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चैत्र नवरात्र : मां के नौ रूपों की उपासना का पर्व शुरू, जानिए मां के 9 स्वरूप

शक्ति ही दुर्गा है और दुर्गा में ही महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती की समस्त शक्तियां अंतर्निहित है। मानव में यही शक्तियां कुंडलिनी शक्ति के रूप में निवास करती है। कलयुग में आज जब पाप, ताप और भौतिकी का तांडव चरम पर पहुंच गया है। हर व्यक्ति ईष्र्या, द्वेष, कलह, कंुठा, ग्लानि एवं निराशा से त्रस्त है और नफरत का बीज बोने तथा दिलों को बांटने का सिलसिला अनवरत जारी है तो ऐसे में मन की शांति और कल्याण के लिए दुर्गा मां की उपासना ही उन कठिनाइयों पर विजय पाने का एक मात्र साधन है। शास्त्रों में भी स्पष्ट घोष किया गया हैं ‘‘क्लों चंडी विनायकौ’’ की उपासना ही है।
नवरात्र हिन्दु जन समुदाय की शक्ति जागरण का महापर्व है। इस पावन पर्व पर घर-घर में मंगलमयी दुर्गा का पाठ होता है। भारत वर्ष के कोने-कोने में मां भवानी की आराधना होती है।
नवरात्र में मां भवानी की भक्ति करके भक्तजन अपने लिए मुक्कित का मार्ग प्रशस्त करते हैं। नवरात्र के पर्व पर हिन्दु घरों में मां की पूजा का विधा है। ही सामान्य दिनों में भी मां की स्तुति का स्वर वातावरण में सुगंध बिखेरता रहता है। नवरात्र से अच्छा और श्रेष्ठ फल देने वाला कोई व्रत नहीं है भगवान राम ने यहीं व्रत करके मां महामाया से वरदान प्राप्त कर रावण का वध किया था । श्री कृष्ण और अर्जुन ने भगवती जगदम्बा की उपासना करके ही दिव्य शक्तियां अर्जित की थी और अपना मनोरथ पूर्ण किया था। नवरात्र में व्रत व पूजन करने से मानव की मनोकामनाएं पूर्ण होती है। उसकी आत्मा को बल मिलता है। मां महामाया की उपासना की शक्ति से मनुष्य संसार की छोटी बड़ी सभी प्रकार की समस्याओं को अपने अनुकूल कर सकता है।
नवरात्र का समय शक्ति के उस वेग की धारा, जो सृष्टि के उद्भव और विनाश का कारण है, अधिक तीव्र हो जाती है और पूजा, उपासना एवं आराधना में महाशक्ति का आहवान अधिक सुगम हो जाता है। इस कालवधि में इड़ा एवं पिंघला में वायु की गति समान रहती है आर ऐसी अवस्था में कुण्डलिनी शक्ति का जागरण तथा उध्र्व गति सरल हो जाती है। इसीलिए नवरात्र के दिनो का महत्व वैष्णव, शैव एवं शाकत् सभी स्वीकारते हंै। वर्ष भर में चार नवरात्र आते हैं। चैत्र, आषाढ़, अश्विन एवं माघ माह में इन पर्वाे को मनाने की परम्परा शास्त्रों में वर्णित है। इन चारों महीनों में यह पर्व शुक्ल तिथि तक चलता है। आम हिन्दू समुदाय को मूल रूप से केवल दो नवरात्रों की जानकारी है और उन्हें शक्ति जागरण एवं कल्याणर्थ महापर्व के रूप में मनाया जाता है।
बासंतिक नवरात्र से गेहूं अर्थात अग्नि और शारदीय नवरात्र से चावल अर्थात सोम की प्राप्ति होती है। इन दोनों नवरात्रों में हमें प्रकृति माता जीवन पोषक तत्व अग्नि एवं सोम का उपहार देती है इस समय ऋतु परिवर्तन के कारण नवरात्रि की कालवधि मानव मात्र नहीं वरन् प्रणिमात्र के लिए रोगकारक होती है। इसीलिए इन कालवधि में हमारे मनीषियों ने शक्ति के जागरण पूजन नमन अर्चना वेदना व्रत और उपासना का प्रावधान किया है। जिससे जनसमुदाय प्राणी का अमंगल न हो। नवरात्र के महापर्व के रूप में मनाए जाने का यही कारण है।
इस कलयुग में इसीलिए मां की भक्ति, उनकी उपासना प्रत्येक व्यक्ति के लिए सरल और आवश्यक हो गयी है। पुत्र की प्राप्ति, नौकरी तथा सुख-शांति एवं मंगल की प्राप्ति के लिए भगवती दुर्गा की शरण में शरणागत होने से अच्छा कोई दूसरो उपाय इस कलयुग में नहीं है। मां दुर्गा प्रसन्न रहने पर सब रोगों का नाश कर देती है और क्रुद्ध होने पर सभी कामनाओं को नष्ट कर देती है। परन्तु जो मां की शरण में जा चुके है उन पर विपत्तियां आती नहीं । सच तो यह है कि जो भगवती की शरण में जाता है वह स्वयं दूसरों को शरण देने में सक्षम हो जाता है। इसीलिए कहा गया है- ‘विश्वेश्वरि त्वं परिपासि विश्वं, विश्वात्मिका धरयकीति विश्वम्। विश्वेशवद्या भगवती भवति विश्वाश्रया ये त्वचि भक्तिनम्रा।
अर्थात् हे विश्वेश्वरी ! तुम विश्व का पालन करती हो, विश्वरूपा हो और इसीलिए सम्पर्ण विश्व को धारण करती हो। तुम भगवाना विश्वनाथ की भी वंदनीया हो। जो लोग भक्तिपूर्वक तुम्हारे सामने नतमस्तक होते है वे सम्पूर्ण विश्व को आश्रम देने वाले होते है।

1.प्रथम शैलपुत्री
नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं-माता ‘शैलपुत्री’। मां दुर्गा का प्रथम स्वरूप ‘शैलपुत्री’ के नाम से प्रचलित है। जगदम्बा शैलपुत्री स्वरूप में पर्वतराज हिमालय के घर पत्री रूप में अवतरित हुई थीं। इसी कारण इन्हें ‘शैलपुत्री’ कहा जाता है। ‘शैलपुत्री माताजी वृषभ पर सवार रहती है। । माता के दाहिने हाथ में शूल, और बायें हाथ में कमल का पुषप शोभायमान होता है।

नवदुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री दुर्गा का महत्व और शक्तियां अनंत है। नवरात्रि पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है। इस प्रथम दिवस की उपासना में योगी अपने मन को मूलाधार चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योग साधना का प्रारम्भ होता है।
कालान्तर में जगदम्बा इसी स्वरूप में पार्वती के नामसे दवाधिदेव भगवान शंकर की अद्र्धागिनी हुई। नवरात्र के प्रथम दिन शैलपुत्री के इसी स्वरूप की पूजा अर्चना होगी। भक्तजन पूरी श्रद्धा व भक्ति के साथ ‘¬ ऐं हृीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे। प्रथम देव्यै नमः।। मंत्र के जाप से उसकी आराधना करेंगे।
जीव के जीवन का परम लक्ष्य परम सात्विकोद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना है। इसका सबसे सरल मार्ग मां के नाम की स्तुति है। मां की स्तुति के लिये नवरात्र से बढ़कर पवित्र अवसर क्या हो सकता है ? मां के नाम के जापक को मोक्ष जैसी दुर्लभ वस्तु भी हस्तामलक है।

दुर्गे दुर्गेति दुर्गाया: दुर्गे नाम परम् मनुम्।

यो भजेत् सततं चाण्डि। जीवन्मुक्त। सः मानवाः।।

2. ब्रह्मचारिणी

शक्ति पूजन की दृष्टि से ब्रह्मचारिणी दुर्गा की उपासना का विशेष महत्व है। ब्रह्मचारी अर्थात् जो वीर्य को स्खलित न होने दे। वीर्य का मूल जल है। वीर्य रक्त से बनता है, अर्थात रक्त का रूपान्तर है। इसलिए जो जल का सघन या ठोस बनाकर रखे, वह ब्रह्मचारिणी । इस प्रकार यह प्रकृति का ‘क्रियात्मक’ अंग है और ‘जल तत्वात्मक’ है। यह जल तत्व को हस्तगत रखने वाली शक्ति है।


शास्त्रों में कहा गया है कि मेस पर्वत के समान महती पाप राशि भी दुर्गा की शरण मेंअपने पर नष्ट हो जाती है।
दुर्गार्चन में लगा व्यक्ति पुण्य से इसी प्रकार निलिप्त रहता है, जैसे जल में कमल रहता है। भगवान शिव कहते हैं कि आरोग्य सम्पत्ति और ज्ञान के परम उत्कर्ष का दुर्गा नाम परम कारण है। कलियुग में तो कहना ही क्या है ?
महापापियों के भी महान से महान पाप इस नामोच्चारण से नष्ट हो जात हैं –
विष्णु नाम सहस्त्रेभ्यो, शिव नामैमुत्तमं।
शिव नाम सहस्त्रेभ्यो, देवी नामैकमुत्तमं।।

3. मां चन्द्राघण्टा
आततायीयों एवं पापियों के विनाश के लिये मां का यह स्वरूप सदैव तत्पर रहता है। इसके बाद भी मां का यह स्वरूप साधक के लिये सौम्यता एवं शांति की पूर्ति ही होता हैं मां चन्द्रघण्टा की भक्ति से आराधक में वीरता निर्भयता और सौम्यता एवं विनम्रता जैसे सद्गुणों का विकास होता है। भक्त की सम्पूर्ण काया में क्रंाति का उदभव व विकास होता है।

भक्त के स्वर में दिव्यता , अलौकिकता, माधुर्य इत्यादि गुणों का उद्भव होता है। इनके उपासकों को देखकर अन्य लोग शांति एवं सुख की सुखद अनुुभूति करते हैं। इन भक्तगणों के शरीर से दिव्य प्रकाशमय तेज का उद्भव होता रहता है। परन्तु यह सब कुछ साधारण मनुष्य नहीं देख पाते हैं। क्योंकि यह दिव्य क्रिया साधारण चक्षुओं से नहीं देखी जा सकती है। लेकिन ऐसे भक्तगणों के सम्पर्क में आने वाले मनुष्यों को इसकी अनुभूति हो जाती है। हमें चाहिए कि अपने मन, वचन, कर्म एवं काया को विहित विधि के अनुसार पूर्णतः परिशुद्ध एवं पवित्र करके मां चन्द्रघण्टा के शरणागत होकर उनकी उपासना आराधना मंे तत्पर हों। उनकी उपासना से हम समस्त सांसरिक कष्टों से विमुक्त होकर सहज ही परमपद केे अधिकारी बन सकते हैं। हमें निरंतर उनके पवित्र विग्रह को ध्यान मंे रखते हुए साधना की ओर अग्रसर होने का प्रयत्न करना चाहिए। उनका ध्यान हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिये परमकल्याणकारी और सद्गति को देने वाला है।
पिण्ढाजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते महृां चन्द्रघण्टेति विश्रुता।।

4.कूष्माण्डा देवी
नवरात्रि के चैथे दिन कूष्माण्डा देवी की पूजा की जाती है। नवरात्रि के चैथे दिन भक्त मन अनाहत चक्र में अवस्थित होता है। इस दिन भक्त को पवित्र एवं शांत मन से माता कूष्माण्डा को स्मरण कर आराधना करनी चाहिए। माता कूष्माण्डा अपने भक्तों को रोग शोक मुक्त करती हैं। इनकी भक्ति द्वारा आयु, यश, बल तथा आयोग्य का विकास होता है। सच्चे हृदय से माता कूष्माण्डा के शरण में जाने से भक्तों को परम पद प्राप्त हो जाता है।


देवी कुष्मांडा की साधना का संबंध सूर्य से है। कालपुरूष सिद्धांतानुसार कुष्मांडा का संबंध कुंडली के पंचम व नवम भाव से है। अतः देवी कुष्मांडा की साधना का संबंध व्यक्ति की सेहत, मानसिकता, व्यक्तित्व, रूप, विद्या, प्रेम, उद्दर, भाग्य, गर्भाशय, अंडकोष व प्रजनन तंत्र से है। वास्तु शास्त्र के अनुसार देवी कुष्मांडा की दिशा पूर्व है। इनकी पूजा का श्रेष्ठ समय हैं सूर्योदय। इनकी पूजा लाल रंग के फूलों से करनी चाहिए। इन्हें सूजी से बने हलवे का भोग लगाना चाहिए व श्रृंगार में इन्हें रक्त चंदन प्रिय है। इनकी साधना उन लोगों को सर्वश्रेष्ठ फल देती है जिनकी आजीविका राजनीति, प्रशासन हो। इनकी साधना से निसंतान को संतान की प्राप्ति होती है, प्रोफैशन में सफलता मिलती है, नौकरी में प्रमोशन मिलता है।
हमें चाहिए कि हम शास्त्रों-पुराणों में वर्णित विधि विधान के अनुसार मां दुर्गा की उपासना और भक्ति के मार्ग पर अहर्निश अग्रसर हों। मां के भक्ति मार्ग पर कुछ ही कदम आगे बढ़ने पर साधक को उनकी कृपा का सूक्ष्म अनुभव होने लगता है। यह दुखः स्वरूप संसार उसके लिये अत्यंतसुखद और सुगम बन जाताहै। मां की उपासना मनुष्य को सहज भाव से भवसागर से पार उतारने के लिये सर्वाधिक सुगम और श्रेयस्कर मार्ग है। मां कूष्माण्डा की उपासना मनुष्य को अधियों व्याधियों से सर्वथा विमुक्त करके उसे सुख, समृद्धि और उन्नति की ओर जाने वाली है। अतः अपनी लौकिक-परलौकिक उन्नति चाहने वालों को इनकी उपासना में सदैव तत्पर रहना चाहिए।
सुरासम्पर्णकलशं रूधिराप्लुत्मेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूश्माण्डा शुभदास्तु में।।

5.मां स्कंदमाता
नवरात्रि के पंाचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा अर्चना की जाती है। इस दिन भक्त का मन विशुद्ध चक्र में अवस्थित होता है। स्कंदमाता की गोद में भगवान स्कंद सुशोषित होते हैं। इनकी चार भुजाएं हैं। दाहिनी ऊपरी तीन भुजाओं से स्कंदमाता भगवान स्कंद की गोद में पकड़ी हुई हैं। दाहिनी ऊपर उठी हुई निचलीभुजा में वह कमल का पुष्प धारण की हुई हैं। वरमुद्रा में बांयी ऊपर वाली भुजा तथा निचली भुजा जो ऊपर उठी हुई हैं इनमें स्कंदमाता कमल का पष्प धारण की हुई है। श्वेतवर्णी स्कंदमाता कमल के आसन पर विराजमान रहती है।

यही कारण है कि इन्हें पद्मासना देवी के नाम से भी जाना जाता है। इस चक्र में चंचल मन वाले भक्त की समस्त चित्तवृत्तियां विलुप्त हो जाती हैं। नवरात्रि पूजन के पांचवे स्कंदमाता की आराधना के पश्चात भक्त विशुद्ध चैतन्यस्वरूपा हो जाता है। वह सांसारिक मायामोह से मुक्त होकर पूर्णतः स्कंदमाता के स्वरूप में ही तल्लीन हो जाता है। स्कन्दमाता की आराधना के समय भक्त को ध्यान एकाग्रचित कर पूर्णतः सावधानी के साथ उपासना करनी चाहिए। समस्त वृत्तियों का त्याग कर भक्ति के मार्ग पर अग्रसर होना चाहिए। सांसारिक सुख-दुख के साथ अर्थात् मृत्युलोक के कर्तव्यों का वर्णन करते हुए स्कंदमाता की उपासना के फलस्वरूप भक्त की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा उसे सुख और शांति की सुखद अनुभूति होती है। स्कन्दमाता की उपासना के साथ ही साथ भगवान स्कंद की भी उपासना स्वयंमेव हो जाती है। देवी के नवों रूपों में मात्र स्कंदमाता को ही यह विशेषता प्राप्त है। अतः इनकी उपासना से भक्त को अतिरिक्त फल की प्राप्ति होती है। इसलिए भक्त को इनकी उपासना की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। स्कंदमाता सूर्यमण्डल की अधिष्ठात्री देवी हैं। अतः भक्तों को पवित्र भाव से एकाग्रचित्त होकर मां के शरण में जाना चाहिए। यह वैकुण्ठ प्राप्त करने का सरल एवं उत्तम साधन है।
संहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरंद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी।।

6. मां कात्यायनी
अमोघ फलदायिनी हैं। भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा कालिंदी यमुना के तट पर की थी। ये ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत भव्य एवं दिव्य है। इनके देह का वर्ण स्वर्ण के समान चमकीला और भास्वर है। मां कात्यायनी की आठ भुजायें हैं। दाहिनी तरफ का ऊपर हाथ अभयमुद्रा में है तथा नीचे वाला हाथ वरमुद्रा में हैं। बायें तरफ के ऊपर वाले हाथ में नीचे वाले हाथ में कमलपुष्प सुशोभित है। मां कात्यायनी सिंह की सवारी करती है।


नवरात्र के छठे दिन भक्त आज्ञा चक्र में स्थित होता है। योग साधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इस चक्र में स्थित मनवाला साधक मां कात्यायनी का भक्त अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त होता है। रोग, शोक, संताप, भय आदि बाधायें उसे छू नहीं पाती हैं। जन्म-जन्मान्तर के पापों को विनष्ट करने के लिए मां उपासना से अधिक सुगम और सरल मार्ग दूसरा नहीं है। इनका उपासक निरंतर इनके सानिध्य में रहकर परमपद प्राप्त करता है। अतः हमें सर्वतोभावेन् मां के शरणागत होकर उनकी पूजा उपासना के लिए तत्पर होना चाहिए।
एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रय भूषितम्।
यातु नः सर्वभीतिभ्यः कात्यायनि नमोस्तुते।।

चन्द्रहासोज्जवलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दघाघेवी दानवघातिनी।।

7. मां कालरात्रि
दुर्गा पूजा के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा का विधान है। इस दिन साधक का मन सहसार चक्र में स्थित रहता है। अतः विश्व की समस्त सिद्धियों की प्राप्ति के लिए द्वार खुला रहता है। इस चक्र में स्थित साधक का मन पूर्णतः कालरात्रि के स्वरूप में अवस्थित रहता है। भगवती कालरात्रि के भक्तों के संपर्क में आने वाला भी विशेष पुण्य ाक भागीदार बन जाता है। उसके समस्त पाप दोष विनष्ट हो जाते हैं। उसे परम पद प्राप्त होता है। मां कालरात्रि आततायियों का विनाश करने वाली हैं। दानव, दैत्य, राक्षस, भूत, प्रेत आदि इनके स्मरण मात्र से ही भयभीत हो कर भाग जाते हैं। भगवती कालरात्रि की आराधना से भक्त ग्रह बाधाओं से मुक्त हो जाता है। इनके उपासक को, अग्नि-भय, जल-भय, जन्तु-भय, शत्रु-भय, रात्रि-भय आदि कभी नहीं होते। मां कालरात्रि की असीम अनुकम्पा से इनके भक्त सर्वथा भयमुक्त रहते हैं।


मां कालरात्रि के स्वरूप-विग्रह का स्मरण कर भक्त को एकाग्रचित्त होकर उपासना करनी चाहिए। यम, नियम, संयम का पूर्णरूपेण अनुपालन होना चाहिए। मन, वचन, कर्म से पर्णतः शुद्ध होना चाहिए। शुभंकारी देवी की अर्चना से अनगिनत शुभ फलों की प्राप्ति होती है। अतः मानवमात्र को सदैव उनका स्मरण , ध्यान और पूजन करना चाहिए।
सृष्टि स्थिति विनाशनां शक्ति भूते सनातनी।
गुणाश्रये गुणामये नारायणि नमोस्तुते।

एकवेणी जजाकर्णपूरा नग्ना सवरास्थिता।
लम्बोष्ठी कणिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।।
वामपादोल्लेहलताकण्टकभूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी।।

8. मां महागौरी
देवाधिदेव भगवान शंकर की प्राप्ति के लिए महागौरी ने जो कठोर तप किया। उसके फलस्वरूप उनकी संपूर्ण काया श्यामल वर्ण की हो गयी है। परंतु इनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने महागौरी के शरीर को गंगाजी के पवित्र जल से मलकर धोया। तत्पश्चात वह बिजली की किरण की भांति अत्यंत कांतिमान और गौर हो उठा। तभी से यह महागौरी के नाम से विख्यात हुई। नवरात्र के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। इनकी शक्ति अमोघ और सद्यः फलदायिनी है। भगवती महागौरी की आराधना से इनके भक्तों के सभी पाप-दोष धुल जाते हैं। साथ ही पूर्वजन्मों के पाप भी नष्ट हो जाते हैं। पाप-दोष, दुख, दरिद्रता, विपत्ति उसे छू भी नहीं पाती।

इनके भक्तों को सभी प्रकार के पुण्य प्राप्त होते है। मां महागौरी की पूजा अर्चना, ध्यान, स्मरण, साधकों के लिए सर्वथा मंगलमय होती है। मानव मात्र को सदैव मां महागौरी का स्मरण करना चाहिए। इनकी असीम अनुकम्पा से भक्तों को अलौकिक सिद्वियां प्राप्त होती हैं। मनुष्य को ध्यान एकाग्रचित्त कर महागौरी का स्मरण करना चाहिए। इनकी अपने भक्तों पर विशेष कृपा होती है। इनकी उपासना से भक्तों के रूके कार्य पूर्ण होते हैं। अतः हमेशा मनुष्य को महागौरी की शरणागत बनना चाहिए। ये मानव की सत्वृत्तियों को प्रेरित करती है। इनकी उपासना से भक्तों के रूके कार्य पूर्ण होते हैं। अतः हमेशा मनुष्य को महागौरी की शरणागत बनना चाहिए। ये मानव की सत्वृत्तियों को प्रेरित करती हैं तथा असत् वृत्तियों का विनाश करती हैं।
श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दघान्महादेवप्रमोददा।।

9. सिद्धिदात्री
मां दुर्गाजी की नवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। सभी प्रकार की सिद्धि अर्थात् मोक्ष प्रदान करने वाली मां भगवती का एक स्वरूप सिद्धिदात्री भी है। सिद्धि की इच्छा रखने वाला मनुष्य उनकी सेवा करता हे। उन्हें देवता सब ओर से घेरे रहते है। उनका ध्यान करने से मनुष्य संसार के नाना प्रकार के सुखों को भोगकर अंत में मोक्ष प्राप्त करता है।


मार्कण्डेय पुराण के अनुसार आठ सिद्धियां इस प्रकार हैं-अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति , प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्वा।
ब्रह्म वैवर्तपुराण के श्रीकृष्ण जन्म खण्ड में यह संख्या अट्ठारह सिद्धियां इस प्रकार हैं-1.अणिमा, 2.महिमा, 3.भावना, 4. लघिमा, 5. प्रप्ति, 6.प्राकाम्य, 7.ईशित्व,वशित्वा, 8. सर्वकामावसियिता 9. वाक्सिद्धि, 10. परकायप्रवेशन, 11. सर्वज्ञत्व, 12. दूरश्रवण, 13. कल्पवृक्षत्व, 14.सृष्टि, 15. संहारकरणसामथ्र्य, 16. अमरत्व, 17. सर्वन्यायकत्व, 18. सिद्धि।
नवरात्र के आठ दिन आठों देवियों की शास्त्रीय विधि विधान से पूजा अर्चना करने के पश्चात नवें दिन मां सिद्धिदात्री की संपूर्ण विधि विधान से उपासना करने में साधक प्रवृत्त हो जाता है। सिद्धिदात्री मां की अर्चना द्वारा साधक की सभी मनोकामनायें पूर्ण होती हैं। उसकी कोई भी आकांक्षा शेष नहीं बचती। मां भगवती की कृपा से साधकगण लौकिक स्तर से ऊपर उठकर अलौकिक स्तर तक पहंुच जाता है।
उसे मां भगवती का सन्निध्य प्राप्त होता है। उसे परम् पद प्राप्त होता है। उसके बाद उसकी कोई इच्छा नही बचती ।
सिद्धगन्धर्वयक्षाघैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।
 

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