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जानिये शारदीय नवरात्र कलश स्थापना मुहूर्त , पूजन और उपवास का विधान

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नवरात्र उपवास का विधान शरीर को शुद्ध कर और ऋतु परिवर्तन के कारण होने वाले रोगों से मुक्ति पाने के लिए ही है। रामचरितमानस में स्पष्ट लिखा है ‘‘छिति, जल पावक, गगन, समीरा, पंचरचित यह अघम शरीरा ’’ अर्थात मानव शरीर धरती, जल, अग्नि, आकाश और वायु से बना है। इनमें से चार तत्व हम भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं जबकि आकाश तत्व मात्र उपवास द्वारा ही शरीर ग्रहण करते है। जबकि आकाश तत्व उपवास द्वारा ही शरीर ग्रहण करता है।
नवरात्र ऋतु परिवर्तन के संधि काल पर पड़ता है। चैत्र माह में ऋतु शिशिर से ग्रीष्म की ओर आती है और आश्विन माह में ऋतु ग्रीष्म से शिशिर की ओर बढ़ती है। इस ऋतु परिवर्तन के कारण शरीर को रोग घेर लेते है। यदि उपवास द्वारा शरीर का शोधन कर लिया जाए तो रोगों का आक्रमण अगले नवरात्र तक नहीं होगा। नवरात्र उपवासों का यही मूल उद्देश्य है। हमारे ऋषि-मुनियों ने इसे धार्मिक रूप देकर हमारे संस्कारों में शामिल किया है।

इस वर्ष यह तिथि 10 अक्टूबर को है। शास्त्रों में बताया गया है कि नवरात्र के पहले दिन शुभ मुहूर्त में कलश स्थापित करने के बाद नवग्रहों, पंचदेवता, ग्राम और नगर देवता की पूजा के बाद विधि-विधान से माता की पूजा करनी चाहिए। ऐसी मान्यता है कि मंगल कलश की स्थापना से नवरात्र में देवी पूजन सफल और फलदायक होता है।

इसलिए बड़े-बड़े पंडालों से लेकर सामान्य गृहस्थ तक अपने घर में कलश बैठाते हैं। कलश की स्थापना से यह भी पता चलता है कि आपके लिए आने वाला साल कैसा रहेगा।

इसलिए शुभ मुहूर्त में ही कलश की स्थापना करनी चाहिए।नवरात्र कलश स्थापना शुभ मुहूर्तइस साल कलश स्थापित करने का शुभ मुहूर्त सुबह 7 बजकर 26 मिनट तक है। अगर इस समय तक कलश नहीं बैठा पाते हैं तो फिर आपको दोपहर तक का इंतजार करना होगा। दोपहर में अभिजित मुहूर्त 11 बजकर 51 मिनट से लेकर 12 बजकर 39 मिनट तक रहेगा। इस दौरान नवरात्र पूजन के लिए कलश स्थापित किया जा सकता है।पंचांग के अनुसार इस वर्ष सुबह 7 बजकर 26 मिनट तक ही प्रतिपदा तिथि है।

 शुभ मुहूर्त में ही कलश की स्थापना
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इसके बाद द्वितीय तिथि लग जाएगी लेकिन द्वितीया तिथि को क्षय माना जाएगा क्योंकि सूर्योदय के समय प्रतिपदा तिथि रहेगी इससे परे दिन प्रतिपदा तिथि ही मान्य रहेगी। ऐसे में घट स्थापना के लिए सबसे उत्तम समय प्रातः 7 बजकर 26 मिनट तक है।

क्या कहते हैं शास्त्र जानेंधर्मसिंधु नामक ग्रंथ के अनुसार- स च नवरात्रारम्भः सूर्योदयोत्तरं त्रिमुहूर्त्तव्यापिन्यां प्रतिपदाकार्याः। तदभावे द्विमुहूर्त्तव्यापिन्यामपि, क्वचिन्मुहूर्त्तमात्र-व्यापिनयामपि उक्तः। सर्वथा दर्शयुक्त्तप्रतिपदि न कार्यः इति बहुग्रंथः सम्मतम्।।यानी प्रतिपदा त्रिमुहूर्त्त-व्यापिनी ना हो तब द्विमुहूर्त व्यापिनी में, यदि द्विमुहूर्त व्यापिनी ना हो तब एक मुहूर्त व्यापिनी में भी नवरात्र आरंभ कर लेना चाहिए।

इस साल 10 अक्टूबर को बुधवार को सूर्योदय बाद 2 घड़ी 18 पल तक ही प्रतिपदा तिथि है। फिर भी शास्त्रों के नियमानुसार सूर्योदय व्यापिनी प्रतिपदा होने से इसी दिन नवरात्र आरंभ हो रहा है।

नवरात्र में नौ दिनों का उपवास विधि विधान के अनुसार ही रखना चाहिए अन्यथा लाभ के बजाय हानि की संभावना रहती है।

पहले तीन दिन: – प्र्रातः 9 बजे फलों का रस अथवा पानी में नींबू शहद मिलाकर। दोपहर 12 बजे मौसमी फल।
रात्रि 8 बजे कच्ची व पकी हुई सब्जी खानी चाहिए।

अगले तीन दिन: – प्रातः कुछ भी नहीं खाना चाहिए। दोपहर 12 बजे फलों का जूस लेना चाहिए। सायंकाल की पूजा के पश्चात रात्रि में कच्ची खाई जाने वाली सब्जियों का रस पीना चाहिए।

अंतिम तीन दिन:- प्रातः काल फलों का रस अथवा नींबू पानी शहद के साथ पीना चाहिए। दोपहर 12 बजे मौसम के फल खाना चाहिए। रात्रि का कच्ची व पकी हुई सब्जियां । इन नौ दिनों में दूध या दूध से बने पदार्थ कदापि नहीं लेने चाहिए। उपवास के अन्तिम दिन पर भोजन वितरण के बाद प्रसाद स्वरूप भोजन ग्रहण करना चाहिए। इन नौ दिनों के उपवास से शरीर की शुद्धि होगी, सुप्त जीवनी शक्ति का जागरण होगा।

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