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राम मंदिर की राजनीति में उलझी पीएम मोदी सरकार, क्या संसद में लाएगी कानून ?

राम मंदिर की राजनीति ने भाजपा को शून्य से शिखर तक पहुंचाया, वही राम मंदिर राजनीति, पीएम मोदी सरकार के लिए बड़ी उलझन बन गई है!यदि 2014 का चुनाव जीतने के तुरंत बाद पीएम मोदी सरकार इस विषयक कोई फैसला कर लेती तो राह आसान थी, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं और ऐसे में विरोधी ही नहीं सहयोगी भी राम मंदिर को लेकर पीए मोदी सरकार की नियत पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं?

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत द्वारा नागपुर में विजयादशमी के एक कार्यक्रम में कानून बना कर अयोध्या में राममंदिर बनाने की मांग के बाद ये मामला गरमा गया है। भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार ने फिलहाल राममंदिर के मुद्दे पर आधिकारिक रूप से अपना रुख स्पष्ट नहीं किया हैं। साधू संतों के कई संगठनों ने भी अयोध्या में राममंदिर बनाने की मांग को लेकर अपना आन्दोलन तेज कर दिया है।

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अभी कुछ महीनों बाद प्रयागराज में कुंभ लगने वाला हैं, वहां दुनियाभर के साधू संतों का जमावड़ा लगेगा। वहां साधू संतों आम सहमति से सरकार और भाजपा पर मंदिर निर्माण का दबाव बना सकते हैं।
इसी के साथ 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में जाने से पहले भाजपा और पीएम मोदी को भी राममंदिर पर तीखे सवालों का सामना करना पड़ सकता है।

शिवसेना ने भी उठाये सवाल
शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने विजयदशमी पर दशहरा रैली को संबोधित करते हुए मोदी सरकार पर जमकर हमला बोला था। उद्धव ठाकरे ने कहा कि वह 25 नवंबर को अयोध्या जाएंगे और प्रधानमंत्री से पूछेंगे कि राम मंदिर का निर्माण क्यों नहीं हो रहा है?

ठाकरे ने पीएम मोदी से सवाल करते हुए उन्होंने कहा कि आप ऐसे देशों में गए जिसे हमने भूगोल की पाठ्यपुस्तकों में भी नहीं देखा होगा। लेकिन आप अपने ही देश में अबतक अयोध्या क्यों नहीं गए?

संतों ने भी की घोषणा
आपको बता दें कि राम मंदिर आंदोलन से जुड़े महंतों और संतों के भी एक बड़े वर्ग ने 6 दिसंबर से अयोध्या में मंदिर निर्माण की घोषणा कर दी है। संत समाज का कहना है कि हम दिसंबर में राम मंदिर निर्माण का काम शुरू कर देंगे, सरकार रोकना चाहती है तो रोके।

भागवत की मांग
विजयादशमी के कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने कहा था कि राम जन्माभूमि की जगह आवंटित नहीं की गई है, हालांकि साक्ष्य में पुष्टि की है कि उस जगह एक मंदिर था।

अगर राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होता तो मंदिर बहुत पहले बनाया गया होता। हम चाहते हैं कि सरकार कानून के माध्यम से निर्माण के लिए रास्ता साफ करे।चारो ओर से बन रहे दबाव के बीच अगर मोदी सरकार राम मंदिर पर अध्यादेश लाती है तो कांग्रेस के लिए प्रस्ताव का विरोध करना यह आसान नहीं होगा।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अब यदि भाजपा राम मंदिर पर कोई निर्णय कर भी लेती है तो उसे कुछ खास फायदा नहीं होना है, क्योंकि अब बहुत देर हो चुकी है, अलबत्ता राम मंदिर निर्माण पर फैसला नहीं करने पर भाजपा को भारी नुकसान जरूर होगा!

क्योंकि कांग्रेस पिछले कई महीनों से अपनी सॉफ्ट हिंदुत्व की छवि बनाने की पूरी कोशिश कर रही है। हालांकि इससे सपा बसपा जैसी पार्टियों के वोटबैंक में भी सेंध लगेगी, राममंदिर प्रस्ताव का विरोध उनके लिए भी आसान नहीं होगा।

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