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अभी मैं जिंदा हूं

Tweetरिपोर्ट- केशवा नन्द शुक्ला सरकार प्रदेश भर में वृद्ध व निराश्रित लोगों की देखभाल करने के लिये करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रही है। विश्व बैंक से लेकर तमाम ऑर्गनाइजेशन अलग अलग योजना चलाकर उनके हित की बात कर रहे है। मगर इसके उलट जमीनी स्तर पर इसकी हकीकत कुछ और ही है। आंख […]

रिपोर्ट- केशवा नन्द शुक्ला
सरकार प्रदेश भर में वृद्ध व निराश्रित लोगों की देखभाल करने के लिये करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रही है। विश्व बैंक से लेकर तमाम ऑर्गनाइजेशन अलग अलग योजना चलाकर उनके हित की बात कर रहे है। मगर इसके उलट जमीनी स्तर पर इसकी हकीकत कुछ और ही है। आंख मूंद कर काम करने वाले अधिकारी व कर्मचारी जीवित को  मृत बताकर उसकी पेंशन बन्द कर दे रहे हैं। आफिस में बैठे बैठे ही असहाय विधवा वृद्धा को कागजो पर मार डालने वाले इन अधिकारियों की मानवता दर दर की ठोकरें खा रही बूढ़ी नम आंखों को देख कर भी नही जागी।
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तस्वीरों में जिस वृद्ध लाचार महिला को आप देख रहे है । दरअसल वो दो साल पहले ही मर चुकी है । सामने आने पर भी सरकारी बाबू इन्हें जीवित मानने को तैयार नही है। ये हम नही खुद सरकारी कागज बता रहे हैं। इनका नाम भगवत देइ है। और यह जिले की डलमऊ तहसील क्षेत्र के मुरैठी गांव को रहने वाली हैं। कुछ समय पहले इनके पति की म्रुत्यु हो गयी तो इनके ऊपर गमों का पहाड़ टूट पड़ा, मगर इनको सरकार की तरफ से विधवा पेंशन मिलने लगी तो इनको लगा कि इनका वृद्धा अवस्था मे किसी के आगे हाँथ नहीं फैलाने पड़ेंगे।
मगर जिले के अधिकारियों ने ऐसी कलम चलाई की अभिलेखों में भगवत देइ को जीते जी मार दिया गया।
वृद्धा भगवत देइ की माने तो लगभग दो वर्ष पूर्व उनके घर मे ब्लाक से सेक्रेटरी साहब कोई सर्वे करने आये और उनसे दस्तखत करवाये तभी से उनकी पेंशन आना बंद हो गयी। अब जब वह ब्लाक व तहसील से लेकर जिले के आलाधिकारियों के चक्कर लगाती हैं तो उनको यह कह कर वायस कर दिया जाता है कि आप तो मर चुकी हैं इसलिए आप की पेंशन बन्द कर दी गयी है। अब बेचारी वृद्धा को जिले के अधिकारियों व कर्मचारियों के सामने खुद के जिंदा होने का सबूत देना पड़ रहा है और अधिकारी है कि मानते ही नही।
मानवता को शर्मसार करती इस घटना को जरा नजदीक से देखिए। बूढ़ी चश्मा लगी आंखों से बहता पानी, हाथ मे आधार कार्ड और एप्लिकेशन लेकर रोजाना जिलाधिकरी/मुख्य विकास अधिकारी के सामने चक्कर मारते समय उम्मीद की किरण रोजाना सुबह जलती है तो शाम को फड़फड़ा कर बुझ जाती है। अधिकारी रोज एक लालीपाप देकर वापस कर देते है कि रिपोर्ट आ जाये तो मानू। ऐसे में बेसहारा का सहारा बनी सरकार के कारिंदे ही बुजुर्ग महिला को साक्षात काल नजर आते है।
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