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कांग्रेस का यह दांव क्या गुल खिलाएगा, जानिये!

By Prem Sharma

लखनऊ। मिशन यूपी का जिम्मा संभालने के लिए सोमवार को चार दिवसीय दौरे पर लखनऊ आ रही राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी का स्वागत त्यौहार की तरह करने में कांग्रेस कार्यकर्ता जुट गए है। प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर ने प्रमुख नेताओं की बैठक मेें प्रियंका गांधी के रोड शो का मार्ग फाइनल करते हुए आसपास के जिलों से भीड़ जुटाने के निर्देश दिए। सुरक्षा व्यवस्था चाकचैबंद करने के लिए एसपीजी ने मुख्यालय में डेरा डाल दिया। साज सज्जा का काम भी तेजी से कराया जा रहा है।

लगभग बुरे दौर से धीरे धीरे उबर रही कांग्रेस को  प्रियंका की ताजपोशी ने करंट देने का काम किया है। बेसुध हो चुके कार्यकर्ता और कांग्रेसी नेताओं में प्रियंका के पदाधिकारी बनते ही उत्साह का संचार हुआ है। उत्तर प्रदेश में बसपा और समाजवादी पार्टी से तिरस्कार पाने के कांग्रेस का यह कदम बहुजन समाज पार्टी की ‘‘ बुआ ’’, समाजवादी पार्टी के ‘‘ बबुआ ’’ के साथ ही भारतीय जनता पार्टी के ‘‘ नमो ’’ के लिए टेंशन देने वाला साबित होगा। उत्तर प्रदेश की लगभग एक तिहाई सीटों के साथ प्रियंका गांधी का चेहरा इन्दिरा की परछाई की तरह मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, महाराष्ट्र, बिहार सहित कम से कम एक दर्जन से अधिक राज्यों में कांग्रेस के लिए संजीव साबित होने संकेत दे रहा हैं।

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आगामी लोकसभा चुनाव में प्रियंका गांधी कांग्रेस के लिए गेम चेंजर साबित हो सकती हैं। उत्तर प्रदेश में जहां सपा-बसपा ने आपस में गठबंधन कर कांग्रेस को बेसहारा छोड़ दिया था, ऐसे में प्रियंका की पार्टी में एंट्री कांग्रेस के लिए बड़ा सहारा बन सकती है। पार्टी उनके करिश्माई अंदाज के दम पर मोदी के जादू को फीका करने की तैयारी में है। माना जा रहा है कि राजनीति में अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार जहां उत्तर प्रदेश में पार्टी के पुराने बोट बैंक बीएमडी ( ब्राताण, मुस्लिम व दलित ) को फिर से कांग्रेस की झोली में लाने की कोशिश करेंगी, वहीं पूरे देश में वह अपनी दादी इंदिरा गांधी की छवि को भुनाने का प्रयास करेंगी।

जिस तरह से प्रियंका को पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभार सौंपा गया है, वह कम चैंकाने वाला नहीं है। इस पूर्वी उत्तर प्रदेश से पिछले लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत भाजपा के कई बड़े नेता चुनावी समर में उतरे थे। कांग्रेस की रणनीति यह है कि प्रियंका के जादू के बूते प्रधानमंत्री मोदी को वाराणसी में घेरा जाए या फिर उन्हें सीट बदलने पर मजबूर किया जाए। यदि ऐसा होता है, तो मनोवैज्ञानिक तौर पर चुनावी समर का पहला चरण कांग्रेस के खाते में जाएगा।

प्रियंका को उतारकर कांग्रेस ने सपा-बसपा जैसी पार्टियों को भी यह संदेश देने की कोशिश की है कि उसे कमतर समझना दोनों दलों की भारी राजनीतिक भूल थी। लोगों को याद होगा कि 16 साल की प्रियंका का यह पहला सार्वजनिक भाषण था। इस भाषण के 31 साल बाद तक कांग्रेस समर्थक पार्टी को उबारने के लिए जिस संजीवनी की मांग करते रहे हैं, वो अब पूरी हो गई है। प्रियंका गांधी का सक्रिय राजनीति में पदार्पण हो चुका है। उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश का महासचिव बनाकर पार्टी ने तुरुप का इक्का चल दिया है।

लोकसभा चुनाव से ऐन पहले उन्हें उत्तर प्रदेश के उन इलाकों की जिम्मेदारी मिली हैं, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के संसदीय क्षेत्र पड़ते हैं और कांग्रेस यहां मृतप्राय है। ऐसे में प्रियंका के लिए सब कुछ बहुत आसान नहीं रहने वाला है, लेकिन इंदिरा गांधी के करिश्माई व्यक्तित्व को लेकर जब उनकी तुलना होने लगती है तो सारी चुनौतियां छोटी पड़ने लगती है और उनके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने-समझने की इच्छा होती है।

कांग्रेस का यह दांव क्या गुल खिलाएगा यह तो चुनाव बाद पता चलेगा, लेकिन इतना साफ है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी आगामी लोकसभा चुनाव में पार्टी की लिए बड़ी संभावनाएं सोचकर चल रहे हैं और मोदी सरकार को सत्ता से बाहर रखने के लिए उन्होंने अपने तुरुप के इक्के को चल दिया है। एक बात साफ नजर आ रही है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की पहली कोशिश उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के सारे कार्यकर्ता को जगाने की है और इस काम में प्रियंका के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था। कांग्रेसियों को प्रियंका में इंदिरा गांधी का अक्श नजर आता है और यही प्रियंका की सबसे बड़ी ताकत है।

पूर्वी उत्तर प्रदेश में दो दर्जन से ज्यादा सीटें हैं और इनमें से ज्यादातर पर कभी कांग्रेस का एकछत्र राज्य हुआ करता था। प्रियंका के सहारे कांग्रेस यहां अपनी खोई जमीन वापस लाने की तैयारी में है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में प्रमुख लोकसभा सीटों में अमेठी, रायबरेली, अंबेडकर नगर, आजमगढ़, बलिया, बलरामपुर, बहराइच, बस्ती, भदोही, चंदौली, देवरिया, गाजीपुर, गोरखपुर, गोंडा, जौनपुर, कुशीनगर, महाराजगंज, मऊ, मिर्जापुर, संत कबीरनगर, सुल्तानपुर, सोनभद्र, वाराणसी, डुमरियागंज, श्रावस्ती हैं। इस क्षेत्र में विधानसभा की 150 सीटें आती हैं।

जातिगत समीकरण को देखें तो पूर्वी उत्तर प्रदेश में 20 से 24 प्रतिशत दलित, 8 से 15 प्रतिशत ब्राताण और 10 से 27 प्रतिशत मतदाता मुस्लिम हैं। प्रियंका के सामने सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक की वापस पार्टी की झोली में डालने की है। प्रियंका का अंदाज, हाजिरजवाबी और आम आदमी से संबंध बनाने की कला बिल्कुल इंदिरा जैसी है। उनका करिश्माई अंदाज कांग्रेस में न केवल नए सिरे से जान फूंक सकता है, बल्कि मोदी-शाह की जोड़ी के लिए निर्णायक चुनौती भी पेश कर सकता है। प्रदेश के कांग्रेसी प्रियंका में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इन्दिरा गांधी का अक्स देख रहे हैं।

उनका मानना है कि प्रियंका के आने के बाद यूपी में कांग्रेस की राजनीति गरमाएगी और इसका खास असर दिखेगा। उनका भरोसा है कि प्रदेश में हाशिये पर पहुंच चुकी कांग्रेस में नयी जान आ जाएगी और लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस को अब उम्मीद से ज्यादा सीटों पर सफलता मिलेगी। केन्द्र की सत्ता के साथ ही उत्तर प्रदेश में हाशिये पर पहुंच चुकी कांग्रेस ने अब गांधी परिवार की एक और सदस्य प्रियंका को भी आखिरकार राजनीति में उतार ही दिया है। कांग्रेस अध्यक्ष ने यह फैसला ऐसे समय लिया है, जब प्रदेश में सपा और बसपा ने अप्रैल-मई में होने वाले लोकसभा चुनाव को मिलकर लड़ने का निर्णय लिया है।

दोनों दलों ने कांग्रेस को अकेला छोड़ दिया, जबकि कांग्रेस सहित अधिकतर विपक्षी दल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा को हराने के लिये महागठबंधन की बात कर रहे हैं।हालांकि, उत्तर प्रदेश में लगभग तीस वर्षो से सत्ता से दूर बैठी कांग्रेस के नेता प्रियंका को राजनीति में उतारने की मांग काफी पहले से करते आ रहे थे। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस को मिली जबरदस्त हार के बाद यह र्चचा होने लगी थी कि कांग्रेस को अब इस स्थिति से प्रियंका ही उबार सकती हैं। कांग्रेसी पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इन्दिरा गांधी की छवि प्रियंका में देखते हैं और यह मानते हैं कि उनके आने के बाद कांग्रेस में एक बार फिर इन्दिरा गांधी के जमाने की याद ताजा हो जाएगी।

प्रियंका को सक्रिय भूमिका देने की लंबे समय से मांग कर रहे कांग्रेस कार्यकर्ताओं में श्री गांधी के इस फैसले से निश्चित रूप से उत्साह और जोश बढ़ेगा और उनकी सक्रियता बढ़ेगी, लेकिन पार्टी से छिटक गये मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने के लिये उन्हें और पार्टी को कड़ी मशक्कत करनी होगी।बीते चुनावों में पूर्वी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का प्रदर्शन काफी कमजोर रहा है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का चुनाव क्षेत्र इसी हिस्से में है। इस तरह प्रियंका को उन दोनों की चुनौतियों के साथ-साथ सपा-बसपा का सामना भी करना होगा।

कांग्रेस ने राज्य में पिछला विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर लड़ा था, लेकिन इस गठबंधन को भारी पराजय का सामना करना पड़ा था। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रदर्शन की बात की जाये, तो 1984 के बाद से उसका ग्राफ लगातार नीचे गिरता रहा है। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में हुए आम चुनाव में कांग्रेस ने राज्य की 85 में से 83 सीटें जीती थीं तथा उसे 51 प्रतिशत से अधिक मत मिले थे। उसके बाद से उसकी स्थिति लगातार खराब होती रही है।

न केवल उसकी सीटें घटती गयीं बल्कि उसे मिलने वाले मतों में भी भारी गिरावट आयी। पांच चुनावों में तो उसकी सीटों की संख्या दो अंकों तक में नहीं पहुंच सकी। पार्टी 1998 के आम चुनाव में राज्य में एक भी सीट नहीं जीत पायी थी।पिछले लोकसभा चुनाव में भी सोनिया गांधी और राहुल गांधी अपनी सीटें बचा पाने में सफल हुये थे। पिछले तीन दशक में पार्टी को सबसे अधिक 21 सीटें 2009 के लोकसभा चुनाव में मिली थीं।

भले ही पहली बार प्रियंका को पार्टी में कोई पद मिला है, लेकिन वह अपनी मां एवं कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली और अपने भाई राहुल के चुनाव क्षेत्र अमेठी में चुनाव प्रचार में सक्रिय भूमिका निभाती रही हैं। प्रियंका के कांग्रेस में सक्रिय भूमिका में आने के बाद प्रदेश के राजनीतिक माहौल में निश्चित रूप से बड़ा बदलाव आएगा। लेकिन इसके लिए पार्टी के कार्यकर्ता से ज्यादा आलसी नेताओं को सक्रिय होना पड़ेगा।साभार: जीएनएस

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