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माता चंडी का मंदिर: इस मंदिर में पूजा करने आता है जामवंत का पूरा परिवार

केवल इंसान के अन्दर ही भक्ति-भावना होती है, जानवरों के अन्दर भक्ति नहीं होती है यह कहना गलत होगा । यह कई बार देखा गया है कि कई पालतू जानवर होते हैं जो किसी- किसी दिन खाना ही नहीं खाते हैं। मनुष्य जैसे उपवास रहता है ठीक उसी तरह वो भी उपवास करते हैं। भगवान शंकर के मंदिरों में कई बार साँपों को देखा जा सकता है, वे भी भगवन शंकर की भक्ति की वजह से ही वहाँ होते हैं। समय- समय पर ऐसे कई उदाहरण देखने को मिल जाते हैं जो यह साबित करते हैं कि जानवरों में भी भक्ति-भावना होती है।

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आज हम आपको एक ऐसी ही घटना के बारे में बताने जा रहे हैं। माता चंडी का मंदिर, एक ऐसी ही जगह है जहाँ पर भालू अपने पुरे परिवार के साथ पूजा करने के लिए आते हैं और मंदिर से प्रसाद लेकर चुपचाप चले जाते हैं।

चंडी देवी के मंदिर में एक मादा भालू अपने तीन बच्चों के साथ रोज मंदिर आती है। इस भालू परिवार के मंदिर आने का समय भी तय है, रोज यह भालू परिवार आरती के समय शाम छह से सात बजे के बीच मंदिर आता है। आरती के बाद श्रद्धालु बड़े आराम से इन्हें नारियल, मखाने और प्रसाद में चढ़ाई जाने वाली सामग्री देते हैं। वहीं यह भालू परिवार ठीक उसी तरह से प्रसाद लेते हैं, जिस प्रकार से एक इंसान प्रसाद लेता है। खास बात ये है कि यह भालू परिवार किसी भी श्रद्धालू को नुकसान नहीं पहुंचाता है।

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माता चंडी का यह मंदिर छत्तीसगढ़ में महासमुंद जिले के बागबहरा से 5 किलोमीटर दूर जंगल में स्थित है। इस मंदिर में दर्शन करने के लिए दूर- दूर से लोग आते हैं। नवरात्री के समय यहाँ पर बहुत भीड़ होती है। इसी भीड़ में शामिल होता है एक भालू का परिवार। भालू अपने पुरे परिवार के साथ माँ चंडी के दर्शन के लिए मंदिर आता है। भालुओं के परिवार का मुखिया मंदिर के मुख्य द्वार पर ही रुकता है और बाकी पूरा परिवार मंदिर के अन्दर पूजा करने के लिए जाता है। मंदिर में सभी भालू परिक्रमा करते हैं और शांति से प्रसाद लेकर बाहर आ जाते हैं।

भालुओं के इस झुण्ड में एक नर, एक मादा और उसका एक बच्चा है। मंदिर के पुजारी का कहना है कि यह भालू बहुत समय से यहाँ आ रहे हैं और शांति से पूजा करके प्रसाद लेकर चले जाते हैं। लोग आस्था से उन भालुओं को प्रसाद और कुछ चीजें खिलाते हैं। हैरत की बात यह है कि भालुओं के इस परिवार ने अब तक किसी को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया है।

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लोगों का कहना है कि जंगल के इस मंदिर में देवी माँ की मूर्ति स्वयं ही प्रकट हुई थी। यह मंदिर लगभग 150 साल पुराना है और आज भी यह लोगों की आस्था का मुख्य केंद्र बना हुआ है। आस- पास के लोगों का कहना है कि जंगल के भालुओं पर माँ की कृपा है। आज के समय में ऐसी कोई भी घटना इंसान को एक बार सोचने पर मजबूर कर देती है।

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