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अंततः चिदंबरम आए गिरफ्त में

अनिल  अनूप

अंततः पूर्व केंद्रीय मंत्री पी.चिदंबरम गिरफ्तार कर लिए गए। वह देश के पहले पूर्व गृह और वित्त मंत्री हैं, जो भ्रष्टाचार के केस में गिरफ्तार किए गए हैं। करीब 27 घंटे तक उनके और कानून के बीच लुका छिपी का खेल जारी रहा। कानून के प्रतिरूप सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) अपना धर्म निभा रहे थे। चिदंबरम का अपना स्पष्टीकरण था। वह कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हैं।

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वह देश के गृह मंत्री और वित्त मंत्री रहे हैं। अभी राज्यसभा सांसद हैं और पेशे के तौर पर बड़े वकील माने जाते रहे हैं, लिहाजा वह कानून की बारीकियां भी जरूर जानते हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय ने उन्हें 22 बार अग्रिम जमानत दी, लेकिन जब जमानत से इनकार कर दिया, तब न्यायाधीश की टिप्पणी थी कि आरोपी चिदंबरम ‘घोटाले के किंगपिन’ (सरगना) हैं। यह मनी लांड्रिंग का क्लासिक उदाहरण है, लिहाजा उन्हें हिरासत में पूछताछ का सामना करना चाहिए। न्यायाधीश ने अपने आर्डर में यह भी स्पष्ट किया कि यह कोई ‘राजनीतिक रंजिश’ का केस नहीं है। आरोपी सांसद हैं, लेकिन कोई भी कानून से ऊपर नहीं है।

उच्च न्यायालय के 24 पन्नों के फैसले में चिदंबरम की जमानत इसलिए रद्द की गई, क्योंकि जांच एजेंसियों ने कुछ चौंकाने वाले तथ्य न्यायाधीश के सामने रखे थे। पूछताछ के दौरान भी चिदंबरम ने कई महत्त्वपूर्ण सवालों के जवाब नहीं दिए थे, बल्कि अहंकार में गर्दन अकड़ी रही, मानो वह अब भी सत्ता में हों। बेशक चिदंबरम करीब 27 घंटे तक कानून से भागते रहे, फिर भी हम उनके लिए ‘लापता’, ‘फरार’ या ‘भगोड़ा’ आदि शब्दों का प्रयोग नहीं करेंगे।  अदालत का अभी तक मानना है कि चिदंबरम 2007 में वित्त मंत्री थे, जब विवादास्पद तरीके से 305 करोड़ रुपए विदेशी निवेश के तौर पर आईएनएक्स मीडिया कंपनी में आए।

वित्त मंत्री के तौर पर चिदंबरम विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड की मंजूरी के लिए भी जिम्मेदार हैं। कहा जा रहा है कि इन तथ्यों का खुलासा सजायाफ्ता इंद्राणी मुखर्जी के जरिए हुआ है, जिन्हें अदालत ने ‘गवाह’ बनाया था। केटीएस तुलसी सरीखे प्रख्यात अधिवक्ता ऐसे खुलासों पर सवाल करते हैं। खुद चिदंबरम ने कांग्रेस मुख्यालय में मीडिया के सामने अचानक आकर सफाई दी कि वह और उनका परिवार आईएनएक्स घोटाले में आरोपी नहीं हैं और न ही कोई आरोप-पत्र अदालत में दाखिल किया गया है।

किसी एफआईआर (प्राथमिकी) में भी उनका नाम नहीं है। उनके नाम पर भ्रम फैलाया जा रहा है, लेकिन अदालत ने उनकी जवाबदेही ज्यादा व्यापक मानी है। कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद, अभिषेक मनु सिंघवी आदि उनके एक दर्जन वकीलों ने सर्वोच्च न्यायालय में दस्तक दी, लेकिन वरिष्ठ जस्टिस रमन्ना ने उनका केस सुनने से इनकार ही कर दिया और प्रधान न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई 23 अगस्त को सुनवाई कर सकते हैं, लेकिन अब चिदंबरम की गिरफ्तारी के बाद परिस्थितियां ही बदल गई हैं। लिहाजा अब जमानत की गुहार लगाई जा सकती है।

बहरहाल भ्रष्टाचार का दागदार मुद्दा एक बार फिर कांग्रेस के सामने खड़ा है। यह दीगर है कि राहुल और प्रियंका गांधी से लेकर अन्य कांग्रेस नेताओं तक सभी चिदंबरम के पक्ष में खड़े हैं और बयानबाजी कर रहे हैं। यह उनकी मजबूरी भी है। अब प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार में यह तय हो गया है कि भ्रष्ट कोई भी हो, भ्रष्टाचार किसी भी स्तर का हो, लेकिन कानून के कठघरे तक जाना ही पड़ेगा। बेशक अदालत उसे जेल भेजने का फैसला सुनाए, लेकिन भ्रष्टाचार से कोई समझौता नहीं होगा। कांग्रेस में ऐसे नेताओं की लंबी फेहरिस्त है, जो आज जमानत पर हैं और किसी न किसी भ्रष्टाचार के आरोपी हैं। कांग्रेस को एक लड़ाई अपने स्तर पर लड़नी पड़ेगी और दूसरी लड़ाई राजनीतिक स्तर पर होगी।

अभी तो सवाल यह है कि जनता को विश्वास कैसे दिलाया जाए कि चिदंबरम मासूम हैं, भ्रष्ट नहीं हैं। यह टेढ़ा काम है। हाईकोर्ट के फैसले की प्रति देखें, तो उसमें कई कंपनियों, संपत्तियों और एफडी का उल्लेख किया गया है। वे चिदंबरम के नाम हैं या उनके बेटे कार्ति के नाम हैं, लेकिन उनका स्पष्टीकरण उन्हें देना पड़ेगा। कई संपत्तियां विदेश में भी हैं, उनका जवाब भी चिदंबरम को देना होगा। उनका बेटा भी इस केस में आरोपी है और जेल जा चुका है, फिलहाल जमानत पर बाहर है। देखते हैं किस केस का निष्कर्ष क्या होता है, लेकिन एक बहस अदालत से ही शुरू हुई है  कि जो भी आर्थिक अपराधी हो, उसे संसद में बिल्कुल भी संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।

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