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हमारी नदियों पर निर्भर है पाकिस्तान की 2.6 करोड़ एकड़ जमीन की सिंचाई

अनिल अनूप

आप पहले नीचे दिए ट्वीट को गौर करें और फिर हमारे विश्लेषण को पढें ।

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विदेश मंत्री जयशंकर के सामने प्रमुख चुनौती पाकिस्तान के साथ सम्बन्धों को सुधारने की है। हमने पाकिस्तान को आर्थिक दृष्टि से घेरने का प्रयास किया था। बीती एनडीए सरकार ने पाकिस्तान से आने वाले माल पर आयात कर वृद्धि की थी, लेकिन यह पाकिस्तान को भारी नही पड़ रहा है चूंकि पाकिस्तान के कुल निर्यातों में केवल 1.4 प्रतिशत भारत को जाते हैं। पाकिस्तान ने सऊदी अरब और चीन से मदद लेने में सफलता हासिल की है। अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी उससे मदद की है। अतः हमारी आर्थिक मोर्चेबंदी सफल नहीं हुई है। ऐसे में श्री जयशंकर के सामने पाकिस्तान को घेरने के उपाय सीमित हैं। यह सही है कि भारत ने अमरीका के साथ अच्छे सम्बन्ध बनाकर पाकिस्तान पर दबाव डलवाना है लेकिन यह भी सही है कि अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में अमरीका का वर्चस्व है। अतः मुद्रा कोष द्वारा पाकिस्तान को मदद देना बताता है कि अमरीका पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर नहीं करना चाहता है।

इस दुरूह परिस्थिति में हमें सिन्धु समझौते पर पुनः विचार करना चाहिए। स्वतंत्रता के शीघ्र बाद प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के बीच समझौता हुआ था कि सिन्धु घाटी की 6 नदियों में से 3 नदियों के जल पर भारत का अधिकार होगा और 3 नदियों पर पाकिस्तान का अधिकार होगा। पाकिस्तान के कोटे में सिन्धु, चिनाव और झेलम नदियाँ, डाली गई थी। इनके द्वारा पाकिस्तान को हर वर्ष 8 करोड़ एकड़ फुट पानी रखा जाए तो उस पानी को एक एकड़ फुट कहा जाता है। इसके विपरीत भारत को ब्यास, रावी और सतलुज नदी आवंटित की गई, लेकिन भारत इन नदियों के सम्पूर्ण जल का उपयोग करने में सफल नहीं हुआ है। आज भी इन नदियों का 3.3 करोड़ एकड़ फुट पानी पाकिस्तान को बह रहा है। इस प्रकार पाकिस्तान को वर्तमान में 11.3 करोड़ एकड़ फुट पानी भारत की भूमि से बहकर मिल रहा है। पाकिस्तान में कुल पानी की उपलब्धता 14.5 करोड़ एकड़ फुट है। यानी पाकिस्तान को उपलब्ध पानी में से लगभग 80 प्रतिशत पानी भारत से मिल रहा है। आश्चर्य की बात है कि भारत पर इतना परावलम्बी होने के बावजूद पाकिस्तान हमारे विरुद्ध आतकियों को पोषित कर रहा है। बीती एनडीए सरकार ने ब्यास, रवि और सतलुज नदियों के भारत के कोटे के 3.3 करोड़ एकड़ फुट पानी का भारत में ही उपयोग करने के कदम उठाए हैं और आशा की जा सकती है कि वर्तमान सरकार के समय यह पानी हम पूरी तरह से उपयोग कर सकेंगे। तब यह पानी पाकिस्तान को मिलना बन्द हो जाएगा। इससे पाकिस्तान की समस्या बढ़ेगी क्योंकि वर्तमान में 11.3 करोड़ एकड़ फुट पानी जो सिन्धु घाटी के माध्यम से उसको मिल रहा है उसकी तुलना में आने वाले समय में केवल 8 करोड़ एकड़ एक फुट पानी मिलेगा। फिर भी पाकिस्तान का रवय्या सुधरता नहीं दिख रहा है।

इस परिस्थिति में हमें सिन्धु जल समझौते को रद्द करने पर विचार करना चाहिए। यदि हम इस समझौते को रद्द कर दें और सिन्धु, चिनाव और झेलम के पानी को रोक लें, तो पाकिस्तान बहुत शीघ्र ही घुटने टेक देगा। समस्या यह है कि सिन्धु जल समझौते में व्यवस्था दी गई है कि उस समझौते में कोई भी परिवर्तन आपसी सहमती से ही किया जाएगा और मतभेद होने पर विश्व बैंक की मध्यस्तता की पहल की जाएगी। इस प्रावधान के अनुसार हम एक तरफा कार्यवाही से समझौते को रद्द नहीं कर सकते हैं, लेकिन कानून का एक मूल सिद्धान्त है कि कानून की विवेचना उसकी प्रस्तावना के मद्देनजर की जाती है। जिस उद्देश्य से कानून बनाया गया है। उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही कानून की विवेचना की जानी चाहिए। सिन्धु जल समझौते की प्रस्तावना में लिखा गया है कि आपसी सौहार्द और मित्रता की भावना से पाकिस्तान और भारत इस समझौते में प्रवेश कर रहे हैं। हमने जो सिन्धु, चिनाव और झेलम नदियों का पानी पाकिस्तान को देने को स्वीकार किया, उसका उद्देश्य था कि पाकिस्तान और भारत के बीच सौहार्द और मित्रता बनी रहेगी। यदि पाकिस्तान ने यह सौहार्द और मित्रता ही नहीं बनाया हैं और हमारे विरुद्ध आतंकवाद को पोषित कर रहा है तो इस बदली हुई परिस्थिति में समझौते का औचित्य ही नहीं रह जाता है। अतः हम समझौते को पूरी तरह रद्द कर सकते हैं। ध्यान दें कि जब हम समझौते के अन्तर्गत कुछ सुधार करना चाहें यानी समझौते को स्वीकार करते हुए उसमें परिवर्तन करना चाहें तो आपसी सहमति जरूरी है, लेकिन यदि हम समझौते को ही रद्द करते हैं तो उसके साथ वह धारा भी रद्द हो जाती है जिसमें आपसी सहमति की बात की गई है। इसलिए समझौते को रद्द करने में आपसी सहमति की धारा बीच में नहीं आती है। यदि हम समझौते को तत्काल रद्द न करना चाहें तो भी पाकिस्तान को नोटिस देकर विश्व बैंक की मध्यस्तता तो माँग ही सकते हैं। हम कह सकते हैं कि हम इस समझौते को रद्द करना चाहते हैं क्योंकि इससे आपसी सौहार्द और मित्रता स्थापित नहीं हो रही है और विश्व बैंक से कहें कि वह मध्यस्तता करे और उस मध्यस्तता में यदि सफलता नहीं मिलती है तो हम इस सन्धि को रद्द कर सकते हैं। ध्यान दें कि विश्व बैंक की मध्यस्तता यदि सफल नहीं होती है तो उस हालत में क्या किया जाएगा, इसका कोई विवरण सिन्धु जल सन्धि में नहीं दिया गया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जम्मू-कश्मीर में भारत को हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर की जरूरत को पूरा करने के लिए पानी की आवश्यकता है, लेकिन सिंधु जल संधि को तोड़ देना एक विवादित विषय है। दरअसल पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारत-पाकिस्तान के बीच जितनी बार विवाद बढ़ा है, उतनी बार सिंधु जल समझौते को तोड़ने की बात उठती रही है। जब कश्मीर के उड़ी में सेना मुख्यालय पर हमले के बाद भारत ने जल विवाद पर दिल्ली में होने वाली बैठक को भी रद्द कर दिया था।

विशेषज्ञों का यह कहना है कि भारत ने 1960 में यह सोचकर पाकिस्तान से संधि पर हस्ताक्षर किए कि उसे जल के बदले शांति मिलेगी, लेकिन संधि के अमल में आने के पांच साल बाद ही पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर पर 1965 में हमला कर दिया था। पड़ोसी देश की 2.6 करोड़ एकड़ कृषि भूमि सिंचाई के लिए इन नदियों के जल पर निर्भर है। यदि भारत इनका पानी अवरुद्ध कर दे तो पाकिस्तान की कमर टूट जाएगी।

भारत और पाकिस्तान के मध्य 1960 की सिंधु जल संधि के तहत स्थायी सिंधु आयोग की स्थापना की गई थी। इस संधि के तहत आयोग को संधि के क्रियान्वयन सिंधु जल तंत्र के विकास के लिए दोनों पक्षों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने को सहयोगी व्यवस्था स्थापित करने और बनाए रखने की जिम्मेदारी दी गई। आयोग में दोनों देशों का प्रतिनिधित्व उनके आयुक्त करते हैं।
आजादी के समय से जारी है यह विवाद

1947 में पंजाब के विभाजन के कारण भारत और पाकिस्तान के बीच नहर के पानी को लेकर विवाद खड़ा हो गया था। नहरें आर्थिक नजरिए से उस वक्त बनाई गई थीं जब विभाजन का विचार किसी के मन में नहीं था, लेकिन विभाजन के कारण नहरों के पानी का बंटवारा असंतुलित हो गया। पंजाब की पांचों नदियों में से सतलुज और रावी दोनों देशों के मध्य से बहती हैं। वहीं झेलम और चिनाब पाकिस्तान के मध्य से और व्यास पूर्णतया भारत में बहती हैं।

लेकिन भारत के नियंत्रण में वे तीनों मुख्यालय आ गए जहां से दोनों देशों के लिए इन नहरों को पानी की आपूर्ति की जाती थी। पाकिस्तान का पंजाब और सिंध प्रांत सिंचाई के लिए इन नहरों पर ही निर्भर है। पाकिस्तान को लगने लगा कि भारत जब चाहे तब पानी बंद करके उसकी जनता को भूखा मार सकता है। इसीलिए विभाजन के बाद पानी विवाद शुरू हो गया। 1947 में कश्मीर को लेकर जंग लड़ चुके दोनों देशों के बीच एक बार फिर से तनाव बढ़ने लगा।
विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुआ था एग्रीमेंट

1949 में एक अमेरिकी विशेषज्ञ डेविड लिलियेंथल ने इस समस्या को राजनीतिक स्तर से हटाकर टेक्निकल और व्यापारिक स्तर पर सुलझाने की सलाह दी। लिलियेंथल ने विश्व बैंक से मदद लेने की सिफारिश भी की। सितंबर 1951 में विश्व बैंक के अध्यक्ष यूजीन रॉबर्ट ब्लेक ने मध्यस्थता करना स्वीकार किया। सालों तक बातचीत चलने के बाद 19 सितंबर 1960 को भारत और पाकिस्तान के बीच जल पर समझौता हुआ। संधि के मुताबिक इस आयोग की साल में कम से कम एक बैठक भारत-पाकिस्तान में होनी चाहिए। आयोग की 113वीं बैठक पिछले वर्ष 20 से 21 मार्च तक पाकिस्तान में हुई थी।
क्या रद्द हो सकती है संधि?

सिंधु के पानी को लेकर दोनों के बीच खींचतान भी चलती रही है। पाकिस्तान भारत की बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं पाकल (1,000 मेगावाट), रातले (850 मेगावाट), किशनगंगा (330 मेगावाट), मियार (120 मेगावाट) और लोअर कलनाई (48 मेगावाट) पर आपत्ति उठाता रहा है। हालांकि जानकार यह भी कहते हैं कि कश्मीर अपने जलसंसाधनों का पूरा उपयोग नहीं कर पा रहा है। जब महबूबा मुफ्ती जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री थीं, तो उन्होंने कहा था कि सिंधु जल संधि से राज्य को 20 हजार करोड़ का नुकसान हो रहा है। इसके लिए केंद्र को कुछ करना चाहिए।

विशेषज्ञ यह कह चुके हैं कि भारत वियना समझौते के लॉ ऑफ ट्रीटीज की धारा 62 के अंतर्गत यह कहकर पीछे हट सकता है कि पाकिस्तान चरमपंथी गुटों का उसके खिलाफ इस्तेमाल कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने कहा है कि अगर मूलभूत स्थितियों में परिवर्तन हो तो किसी संधि को रद्द किया जा सकता है।
ये हैं सिंधु समझौते से जुड़ी खास बातें

समझौते के अंतर्गत सिंधु नदी की सहायक नदियों को पूर्वी और पश्चिमी नदियों में विभाजित किया गया। सतलज, व्यास और रावी नदियों को पूर्वी नदी बताया गया, जबकि झेलम, चेनाब और सिंधु को पश्चिमी नदी बताया गया।

समझौते के अंतर्गत एक स्थायी सिंधु आयोग की स्थापना की गई। इसमें दोनों देशों के कमिश्नर हर कुछ वक्त में एक दूसरे से मिलेंगे और किसी भी परेशानी पर बात करेंगे।

समझौते के मुताबिक पूर्वी नदियों का पानी (कुछ अपवादों को छोड़े दें) भारत बिना रोकटोक के इस्तेमाल कर सकता है। पश्चिमी नदियों का पानी पाकिस्तान के लिए होगा। लेकिन समझौते के भीतर इन नदियों के पानी का कुछ सीमित इस्तेमाल का अधिकार भारत को दिया गया।

अगर कोई देश किसी प्रोजेक्ट पर काम करता है और दूसरे देश को उसकी डिजाइन पर आपत्ति है तो दूसरा देश उसका जवाब देगा। समस्या हो तो बैठकें होंगी।

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