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ऐतिहासिक महत्व है “भोजली पर्व “का

शंकर यादव

भोजली का पर्व मितानी- मितान के नाम से जाना जाता है ।हमारे छत्तीसगढ़ के लोक पर्व भोजली माँ सुख शांति का सन्देश देती है । सावन के महिने में भोजली पर्व का त्यौहार होता है। भोजली के भुईया म पानी रही। विशवास और आस्था के प्रतीक आये भोजली सावन के अंजोरी पख के नवमी के दिन गेंहू ल एक कर के झेझरा के माटी में बोथे झेझर आधियार म रखती और छोटे- छोटे पौधा निकलती और भोजली देवी कहती भोजली देवी के गीत गाकर पानी बिना मछली पवन बिना घाने। सेवा बिना भोजली के तरसे प्रराने ।

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सात दिन के सेवा कर के भोजली देवी के राखी के दूसरे दिन भादो के महिना मैं लगाते है भोजली विसर्जन के बेरा टी ठंठा कर के छोटे छोटे नोनी मन भोजली ल मुड़ी मा बोहकर गीत गा कर चल ते देवी गंगा देवी गंगा लहर तुरग हो देवी गंगा हमरो भोजली देवी के भीजे ओवे अंगा हो देवी गंगा ।और गीत गाकर भोजली को विसर्जन करते है। और विसर्जन करने के बाद भोजली को एक दूसरे के कान में खोंच ते है। और सीताराम कहते है।

उस दिन को मितानी- मितान कहाँ जाता है।

भोजली महोत्सव समिति तोरवा बिलासपुर छ. ग अघ्यक्ष शंकर यादव तोरवा विवेकानंद नगर बिलासपुर छ.ग.।

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