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दलबदलू, धनबली, बाहुबली के साथ क्या करेगा मतदाता ?

फिलहाल 2019 के चुनाव के लिए अभी राजनैतिक दलो के प्रति आस्था, निष्ठा, विश्वास बदलने की नेताओं की शुरूआत हुई है। ऐसी शुरूआत अचानक हर विधानसभा और लोकसभा चुनाव के कुछ दिन पूर्व या फिर टिकटों के वितरण के साथ शुरू होती है। अभी तो लगभग दो दर्जन ऐसे नेताओं ने पार्टी बदली है जिनका टिकट [...]

फिलहाल 2019 के चुनाव के लिए अभी राजनैतिक दलो के प्रति आस्था, निष्ठा, विश्वास बदलने की नेताओं की शुरूआत हुई है। ऐसी शुरूआत अचानक हर विधानसभा और लोकसभा चुनाव के कुछ दिन पूर्व या फिर टिकटों के वितरण के साथ शुरू होती है। अभी तो लगभग दो दर्जन ऐसे नेताओं ने पार्टी बदली है जिनका टिकट काॅटा गया या फिर कटने की पूरी सम्भावना थी।

भाजपा के श्यामा चरण गुप्ता और सवित्री बाई फूले तो कांग्रेस के टाॅम बडक्कन का सामने है। अभी तो इसकी शुरूआत है लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव मतदान तक यह आकड़ा सभी दलों को मिलाकर लगभग सौ को पार कर जाएगा। यानि लोकसभा 2019 में भी लगभग 100 दलबदलूओं पर मजबूरन राजनैतिक दलों को अपना ठप्पा लगाना पड़ेगा। एक चर्चा के मुताबिक जहाॅ इस बार भाजपा अपने लगभग 80 सांसदों के टिकट काट रही है उनमें से 50 का दल बदलना तय माना जा रहा है।

वही कांग्रेस में भी भगदड़ जारी है। बसपा और सपा गठबंधन के बाद बसपा और सपा के वे दिग्गज नेता जो 2019 में लोकसभा की तैयारी में जुटे थे उनकी भी आस्था कही से टिकट मिलने पर बदल सकती है। यही हाल अन्य प्रान्तों के क्षेत्रीय दलों में मचा हुआ हैं। ऐसे में यह तय है कि इस चुनाव में भी दलबदलु प्रत्याशियों की भरमार होगी। आम चुनाव की घोषणा होते ही दलबदल शुरू हो जाना कोई नई-अनोखी बात नहीं, लेकिन सोचनीय यह कि दलबलूओं टिकट के लिए इतना गिर जाना कहा तक उचित है। दो दिन पहले तक दल विशेष की भयंकर आलोचना करने वाले नेता जिस तरह बिना किसी हिचक के उसी दल में शामिल हो जा रहे हैैं वह हैरानी भरा है।

भाजपा में शामिल हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता टॉम वडक्कन का मामला ऐसा ही है। यह अजीब है कि वह जब तक कांग्रेस में थे तो पार्टी नेतृत्व के करीबी लोगों में गिने जाते थे, लेकिन भाजपा में जाते ही उनके पुराने साथियों की ओर से यह कहा जा रहा है कि वह तो कोई बड़े नेता ही नहीं थे। जनता दल-एस के नेता दानिश अली का है। वह अभी कल तक अपनी पार्टी और कांग्रेस के बीच तालमेल बैठा रहे थे, लेकिन अचानक बसपा में शामिल हो गए। टॉम वडक्कन और दानिश अली का मामला तो शुरूआत है।

ऐसे दलबदल लगातार सामने आ रहे हैैं और यह तय है कि इसमें अभी और तेजी आनी है। ज्यादातर दलबदल इसीलिए हो रहे हैैं, क्योंकि चुनाव लड़ने के इच्छुक नेताओं को या तो प्रत्याशी नहीं बनाया जा रहा है या फिर उन्हें मनपसंद सीट नहीं मिल रही है। आखिर ऐसे नेता किस तरह विचाराधारा आधारित राजनीति को बल दे सकते हैैं ? मुश्किल यह है कि राजनीतिक दल भी जिताऊ उम्मीदवार की तलाश में या फिर विरोधी दल के मनोबल या समीकरण को प्रभावित करने के लिए दलबदलुओं को खुशी-खुशी गले लगाना पसंद करते हैैं।

इस क्रम में वे यह भी नहीं देखते कि कल का जो विरोधी आज उनके दल में शामिल हो रहा है वह परसों तक उन्हें समाज और देश के लिए खतरा बताया करता था। निश्चित तौर पर हर नेता राजनीतिक हित की परवाह करता है,लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि उन्हें यह ढोंग करने की सुविधा भी मिले कि वे मूल्यों-मर्यादा की राजनीति कर रहे हैैं? ऐसे में इस ढोंग का कोई इलाज खोजना केवल मतदाता के बस में है। क्योंकि भारतीय राजनीति एक ऐसे युग में प्रवेश करती जा रही है जिसका कोई नियम नहीं दिखता।

बड़ी संख्या में हो रहे दलबदल से यह भी पता चल रहा है कि विचारधारा इस बाॅत का प्रमाण है कि जनता के प्रति राजनेता, नेता और पार्टी पूरी तरह गैर जिम्मेदार है।विचारधारा ऐसी चीज नहीं कि रातोंरात बदल जाए। यह समझ आता है कि कोई नेता समान विचारधारा वाले किसी दल में शामिल हो जाए, लेकिन आखिर इसका क्या मतलब कि खुद को कांग्रेस का सिपाही बताने वाला भाजपा में चला जाए या फिर भाजपा की विचारधारा को अपने जीवन का लक्ष्य बताने वाला रातोंरात कांग्रेसी बन जाए? जब वस्त्र बदलने की तरह से विचारधारा बदली जाए तो यह समझ लिया जाना चाहिए कि केवल संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों को महत्ता दी जा रही है।

इससे राजनीति और अधिक अनैतिक ही होगी।दलबदल की इस बीमारी से बचने के लिए पिछले बीस-पच्चीस बरसों में कई कोशिशें हुई हैं। संविधान के 91वें संशोधन के जरिए ऐसी स्थिति बना दी गई कि अब दल बदलने वाले को सदन की सदस्यता भी छोड़नी होगी। लेकिन इसका उतना असर नही पड़ा जिसका अनुमान लगाया जा रहा था। दलबदल को अमेरिका में इसे पाला बदलना कहते हैं और न्यूजीलैंड में नाव बदलना। एक्वाडॉर में इस बीमारी के लिए बड़ा रोचक शब्द है- केमीसेट्जा। इसका अर्थ होता है कमीज बदलना। मोरक्को में इसे राजनीतिक खानाबदोशी की संज्ञा दी गई है। चूंकि सामान्यतः दलबदल विपक्ष से सत्ता दल की तरफ अथवा सत्ता में आने के लिए होता है, इसलिए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि राजनेता किसी लालच में तो यह काम नहीं करते ?

अक्सर यह काम लालच में ही होता है और इसीलिए इसे जनतंत्र की एक बीमारी कहा गया है। लेकिन सवाल उठता है कि क्या दलबदल विरोधी कानून बनाकर हम व्यक्ति के सोच के अधिकार अथवा सोच के विकसित होने के अवसरों पर प्रतिबंध नहीं लगा रहे ? दूसरे, क्या पार्टी के आदेशों के अनुसार चलने की पाबंदी व्यक्तित्व के विकास में बाधक नहीं है ? यह सैद्धांतिक बात है और कई बार सब कुछ सिद्धांतों के आधार पर तय करना संभव नहीं रह जाता, फिर भी व्यक्ति की वैचारिक आजादी के अधिकार के बारे में कहीं न कहीं सोचा ही जाना चाहिए। दूसरी बात मतदाता के अधिकार से जुड़ी है।

उसे अपने प्रतिनिधियों से यह जाने का हक क्यों न हो कि वे किस आधार पर कमीज बदल रहे हैं ? यही नही इस दलबदल के चलते राजनैतिक दलों और उनके समर्थकों और कार्यकर्ताओं में भी भारी असंतोष, अविश्वास का संचार होता है। उत्तर प्रदेश का वर्तमान समय का राजनैतिक घटना क्रम इसका जीता जागता प्रमाण है। उत्त्र प्रदेश में राजनैतिक दलों द्वारा अब तक घोषित उम्मीदवारों को देखकर यह कहा जा सकता है कि राजनैतिक दलों ने निष्ठावान, पार्टी का झण्डा उठाने वाले, लाठी खाने वालों को टिकट वितरण के दौरान नजरअन्दाज करते हुए दलबदलू, धनबली, बाहुबली या पार्टी के बड़े नेताओं के बहु, बेटों, बेटियों पर विश्वास जताया है।

जहाॅ एक दल द्वार कार्यकताओं को दर किनार कर 15-15 करोड़ में टिकट बेचने की चर्चा आम है वही दूसरे दल में आधा दर्जन सीटों पर केवल परिवारिक लोगों को उम्मीदवार बना दिया गया है। सबसे सोचनीय बाॅत यह कि ऐसा किसी एक विशेष दल में नही हो रहा है बल्कि हर दल चुनाव जीतने के लिए ऐसा कर रहा है। इस बारें में चुनाव आयोग, सुप्र्रीम कोर्ट, हाईकोट, केन्द्र और राज्य सरकारों के साथ आम मतदाता को विचार करना होगा कि जो नेता अपनी पार्टी का नही हुआ वह जनता का कैसे होगा ? मतदाता इस बाॅत को गाॅठ बाॅध ले कि उसे किसी भी हालत में दलबदलू को मत नही देना है भले वह कितना बड़ा नेता क्यो न हो।

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