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जानिए क्या है पूरी सच्चाई…… उन हाथों की जो आज दूसरों के सामने फ़ैल रहे है

हैरान कर देने वाले अकड़े...

जिन हाथों में शिक्षा की किताबें होनी चाहिए उन हाथों में भीख मांगने के लिए कटोरे थमाए

यू तो भीख मांगना क़ानूननं अपराध है। जबकि नगर व आस-पास के क्षेत्रों में बच्चों को भीख मांगते हुए अक्सर देखा जाता है। उन बच्चों की जो अपने नन्हे नन्हे हाथों की लकीरों में कोई राजयोग, कितनी पढ़ाई, कितनी कमाई को नहीं ढूंढ़ सकते क्योंकि इनकी हर लकीर महज निवालों को जुटाने में व्यस्त है। रात में किस फुटपाथ को मखमली बिस्तर मानकर सो जाना है इसकी उधेड़बुन करने में लगे हैं। इनकी न तो रुचि शिक्षा में है और न ही कोई इनको शिक्षा के लिए प्रेरित करता है। भीख मांगने वाले  बच्चे अपने मां-बाप का नाम तक नहीं बताते। बहुत पूछने पर कहते हैं कि पिता शराब पिता है और मां लोगों के घरों में काम करती है।
जानिए क्या पूरी सच्चाई...... उन हाथों की जो आज दूसरों के सामने फ़ैल रहे है
भीख नहीं मांगने पर पिता मारता-पीटता है। मजबूर होकर भीख मांगते हैं।क्योकि उन बच्चों के घर की आर्थिक परस्थित इतनी दैनी होती है कि भीख मांगने के अलावा उन बच्चों के पास दूसरा कोई रास्ता नही होता।  जिन हाथों में किताब-कलम होनी चाहिए, उन हाथों में कटोरा दिखता है।

जब भारत में भीख मांगना अपराध की श्रेणी में रखा गया है । तो फिर देश की सड़कों पर खुलेआम लोगों के सामने इतने सारे हाथ कैसे उम्मीद और ख्वाहिश में फैले रहते हैं? अगर भीख मांगना अपराध है तो बिना किसी तरह की हिचक के सबके सामने यह ‘अपराध’ कैसे चलता रहता है? घोषित अपराध को रोकने वाला हमारा महकमा कहां सो रहा होता है? चौदह वर्ष तक बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा देने के मौलिक अधिकार के बावजूद पढ़ाई के मामले में भारत देश अत्यंत पिछड़ा हुआ है। जे सब देखते है ,तो सहसा एक ही सवाल उठता है कि स्कूल जाने की जगह ये बच्चे भीख क्यो मांग रहे है । क्या इन्हें शिछा के अधिकार अधिनियम से अलग रखा गया है।आप के आस- पास ऐशे सैकड़ो बच्चे मिल जायेंगे जिनकी महज 5 से 14 वर्ष की आयु के होते है।क्योंकि इसके अलावा उन बच्चों के पास कोई दूसरा रास्ता नही होतो।
कोई भीख मांग रहा, तो, कोई कूड़ा बिन रहा, तो कोई जूता पोलिश कर गर्दिश भारी ज़िन्दगी बिता रहे है।इन पर किसी की भी नजर नही पड़ती चाहे वो संसाद हो या बिधायक सभी अपनी जेब भर रहे है। सरकार के विरोध में आवाजों की बुलंदी देखी…. तख्तियों में चमकते आंदोलन देखे…. कभी जातिवाद के सिपहसलारों से रूबरू हुए….कभी भारत के टुकड़े करने वालों से भी। लगभग हर रोज न जाने कितने मुद्दों से हम खुद को जोड़ते हैं। चाय पर चर्चा करते हैं। अपनी बातों को मनवाने के लिए तमाम हथकंडे अपनाते हैं। सजी राजनीतिक जुबानों पर इनका जिक्र कहीं नहीं आता है, क्योंकि राजनेताओं ने राजनीति का मतलब महज धर्म का बंटवारा और जाति में मतभेद बना रखा है। लेकिन ”मासूम भिखारी” या कहिए ”बाल भिखारी” मुद्दा लाख टके का है।
कभी भी उछालिए तो खजी हां भारत के भविष्य की बात कर रहा हूं मैं हाउस होल्ड सर्वे करने वाला शिछा विभाग भी सिर्फ  कागजों की खानापूरी में व्यस्त रहते है। गरीबी की मार झेल रहे यह बच्चे बेसिक शिक्षा विभाग के उन अधिकारियों के लिए आईना है जिनके ऊपर इन्हें शिक्षा मुहैया कराने की जिम्मेदारी होती है। सर्व शिक्षा अभियान के तहत हर साल करोड़ो रुपयो का बजट आता है।जब कि सच्च तो यह है, कि ये पैसा उन तक पहुच ही नही पता जिनको इन पैसों की जरूरत होती है। शिक्षा विभाग के अधिकारियों पर य जिमेदारी होती है, कि वे प्राधामिक व उच्चप्राधामिक विधालयो में अधिक से अधिक बच्चों को दाखिल दिलाये।लेकिन हम देखते है हकीकत में ऐसा कुछ नही होता है पर हा फ़ाइल और कागजो को जरूर समय से अपडेट कर दिया जाता है।
किताबों के बजाय हाथ मे कटोरा…
एक तरफ गरीबी की चक्की में पिसते लोग हैं तो दूसरी ओर गरीबी को भी एक धंधा बना दिया गया है। इसमें बाकायदा वैसे दलाल शामिल हैं, जो अपहरण करते हैं और बच्चों को भीख मांगने के लिए तैयार करते हैं। इसमें उन्हें अपंग बनाने से लेकर सभी तरह के अत्याचार शामिल हैं। जिन बच्चों का अपहरण हो जाता है वे बच्चे कहां जाते हैं?
लगभग पूरा भारत इस गिरफ्त में है। लेकिन सच यह है कि भारत में ज्यादातर बाल भिखारी अपनी मर्जी से भीख नहीं मांगते। वे संगठित माफिया के चंगुल में फंस कर भीख मांगने पर मजबूर होते हैं। इनके पास किताबों के बजाय हाथ में कटोरा आ जाता है। लेकिन इसका कारण क्या है, शायद इसकी वजह जानने के लिए जिम्मेवारों ने…हमने, आपने कभी कोशिश की है।
हैरान कर देने वाले अकड़े…
60 हजार बच्चे हर साल गायब होते हैं, जिनमें से 42 हजार से ज्यादा बच्चों से भीख मंगवायी जाती है।
गायब बच्चों में से एक चौथाई कभी नहीं मिलते हैं।
राज्यसभा से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार देश में करीब 4,13,670 लाख भ‍िखारी हैं। राज्यसभा की रिपोर्ट- 65 हजार यूपी में।देश में 2.2 लाख पुरुष और 1.91 लाख महिलाएं भीख मांगती हैं।

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