहा है।राष्ट्र रत्न बाबू शिवप्रसाद गुप्त को 1913 में करांची से लौटते हुए मुम्बई जाने का अवसर मिला था। वहां से वह पुणे गए और धोंडो केशव कर्वे का विधवा आश्रम देखा।

'भारत माता' 123
‘भारत माता’ 123

आश्रम में जमीन पर ‘भारत माता’ का एक मानचित्र बना था, जिसमें मिट्टी से पहाड़ एवं नदियां बनी थीं। वहां से लौटने के बाद शिवप्रसाद ने इसी तरह का मंदिर बनाने का विचार किया। उस समय के प्रख्यात इंजीनियर दुर्गा प्रसाद इस मंदिर को बनवाने के लिए तैयार हो गए। इस मंदिर को शिवप्रसाद ने 1918 से 1924 के बीच बनवाया था। इसका उद्घाटन 25 अक्तूबर,1936 को महात्मा गांधी ने किया था।

इस मंदिर का निर्माण 30 मजदूर और 25 राजमिस्त्री ने मिलकर किया, जिनके नाम दीवार पर उकरे हुए हैं। इस मंदिर के मध्य में मकराना संगमरमर पर अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, बर्मा (अब म्यामांर) और सेलोन (अब श्रीलंका) समेत अविभाजित भारत का एक मानचित्र है। मानचित्र की खासियत ये है कि इसमें करीब 450 पर्वत श्रृंखलाओं, चोटियों, मैदानों, जलाशयों, नदियों, महासागरों और पठारों समेत कई भौगोलिक ढांचों का बारीकी से नक्शा बनाया गया है। मंदिर के नीचे ऐसी भी एक जगह है जहां से इस मानचित्र पर उकेरी गई पर्वत श्रृंखला और नदियों को आसानी से देखा और महसूस किया जा सकता है।

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इस अनोखे मंदिर के गेट पर ही भारतीय संस्कृति और देश प्रेम की झलक देखने को मिलती है। जब हम मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुंचते है तो सबसे पहले भारत का राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ लिखा दिखता है। भारत माता मंदिर में राष्ट्र कवि मैथलीशरण गुप्ता ने एक कविता भी लिखी थी जो मंदिर में अभी भी नजर आती है। इस कविता का सार देशवाशियों को एकता के धागे में पिरोना है। देश के एकमात्र भारत माता मंदिर में पुरानी लिपियां भी बनाईं गई हैं जो देश के गौरवशाली इतिहास को दर्शाती हैं। इस अनोखे मंदिर के दर्शन के लिए देश ही नहीं विदेश से भी भारी संख्या में पर्यटक आते हैं।

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टूरिस्ट गाइड बताते हैं कि जब वह भारत माता मंदिर सैलानियों को जाने के लिए कहते हैं तो उन्हें लगता है हम किसी देवी या देवता के मंदिर घुमाने ले जा रहे हैं। लेकिन जब वह यहां आते हैं तो इस मंदिर को देखते ही आकर्षित हो जाते हैं। इतना ही नहीं वह मंदिर की खूब सराहना करते हैं। ऐसे में हम लोगों को भी बहुत गर्व महसूस होता है।

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