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राष्ट्रीय गौरव की स्थापना

अनिल अनूप

पांच अगस्त का दिन भारत राष्ट्र और इसके गणतांत्रिक इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित हो चुका है। स्वतंत्रता के बाद से ही विवादित जम्मू-कश्मीर राज्य अब केन्द्रशासित प्रदेश बन चुका है। राजग ने अपने दूसरे कार्यकाल में ही इस संबंध में साहसिक निर्णय लेकर उस बहुमत वाले जनादेश का मान रख लिया, जिसके बल पर वह लगातार दूसरी बार केन्द्र की सत्ता में आरूढ़ हुई। गृहमंत्री ने जम्मू-कश्मीर में लागू संविधान का अनुच्छेद-370 समाप्त करने का संकल्प राज्यसभा में प्रस्तुत किया। भाजपा सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में अपने चुनावी घोषणा-पत्र के सभी बिंदुओं पर युद्धस्तर पर काम करती दिख रही है। इसकी झलक तब ही मिल गई थी, जब संसद के मानसून सत्र के आरंभ से लेकर ही सरकार ने देश की आर्थिक व सामाजिक प्रगति, राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति को सुदृढ़ करने संबंधी आधा दर्जन से अधिक विधेयक सफलतापूर्वक पारित करा दिए। चुनाव पूर्व और चुनावी संघर्ष के दौरान साफ दिख रहा था कि एनडीए के समर्थक उससे चार प्रमुख राष्ट्रीय काम कराने की आशा लगाए हुए थे। पहला, जम्मू-कश्मीर से संविधान के अनुच्छेद 370 और 35-ए को हटाना। दूसरा, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण। तीसरा, समान नागरिका संहिता लागू करने सहित राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाना और चौथा, भारत में घुसे बैठे करोड़ों अवैध बांग्लादेशियों सहित दूसरे लोगों को देश से बाहर करना। इन प्रमुख चार कार्यों में से अनुच्छेद 370 और 35-ए को खत्म करने का प्रथम कार्य तो पूरा हो चुका है।  जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन विधेयक के अनुसार लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग किया जाएगा और जम्मू-कश्मीर और लद्दाख दोनों को केन्द्र शासित प्रदेशों के रूप में संस्थापित किया जाएगा। जम्मू-कश्मीर में तो विधानसभा होगी परन्तु लद्दाख बिना विधानसभा वाला केंद्र शासित राज्य होगा। इसका तात्पर्य यह कि जम्मू-कश्मीर में तो सरकार होगी पर लद्दाख की स्थानीय सरकार नहीं होगी। कश्मीर में देश के दूसरे राज्यों के लोग भी जमीन ले सकेंगे। कश्मीर का अलग झंडा अस्तित्व में नहीं रहेगा। वहां भी तिरंगा लहराएगा। कश्मीर भी भारतीय संविधान की परिधि में आएगा। वहां के लोगों की दोहरी नागरिका समाप्त हो जाएगी। अनुच्छेद 370 का केवल खंड 1 लागू रहेगा। शेष समाप्त हो जाएंगे। खंड 1 भी राष्ट्रपति द्वारा लागू किया गया था, जिसे राष्ट्रपति के ही द्वारा कभी भी हटाया जा सकता है। इस खंड के अनुसार केन्द्रशासित जम्मू-कश्मीर सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति संविधान के अनेक अुच्छेदों को जम्मू-कश्मीर पर लागू कर सकते हैं। जम्मू-कश्मीर की लड़कियों को अब दूसरे राज्य के लोगों से भी शादी करने की आजादी होगी। दूसरे राज्य के लड़कों से उनकी शादी होने पर उनकी नागरिकता खत्म नहीं होगी। अनुच्छेद-370 में पहले भी कई बदलाव हुए।  1965 तक जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल की जगह सदर-ए-रियासत और मुख्यमंत्री की जगह प्रधानमंत्री हुआ करता था। 370 को खत्म करने की स्वीकृति राष्ट्रपति ने पहले ही दे दी थी। वास्तव में ये अनुच्छेद पूर्व में राष्ट्रपति द्वारा ही लागू किया गया था। 370 के उन्मूलन के बाद जम्मू-कश्मीर में निश्चित रूप में अमन-चैन कायम होगा। स्थानीय निवासियों को सर्वाधिक बहुमुखी लाभ होगा। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 370 ऐसा अनुच्छेद था जिसने जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिया। यह अनुच्छेद 5ा गया।
विशेष प्रावधानों के तहत मिलने वाले सुख, सुविधाओं, साधनों और संसाधनों में वृद्धि के लिए तो जम्मू-कश्मीर के नेताओं ने ”विशेष प्रावधान” में अपने हिसाब से संशोधन करवाए। पाक के परिरक्षण में और तुष्टिकरण में लिप्त भारतीय सरकारों के सहयोग से ऐसे संशोधन बिना लाग-लपेट के पूरे होते रहे। परन्तु जब दृष्टिगोचर होना शुरू हुआ कि राज्य में भारत विरोधी गतिविधियां बढऩे लगी हैं, स्थानीय नेता इन गतिविधियों में शामिल लोगों की राजनीतिक भाषा बोलने लगे हैं और राज्य पर पाक कुदृष्टि के चलते स्थानीय लोग व नेता पाकिस्तान जिंदाबाद कहने लगे हैं, तब भी 370 के ‘अस्थायी’ और ‘परिवर्ती’ वाले बिंदुओं पर काम करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति तत्कालीन भारतीय सरकारों में नहीं उभरी।
बाद में जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने बड़ी चालाकी से राज्य का संविधान बनाया तथा अनुच्छेद 370 के ‘अस्थायी, ‘परिवर्ती’ प्रावधानों से खुद को अलग कर एक प्रकार से इसे भंग कर दिया, पर ‘विशेष प्रावधान’ वाला प्रावधान यथावत बना रहा। 370 के साथ अनुच्छेद 35ए को भी कश्मीर के संबंध में बड़ी चतुराई और गुप्त तरीके से भारतीय संविधान में डाल दिया गया। 35ए जम्मू-कश्मीर राज्य विधानसभा को राज्य के ‘स्थायी निवासियोंÓ की परिभाषा तय करने और परिभाषित स्थायी निवासियों को विशेषाधिकार व असामान्य अधिकार देने के लिए सशक्त करता है। यह अनुच्छेद 14 मई 1954 को तत्कालीन भारतीय राष्ट्रपति द्वारा जा री राष्ट्रपति के आदेश अर्थात् संविधान (जम्मू एवं कश्मीर हेतु आवेदन) आदेश, 1954 के माध्यम से संविधान में जोड़ा गया।  370 और 35ए दोनों अनुच्छेद परिभाषित करते हैं कि जम्मू एवं कश्मीर राज्य के निवासी दूसरे भारतीय राज्यों की तुलना में पृथक कानूनी परिधि में रहेंगे। यानी कि उन्हें तो जम्मू एवं कश्मीर और भारत के किसी भी दूसरे राज्य का नागरिक होने, वहां सम्पत्ति खरीद उसका मालिकाना हक रखने और भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त तमाम मौलिक अधिकारों को पूरे भारत में कहीं भी प्राप्त करने के हकदार होंगे, लेकिन जम्मू एवं कश्मीर से बाहर किसी अन्य भारतीय राज्य के नागरिकों को ये सुविधाएं नहीं मिलेंगी। इस प्रावधान का सीधा अर्थ यह था कि कश्मीर को छोड़ भारत के दूसरे राज्यों का कोई भी नागरिक जम्मू में भूमि और सम्पत्ति नहीं खरीद सकता था। यह आसानी से समझा जा सकता है कि संविधान में इस तरह के अनुच्छेद शामिल करने की मंशा किसी भी स्तर पर राष्ट्र के हित में नहीं थी। यह परम संतोष की बात है कि एनडीए की इच्छाशक्ति से आज 370 और 35-ए कालातीत हो चुके हैं। निश्चित रूप से यह कदम ऐतिहासिक, अविस्मरणीय और अति प्रशंसनीय है। कश्मीर को लेकर भारतीय गणतंत्र पिछले 72 वर्षों में अत्यंत असुरक्षित, अविश्वसनीय और हास्यास्पद बन चुका था। भारत द्वारा पालित-पोषित एक राज्य के लोग दुश्मन देश और उसके इशारे पर चलनेवाले देशी-विदेशी नेताओं व आतंकियों के साथ मिलकर अपने ही गणतांत्रिक भूगोल के विरुद्ध छदम युद्ध छेड़े हुए थे। उक्त अनुच्छेदों के लागू रहने के दौरान कश्मीर में तब के भाजपा संघवादी नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी सहित अनेक लोगों ने राष्ट्रीय गौरव की स्थापना के लिए अपने प्राणोत्सर्ग कर दिए।

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