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देशहित मे 370 हटना

-अनिल अनूप
अनुच्छेद 370 के हटते ही पूरे देश में अद्भुत अनुभूति महसूस की जा रही है और लोह फैसले की  प्रशंसा हो रही है। 15 अगस्त, 1947 को देश आजाद हुआ। कश्मीर रियासत के महाराजा हरि सिंह ने कश्मीर के भारत में विलय को मंजूरी दे दी, जिस पर 27 अक्तूबर, 1947 को गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन ने दस्तखत कर दिए। जम्मू्-कश्मीर को विशेष दर्जा देने के लिए संविधान में अनुच्छेद 370 लाया गया, जिसके जरिए संसद को अधिकार मिला कि वह रक्षा, विदेश मामले और संचार के बारे में जम्मू्-कश्मीर के लिए कानून बना सकती है, जिसे राज्य सरकार की मंजूरी लेनी होती है, यह प्रावधान अब नहीं है। जम्मू-कश्मीर से जुड़ा एक और प्रावधान था, 35-ए का, आइए इनका अतीत जांचें और समझे कि इससे मुक्ति कितनी महत्त्वपूर्ण थी। तत्कालीन  राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद ने 14 मई, 1954 को एक आदेश के जरिए 35-ए को लागू किया, यह अनुच्छेद जम्मू-कश्मीर की सरकार और वहां की विधानसभा को जम्मू-कश्मीर का स्थायी नागरिक तय करने का अधिकार देती है। इसी के आधार पर 1956 में जम्मू-कश्मीर ने राज्य में स्थायी नागरिकता की परिभाषा तय कर दी, जो अब सबसे बड़ी विवाद की जड़ है। 35-ए के मुताबिक जम्मू-कश्मीर का नागरिक उसे माना जाएगा, जो 14 मई, 1954 से पहले राज्य का नागरिक रहा हो।

वह 14 मई, 1954 से पहले 10 साल तक जम्मू-कश्मीर में रहा हो और उसके पास जम्मू-कश्मीर में संपत्ति हो। इस नियम के तहत दूसरे राज्यों में भारतीय नागरिकों को जो मूल अधिकार मिल रहे हैं, उनके उल्लंघन को लेकर याचिका भी दाखिल नहीं की जा सकती है, यानी यह अनुच्छेद दूसरे राज्यों के जैसे नागरिकों के अधिकार हासिल करने पर पूरी तरह से रोक देता है। जम्मू-कश्मीर की नागरिकता हासिल की हुई कोई लड़की अगर किसी गैर कश्मीरी से शादी करती है, तो एक कश्मीरी को मिलने वाले सारे अधिकार वह खो देती है। जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने 2002 में कहा था कि अगर कोई महिला किसी गैर कश्मीरी से शादी करती है, तो वह अपने कश्मीरी अधिकार रख सकती है, लेकिन उसके बच्चे को कोई अधिकार नहीं मिलेगा। इस नए नियम की वजह से उन लोगों को खासतौर पर दिक्कत होनी शुरू हुई, जो देश विभाजन के बाद पाकिस्तान से हिंदोस्तान आए थे। पाकिस्तान से आए जो लोग जम्मू-कश्मीर पहुंचे, उन्हें अनुच्छेद 35-ए नागरिकता नहीं देता है, क्योंकि जब यह लागू किया गया, उस वक्त तक उन्हें आए हुए महज सात साल ही हो पाए थे। ऐसे में हजारों लोगों को नागरिकता नहीं मिल पाई, न तो वे वोटर रहे और न ही उन्हें किसी तरह के अधिकार दिए गए। वहीं जो लोग जम्मू-कश्मीर के अलावा देश के किसी और हिस्से में गए, उन्हें आम हिंदोस्तानी की तरह सारे अधिकार मिल गए। इसलिए जो लोग पाकिस्तान से हिंदोस्तान बेहतरी की आस में आए थे, वे और उनकी पीढि़यां 63 साल के बाद भी शरणार्थियों की तरह रहने को मजबूर हैं। ऐसे में ये लोग न तो जम्मू-कश्मीर में अपने लिए जमीन-जायदाद खरीद सकते हैं, न ही राज्य के लिए होने वाले चुनाव में वोट दे सकते हैं। राज्य में होने वाला चुनाव भी खुद नहीं लड़ सकते हैं। इसके अलावा वे सरकारी नौकरी भी हासिल नहीं कर सकते हैं, हालांकि ये लोग भारत के नागरिक हैं, लोकसभा के लिए वोट दे सकते हैं और देश के किसी दूसरे राज्य में आने-जाने के लिए स्वतंत्र हैं। ये लोग राज्य के चुनाव में शामिल नहीं हो सकते, लेकिन ये लोग राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री तक हो सकते हैं। एक आंकड़े के मुताबिक 1947 में 5764 परिवार पश्चिमी पाकिस्तान से आकर जम्मू में बसे थे, इन परिवारों में लगभग 80 प्रतिशत दलित थे, जिनकी चौथी पीढ़ी यहां रह रही है। इसके अलावा गोरखा समुदाय के भी लोग हैं, जिन्हें राज्य के नागरिक होने का कोई अधिकार हासिल नहीं है। सन् 1957 में जम्मू-कश्मीर सरकार की कैबिनेट ने एक फैसला लिया था, जिसके तहत एक खास समुदाय के 200 परिवारों को विशेष सफाई कर्मचारी के तौर पर बुलाया गया था। ये लोग पिछले 60 साल से जम्मू में सफाई कर्मचारी के तौर पर काम कर रहे हैं, जिन्हें जम्मू-कश्मीर के निवासी का दर्जा हासिल नहीं है। आर्टिकल 35-ए को संसद के जरिए लागू नहीं करवाया था और दूसरा, देश के बंटवारे के समय पाकिस्तान से लोगों की बड़ी संख्या भारत में दाखिल हुई। इनमें से जो लोग जम्मू-कश्मीर में हैं, उन्हें वहां की नागरिकता भी प्राप्त हो चुकी है। बता दें कि अनुच्छेद 35-ए के जरिए जम्मू-कश्मीर सरकार ने 80 फीसदी पिछड़े और दलित हिंदू समुदाय के भारतीय नागरिकों को राज्य के स्थायी निवासी प्रमाण पत्र से वंचित कर दिया। साथ ही जम्मू-कश्मीर सरकार ने अनुच्छेद 35-ए की आड़ लेकर उन लोगों के साथ भेदभाव किया है, जो विवाह कर महिलाएं यहां आती हैं। माना जा सकता है कि धारा 370 ने कश्मीर के विकास के सारे रास्ते बंद कर रखे थे और अगर ऐसा ही रहता, तो वह दिन दूर नहीं था, जब कश्मीर की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से समाप्त हो जाती। बता दें कि एक तरफ कश्मीर में आतंकवाद और बेरोजगारी ने वैसे ही अपनी जड़ें जमा रखी हैं, जिसकी वजह से यहां की अर्थव्यवस्था कुछ खास ऊपर नहीं उठ पा रही है, वहीं दूसरी तरफ अब कश्मीर का कृषि क्षेत्र भी प्रभावित होता जा रहा है, जो कि काफी गंभीर मुद्दा है। अब यहां पर यह सवाल उठता है कि अगर कश्मीर के यही हालात रहे, तो वहां के युवाओं के भविष्य का क्या होगा? कश्मीर अब अपनी प्रमुख कृषि भूमि और जलमय भूमि क्षेत्र खो रहा है। अगर सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें, तो कश्मीर सालाना औसत 1375 हेक्टेयर कृषि भूमि खो रहा है, जो करीब 1527 फुटबॉल मैदानों के आकार के बराबर है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1996 में कश्मीर में धान की खेती के लिए 163000 हेक्टेयर जमीन थी, जो घटकर वर्ष 2012 में 141000 हेक्टेयर ही रह गई थी। कश्मीर में कृषि भूमि की हानि से अनाज और खाद्य पदार्थों के मूल्य पर भी काफी असर पड़ा है। एक आर्थिक सर्वेक्षण से पता चला है कि कश्मीर की यह स्थिति हो गई है कि वह अन्य राज्यों से अनाज के आयात पर निर्भर हो गया है और यह निर्भरता हर रोज बढ़ती ही जा रही है, जो कि एक गंभीर समस्या है। कुल मिलाकर राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक नजरिए से अनुच्छेद 370 का हटाया जाना, घाटी के विकास में मील का पत्थर साबित होगा और देश के सांस्कृतिक एकीकरण में योगदान देगा।

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