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बोबड़े की चिंता

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चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की सेवानिवृत्ति के पश्चात 18 नवंबर को जस्टिस शरद अरविंद बोबड़े ने मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्यभार संभाल लिया है और इस प्रकार वे भारत के 47वें मुख्य न्यायाधीश बन गए हैं। स्थापित परंपरा के अनुरूप न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने अपनी विदाई से कुछ दिनों पहले ही अपने उत्तराधिकारी के रूप में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम जज न्यायमूर्ति बोबड़े की नियुक्ति की सिफारिश कर दी थी और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा 29 अक्तूबर को उनकी नियुक्ति को स्वीकृति दे दी गई थी।

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जस्टिस गोगोई 3 अक्तूबर 2018 को देश के 46वें मुख्य न्यायाधीश बने थे, जिनके 17 नवंबर को रिटायर होने के बाद जस्टिस एसए बोबड़े ने उनका स्थान लिया है। जस्टिस गोगोई का कार्यकाल करीब एक साल का था, जिसमें उन्होंने अयोध्या विवाद समेत कई महत्त्वपूर्ण मसलों पर फैसले सुनाकर न्याय जगत में एक नया इतिहास रचा और अब जस्टिस बोबड़े के करीब डेढ़ वर्षीय कार्यकाल पर भी सबकी नजरें केंद्रित रहेंगी क्योंकि उनके समक्ष भी कई महत्त्वपूर्ण मुद्दे सामने आएंगे, जिन पर उन्हें अपना निर्णय सुनाना है। गौरतलब है कि जस्टिस बोबड़े का कार्यकाल 23 अप्रैल 2021 तक का होगा। जस्टिस बोबड़े ही वह न्यायाधीश हैं, जिन्होंने करीब छह साल पूर्व सबसे पहले स्वेच्छा से ही अपनी संपत्ति की घोषणा करते हुए दूसरों के लिए आदर्श प्रस्तुत किया था। उन्होंने बताया था कि उनके पास बचत के 21,58,032 रुपए, फिक्स्ड डिपोजिट में 12,30,541 रुपए, मुंबई के एक फ्लैट में हिस्सा तथा नागपुर में दो इमारतों का मालिकाना हक है।

न्यायमूर्ति बोबड़े इस साल उस वक्त ज्यादा चर्चा में आए थे, जब उन्हें सुप्रीम कोर्ट की ही एक पूर्व महिला कर्मचारी द्वारा मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए जाने के बाद उस अति संवेदनशील मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित हाउस पैनल का अध्यक्ष बनाया गया था, जिसमें न्यायमूर्ति एनवी रमन तथा इंदिरा बनर्जी शामिल थे। इस पैनल ने अपनी जांच के बाद जस्टिस गोगोई को क्लीन चिट दी थी। जनवरी 2018 में जब सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ प्रेस कान्फ्रेंस की थी, तब जस्टिस गोगोई, जे चेलमेश्वर, मदन लोकुर तथा कुरियन जोसेफ के बीच मतभेदों को निपटाने में अहम भूमिका निभाने के चलते भी जस्टिस बोबड़े चर्चा में आए थे। उस समय उन्होंने कहा था कि कोलेजियम ठीक तरीके से काम कर रहा है और केंद्र के साथ उसके कोई मतभेद नहीं हैं।

24 अप्रैल 1956 को महाराष्ट्र के नागपुर में जन्मे न्यायमूर्ति शरद अरविंद बोबड़े को वकालत का पेशा विरासत में ही मिला था। उनके दादा एक वकील थे और पिता अरविंद बोबड़े महाराष्ट्र के एडवोकेट जनरल रहे हैं जबकि बड़े भाई स्व. विनोद अरविंद बोबड़े सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील रहे थे। उनकी बेटी रुकमणि दिल्ली में वकालत कर रही हैं और बेटा श्रीनिवास मुंबई में वकील है। शरद अरविंद बोबड़े ने नागपुर विश्वविद्यालय से एलएलबी करने के पश्चात वर्ष 1978 में बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र की सदस्यता लेते हुए अपने वकालत करियर की शुरुआत की थी, जिसके बाद उन्होंने बाम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ में वकालत की और 1998 में वरिष्ठ अधिवक्ता मनोनीत किए गए। 29 मार्च 2000 को उन्होंने बाम्बे हाई कोर्ट में बतौर अतिरिक्त न्यायाधीश पदभार ग्रहण किया और फिर 16 अक्तूबर 2012 को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस बने। पदोन्नति मिलने के बाद 12 अप्रैल 2013 को उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में बतौर जज कमान संभाली। सुप्रीम कोर्ट में जज बनने के बाद वे सर्वोच्च अदालत की कई महत्त्वपूर्ण खंडपीठों का हिस्सा रहे। वे अदालत की उस बैंच का भी हिस्सा थे, जिसने आदेश दिया था कि आधार कार्ड न रखने वाले किसी भी भारतीय नागरिक को सरकारी फायदों से वंचित नहीं किया जा सकता। बहू- प्रतीक्षित और राजनीतिक दृष्टि से सर्वाधिक संवेदनशील माने जाते रहे राम जन्म भूमि विवाद की सुनवाई कर रही मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली उस पांच सदस्यीय संविधान पीठ का भी वे अहम हिस्सा थे, जिसने अपने फैसले से देश की न्याय प्रणाली के प्रति हर देशवासी का भरोसा बनाए रखा है। जस्टिस बोबड़े ने देश के मुख्य न्यायाधीश के रूप में अति महत्त्वपूर्ण कार्यभार तो संभाल लिया है, लेकिन यह भी तय है कि उनका यह पूरा कार्यकाल चुनौतियों से भरा रहेगा।

सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट तथा निचली अदालतों में लंबित मामलों के निपटारे, अदालतों में न्यायाधीशों की बड़ी कमी, विचाराधीन कैदियों की सुनवाई में विलंब, न्यायपालिका तथा कार्यपालिका के बीच टकराव जैसी स्थितियां इत्यादि उनके समक्ष कई ऐसी बड़ी चुनौतियां होंगी, जिनसे निपटते हुए उन्हें इनके समाधान के प्रयास भी करने होंगे। अदालतों में लंबित मामलों को निपटाने और मुकदमों में होने वाली देरी को दूर करने के लिए वर्ष 2009 में प्रक्रियागत खामी को दूर करना, मानव संसाधन का विकास करना, निचली अदालतों में बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाना जैसे रणनीतिक नीतिगत कदम उठाए जाने की जरूरत पर विशेष जोर दिया गया था लेकिन इस दिशा में सकारात्मक प्रयास नहीं हुए। न्यायमूर्ति बोबड़े इस चुनौती से कैसे निपटेंगे, यह देखना दिलचस्प होगा। अगर भारतीय अदालतों में लंबित मामलों पर नजर डालें तो फिलहाल देशभर की अदालतों में 3.53 करोड़ से भी ज्यादा मामले लंबित हैं। यदि निचली अदालतों या उच्च न्यायालयों की बात छोड़ भी दें तो सर्वोच्च न्यायालय में ही करीब 58,669 मामले लंबित हैं, जिनमें से 40,409 मामले ऐसे हैं, जो करीब तीस सालों से लंबित हैं। ‘नेशनल ज्यूडीशियरी डेटा ग्रिड’ के अनुसार उच्च न्यायालयों में 43,63,260 मामले लंबित हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि मामलों को जिस गति से निपटाया जा रहा है, उस हिसाब से लंबित मामलों को निपटाने में 400 साल लग जाएंगे और वो भी तब, जब और कोई नया मामला सामने न आए। देश में प्रतिवर्ष मुकदमों की संख्या जिस गति से बढ़ रही है, उससे भी तेज गति से लंबित मामलों की संख्या बढ़ रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2012 में ‘नेशनल कोर्ट मैनेजमेंट सिस्टम’ आरंभ किया था, जिसका आकलन है कि भारतीय अदालतों में वर्ष 2040 तक मुकदमों की संख्या बढ़कर 15 करोड़ हो जाएगी और इसके लिए 75 हजार और अदालतें बनाने की जरूरत है। यह न्यायमूर्ति बोबड़े की चिंता का प्रमुख विषय रहेगा।

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