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नवरात्र: हिन्दू जन समुदाय की शक्ति जागरण का महापर्व !

शक्ति ही दुर्गा है और दुर्गा में ही महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती की समस्त शक्तियां अंतर्निहित है। मानव में यही शक्तियां कुंडलिनी शक्ति के रूप में निवास करती है। कलयुग में आज जब पाप, ताप और भौतिकी का तांडव चरम पर पहुंच गया है। हर व्यक्ति ईष्र्या, द्वेष, कलह, कंुठा, ग्लानि एवं निराशा से त्रस्त है और नफरत का बीज बोने तथा दिलों को बांटने का सिलसिला अनवरत जारी है तो ऐसे में मन की शांति और कल्याण के लिए दुर्गा मां की उपासना ही उन कठिनाइयों पर विजय पाने का एक मात्र साधन है। शास्त्रों में भी स्पष्ट घोष किया गया हैं ‘‘क्लों चंडी विनायकौ’’ की उपासना ही है।

नवरात्र हिन्दू जन समुदाय की शक्ति जागरण का महापर्व है। इस पावन पर्व पर घर-घर में मंगलमयी दुर्गा का पाठ होता है। भारत वर्ष के कोने-कोने में मां भवानी की आराधना होती है।

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नवरात्र में मां भवानी की भक्ति करके भक्तजन अपने लिए मुक्कित का मार्ग प्रशस्त करते हैं। नवरात्र के पर्व पर हिन्दु घरों में मां की पूजा का विधा है। ही सामान्य दिनों में भी मां की स्तुति का स्वर वातावरण में सुगंध बिखेरता रहता है। नवरात्र से अच्छा और श्रेष्ठ फल देने वाला कोई व्रत नहीं है भगवान राम ने यहीं व्रत करके मां महामाया से वरदान प्राप्त कर रावण का वध किया था । श्री कृष्ण और अर्जुन ने भगवती जगदम्बा की उपासना करके ही दिव्य शक्तियां अर्जित की थी और अपना मनोरथ पूर्ण किया था। नवरात्र में व्रत व पूजन करने से मानव की मनोकामनाएं पूर्ण होती है। उसकी आत्मा को बल मिलता है। मां महामाया की उपासना की शक्ति से मनुष्य संसार की छोटी बड़ी सभी प्रकार की समस्याओं को अपने अनुकूल कर सकता है।

नवरात्र का समय शक्ति के उस वेग की धारा, जो सृष्टि के उद्भव और विनाश का कारण है, अधिक तीव्र हो जाती है और पूजा, उपासना एवं आराधना में महाशक्ति का आहवान अधिक सुगम हो जाता है। इस कालवधि में इड़ा एवं पिंघला में वायु की गति समान रहती है आर ऐसी अवस्था में कुण्डलिनी शक्ति का जागरण तथा उध्र्व गति सरल हो जाती है। इसीलिए नवरात्र के दिनो का महत्व वैष्णव, शैव एवं शाकत् सभी स्वीकारते हंै। वर्ष भर में चार नवरात्र आते हैं। चैत्र, आषाढ़, अश्विन एवं माघ माह में इन पर्वाे को मनाने की परम्परा शास्त्रों में वर्णित है। इन चारों महीनों में यह पर्व शुक्ल तिथि तक चलता है। आम हिन्दू समुदाय को मूल रूप से केवल दो नवरात्रों की जानकारी है और उन्हें शक्ति जागरण एवं कल्याणर्थ महापर्व के रूप में मनाया जाता है।

बासंतिक नवरात्र से गेहूं अर्थात अग्नि और शारदीय नवरात्र से चावल अर्थात सोम की प्राप्ति होती है। इन दोनों नवरात्रों में हमें प्रकृति माता जीवन पोषक तत्व अग्नि एवं सोम का उपहार देती है इस समय ऋतु परिवर्तन के कारण नवरात्रि की कालवधि मानव मात्र नहीं वरन् प्रणिमात्र के लिए रोगकारक होती है। इसीलिए इन कालवधि में हमारे मनीषियों ने शक्ति के जागरण पूजन नमन अर्चना वेदना व्रत और उपासना का प्रावधान किया है। जिससे जनसमुदाय प्राणी का अमंगल न हो। नवरात्र के महापर्व के रूप में मनाए जाने का यही कारण है।

इस कलयुग में इसीलिए मां की भक्ति, उनकी उपासना प्रत्येक व्यक्ति के लिए सरल और आवश्यक हो गयी है। पुत्र की प्राप्ति, नौकरी तथा सुख-शांति एवं मंगल की प्राप्ति के लिए भगवती दुर्गा की शरण में शरणागत होने से अच्छा कोई दूसरो उपाय इस कलयुग में नहीं है। मां दुर्गा प्रसन्न रहने पर सब रोगों का नाश कर देती है और क्रुद्ध होने पर सभी कामनाओं को नष्ट कर देती है। परन्तु जो मां की शरण में जा चुके है उन पर विपत्तियां आती नहीं । सच तो यह है कि जो भगवती की शरण में जाता है वह स्वयं दूसरों को शरण देने में सक्षम हो जाता है। इसीलिए कहा गया है- ‘विश्वेश्वरि त्वं परिपासि विश्वं, विश्वात्मिका धरयकीति विश्वम्। विश्वेशवद्या भगवती भवति विश्वाश्रया ये त्वचि भक्तिनम्रा।

अर्थात् हे विश्वेश्वरी ! तुम विश्व का पालन करती हो, विश्वरूपा हो और इसीलिए सम्पर्ण विश्व को धारण करती हो। तुम भगवाना विश्वनाथ की भी वंदनीया हो। जो लोग भक्तिपूर्वक तुम्हारे सामने नतमस्तक होते है वे सम्पूर्ण विश्व को आश्रम देने वाले होते है।

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