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ग्लोबल इकॉनमी के लिए मुश्किल वक्त का इशारा- राउल पैल

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कई आर्थिक आंकड़े ग्लोबल इकॉनमी के लिए मुश्किल वक्त का इशारा कर रहे हैं। रियल विजन ग्रुप के सीईओ राउल पैल ने इंटरव्यू में यह बात कही। पेश हैं इस इंटरव्यू के खास अंश:

आप कह रहे हैं कि वैश्विक मंदी आने वाली है और 2008 की तुलना में कहीं बड़ी गिरावट आ सकती है…?

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मेरा काम अनुमान लगाना है। मैं पक्के तौर पर किसी बात की गारंटी नहीं दे सकता। कई चीजों को देखकर मुझे लग रहा है कि आने वाला वक्त चुनौतीपूर्ण हो सकता है। पहले अमेरिका और ग्लोबल इकनॉमिक ग्रोथ की बात करते हैं। आज चारों ओर इकनॉमिक ग्रोथ कम हो रही है। कई देश पहले ही मंदी में जा चुके हैं। अमेरिका भी मंदी की तरफ बढ़ता हुआ दिख रहा है। मेरा मानना है कि फेडरल रिजर्व ने एक साल पहले ब्याज दरों में जो कटौती शुरू की थी, उसकी वजह से अमेरिकी अर्थव्यवस्था मंदी की ओर बढ़ रही है। इसके साथ व्यापार युद्ध और चीन के आर्थिक सुस्ती में फंसने से ग्लोबल इकनॉमी की परेशानियां और बड़ गई हैं। भारत की इकनॉमिक ग्रोथ में भी हम गिरावट देख ही चुके हैं।

अब सवाल यह है कि क्या हालात और मुश्किल और पेचीदा हो सकते हैं? मुझे इसकी आशंका दिख रही है। बॉन्ड मार्केट से इसके संकेत दिख रहे हैं। यूरोप और खासतौर पर अमेरिका में बॉन्ड यील्ड में तेजी से गिरावट आ रही है। यह मंदी के आने का संकेत है।

कौन से ऐसे संकेत हैं, जिनसे मंदी के आने की जल्द आने की आशंका दिख रही है?
मुझे कुछ समय से इसके संकेत दिख रहे हैं। मार्च 2018 में चीन की आर्थिक ग्रोथ में नाटकीय ढंग से गिरावट आई थी। उसके बाद व्यापार युद्ध शुरू हुआ और फिर अमेरिका में सुस्ती आने लगी। इधर, बॉन्ड मार्केट में नाटकीय ढंग से गिरावट शुरू हुई है। हमने इस साइकल के अगले हिस्से यानी ब्याज दरों में कटौती में पहुंच गए हैं। अमेरिका में अभी तक ब्याज दरों में 0.25 प्रतिशत की कटौती हुई है, लेकिन बॉन्ड मार्केट इसमें कहीं अधिक गिरावट का अंदाजा लगा रहा है। मुझे लग रहा है कि फेडरल रिजर्व हालात की गंभीरता को नहीं समझ रहा है और वह अंडरपरफॉर्म कर सकता है। अगर ऐसा होता है तो डॉलर और बॉन्ड मार्केट प्रभावित होंगे। शायद बॉन्ड यील्ड इनवर्जन और बढ़े।

मुझे वैश्विक मंदी आती हुई दिख रही है और ऐसे फैक्टर्स नहीं दिख रहे, जो इसे रोक सकें। दुनियाभर में कैपिटल एक्सपेंडिचर में गिरावट आ रही है। जर्मनी मंदी में है और चीन में आर्थिक सुस्ती आ चुकी है। मैन्युफैक्चरिंग और ग्लोबल ट्रेड में हर जगह गिरावट दिख रही है। हर बड़े देश के ग्लोबल एक्सपोर्ट में गिरावट आ रही है। कई ऐसे इंडिकेटर्स हैं, जो आने वाले वक्त के चुनौतीपूर्ण रहने का इशारा कर रहे हैं।

आपका मानना है कि डॉलर इंडेक्स आने वाले वक्त में इमर्जिंग मार्केट्स के लिए रिस्क का इशारा कर रहा है…
आमतौर पर 80 प्रतिशत इमर्जिंग मार्केट्स का प्रदर्शन डॉलर में मजबूती या कमजोरी से निर्धारित होता है। जब अमेरिकी डॉलर में मजबूती आती है, तब इमर्जिंग मार्केट्स का प्रदर्शन खराब रहता है। पिछले कुछ वर्षों में ऐसा ही हुआ क्योंकि तब डॉलर की सप्लाई घट गई थी। जब डॉलर कमजोर होता है, तब इमर्जिंग मार्केट्स अच्छा परफॉर्म करते हैं। इमर्जिंग मार्केट्स में भी अलग-अलग देशों के अलग साइकल और अलग खूबियां हैं। मैं दक्षिण कोरिया को लेकर अधिक चिंतित हूं।

भारत भी शायद इसी जोन में हो। मैं लंबी अवधि में भारत पर बुलिश नजरिया रखता हूं, लेकिन मुझे लग रहा है कि अभी भी भारत में विदेशी निवेशकों का एक्सपोजर काफी अधिक है। दूसरी तरफ, हाल में भारतीय इकनॉमी का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है। मैं यहां पैसा लगाने के लिए वैल्यूएशन कम होने का इंतजार करूंगा। हालांकि, मैं लॉन्ग टर्म में भारत पर बुलिश हूं।

भारत में अलग-अलग क्षेत्रों को लेकर आपका क्या नजरिया है। खासतौर पर बैंकों के बारे में आप क्या कहेंगे?
मैं लंबे समय से भारत पर बुलिश रहा हूं। हालांकि, 8-9 महीने पहले मैं यहां तेजी के अपने ज्यादातर सौदे खत्म कर लिए थे क्योंकि तब मेरे मन में आशंकाएं बढ़ गई थीं। मैं बैंक, टेलिकॉम कंपनियों और निफ्टी पर बुलिश हूं। मेरा अभी भी मानना है कि लॉन्ग टर्म में उनका प्रदर्शन अच्छा रहेगा, लेकिन शॉर्ट टर्म में शेयर प्राइस में उतार-चढ़ाव अधिक रह सकता है। ऐसा लग रहा है कि अभी मार्केट में रोटेशन चल रहा है। भारत में अभी इक्विटी मार्केट की तुलना में सरकारी बॉन्ड से बढ़िया रिटर्न मिल रहा है। इसमें निवेश भी सुरक्षित है। यह भारत के लिए अच्छी चीज है। मेरे पास अभी चार्ट नहीं है, लेकिन मुझे लगता है कि समय के साथ यहां बॉन्ड यील्ड में अच्छी-खासी गिरावट आई है।

क्या कच्चे तेल में मंदी बनी रहेगी? क्या अब तेल की कीमत लंबे समय तक 70 या 80 डॉलर प्रति बैरल तक नहीं जाएगी?

सीजनली यह कच्चे तेल के लिए अच्छा वक्त है। इसमें कुछ रिकवरी हुई है। ईरान और ओपेक से खबरें हमेशा आती रहती हैं। अगर आप मार्केट का चार्ट देखें तो इससे डिफ्लेशन और ग्लोबली डिमांड घटने के संकेत मिल रहे हैं। ऑयल का चार्ट देखकर लग रहा है कि इसकी कीमत 45 डॉलर प्रति बैरल तक गिरकर जा सकती है। अगर यह इससे नीचे जाता है, जैसा कि मुझे लग भी रहा है तो यह 30 या 20 डॉलर(1420 रुपये) प्रति बैरल तक पहुंच सकता है। मुझे नहीं लगता कि लोग इसके लिए तैयार हैं। हालांकि, यह भारत के लिए बहुत अच्छी खबर होगी, जो बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है।

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