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इतिहास से सबक

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अनिल अनूप

आज से पंद्रह सौ साल पहले नालंदा में एक विश्वविद्यालय ने आकार लेना शुरू किया था। उन दिनों विश्वविद्यालय को महाविहार कहा जाता था। कहते हैं यह महाविहार या विश्वविद्यालय चार सौ पंद्रह में बनना शुरू हो गया था । उन दिनों पूरा मगध क्षेत्र ही भारतीय ज्ञान विज्ञान की साधना का प्रमुख स्थान बनता जा रहा था। मगध से कुछ मील की दूरी पर सटे हुए बिहार शरीफ में ओदांतपुरी या उदांतपुरी नाम से विश्व प्रसिद्ध महाविहार स्थित था। नालंदा के पास ही राजगृह जिसे आज राजगीर कहा जाने लगा है , महात्मा बुद्ध का कर्म क्षेत्र रहा था। द्वापर और कलियुग के संधिकाल में यहीं के राजा जरासंध ने श्री कृष्ण से पंजा लड़ा लिया था। आज भी महाराजा जरासंध के नाम से यहां कुश्ती के अखाड़े चलते थे। कुछ पोस्टर बैनर अभी भी नगर में लगे हुए थे, जरासंध के नाम से कोई कुश्ती प्रतियोगिता होने वाली थी।

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भारत की यही खूबी है। उतने उत्साह से जरासंध को याद किया जा रहा है और उतने ही उत्साह से कृष्ण को। ओदांतपुरी, नालंदा महाविहार में यदि पूरे विश्व से नहीं तो एशिया के तो कोने-कोने से विद्यार्थी पढ़ने के लिए आते थे। नालंदा महाविहार में ही दस हजार से ज्यादा छात्र और पंद्रह सौ से ज्यादा अध्यापक थे। छात्रों में चीन से आए ह्यूनसांग का नाम तो सर्वविदित ही है। वह कुछ समय के लिए विहार में अध्यापक भी रहा था। विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक नागार्जुन यहीं अध्यापक थे। धर्मकीर्ति, शांतिरक्षित सब यहीं की उपज थी। जिन दिनों पश्चिम के लोग ककहरा सीख रहे थे उन दिनों इस महाविहार में जीवन-मरण की गुत्थियां सुलझाई जा रही थीं, लेकिन 1200 में जब दिल्ली के सिंहासन पर विदेशी सुल्तानों का कब्जा होने लगा तो मानों भारत के इन विद्यामंदिरों का भी भाग्य अस्त होने लगा।

बख्तियार खिलजी अपने सेना लेकर इस ओर आया तो महाविहारों के क्षेत्र को देखकर स्तब्ध रह गया था । उसने हजारों भिक्षु साधु-संतों को मौत के घाट उतार दिया। विद्याध्ययन में डूबे छात्र इस हमले से त्रस्त थे, लेकिन खिलजी ने केवल नालंदा को जीता ही नहीं बल्कि पूरे महाविहारों को आग के हवाले कर दिया। पुस्तकालय धूं-धूं करके जलने लगा। बीच में ही चीवरधारी भिक्षुओं के जलते हुए मांस की गंध। एक-एक कर भवन जलने लगे। दीवारें गिरने लगीं। ईंटें चटकने लगीं। कहा जाता है महाविहार का पुस्तकालय छह मास तक जलता रहा था। धीरे-धीरे सब कुछ धरती के नीचे ही दब गया । धरती सचमुच मां है। न जाने इतिहास के कितने गहरे जख्म अपनी छाती के नीचे छिपाए बैठी है। कभी शिकायत नहीं की, लेकिन भारतीयों की जिजीविषा को सचमुच प्रणाम करना होगा। नालंदा इस मार से मरी तो नहीं मूर्च्छित अवश्य हो गई थी। विदेशी इतिहासकार इसे मरा हुआ समझ कर निश्चिंत हो गए थे। मगध क्षेत्र के ये महाविहार धीरे-धीरे मिट्टी के नीचे दब कर ढूहों में बदल गए। गहरी मूर्छा का लंबा कालखंड। लेकिन धीरे-धीरे मिट्टी उड़ने लगी। हवा चीत्कार करने लगी और इन मिट्टी के ढूहों के नीचे से मानों एक संगीत उभरने लगा जो वायुदेव का सहारा पाकर पूरी दुनिया में गूंजने लगा। उत्खनन हुआ तो एक-एक कर मानों पूरा महाविहार फिर से जीवित होने लगा। कतारों में बने हुए सैकड़ों छात्रावास। हर विद्यार्थी के लिए एक एक कक्ष। आंगन के बीच मीठे जल का कुआं। और साथ ही भोजन पकाने के लिए चूल्हे। मंदिरों की लंबी कतारें।

भगवान बुद्ध की खंडित-अखंडित मूर्तियों का मानों ढेर लग गया। अन्न भंडार को आग लगी और वह राख हो गया, लेकिन अर्द्ध जले धान अब भी सुरक्षित पड़े हैं। मैं इन्हीं खंडहरों में घूम रहा था। पैर रखते हुए झिझक हो रही थी। नीचे कोई न कोई सोया हुआ होगा। मैं छात्रावास के उस कक्ष की तलाश में था जिसमें कभी ह्यूनसांग रहा होगा। या फिर वह कक्ष जिसमें कभी नागार्जुन पढ़ाता होगा। कुछ लोगों को मूर्ति बनाने का शौक होता है, लेकिन वे उससे आगे नहीं जा सकते, दूसरे वे लोग होते हैं जो उनमें प्राण प्रतिष्ठा कर देते हैं। निर्जीव को सजीव बनाने की कला। विदेशी आक्रांताओं ने भारत में बार-बार आकार सजीव के प्राण हरने का प्रयास किया। बख्तियार खिलजी तो उनमें से एक नाम है। भारतीय इतिहास ऐसे अनेक नामों से भरा पड़ा है। अरब आए, तुर्क आए, मंगोल आए, मुगल आए।

सब काल कवलित हो गए। डच आए , पुर्तगाली आए, फ्रांसीसी आए, ललमुंहे अंग्रेज आए। वे भी सब चले गए, लेकिन निर्जीव पत्थरों में भी प्राण प्रतिष्ठा करने की भारतीय साधना को कोई नहीं छीन सका। अंग्रेजों के चले जाने के बाद सरदार पटेल और डा. राजेंद्र प्रसाद ने उसी साधना को फिर शुरू किया। सोमनाथ के खंडहरों में जान पड़ गई। नालंदा महाविहार, नव नालंदा महाविहार के रूप में फिर जिंदा हो उठा। जिस रास्ते से कभी धर्मकीर्ति गुजरे होंगे या कभी रुके होंगे, मैं वहीं बैठा हूं। पाल्थी मार कर। चीवरधारी भिक्षु स्वर शांति पाठ कर रहे हैं । मुझे अनुभव कर रहा हूं, यहां यह पाठ पिछले पंद्रह सौ साल से उसी रूप में गूंज रहा है, लेकिन मेरा सचमुच नमन तो उन मागधं को है जिन्होंने बख्तियार खिलजी का नाम भी उतनी शिद्दत से सहेज कर रखा हुआ है। पाटलिपुत्र से नालंदा जाते समय बीच रास्ते में बख्तियारपुर नाम का बड़ा शहर बसा हुआ है। नालंदा जाते समय रास्ते में बख्तियारपुर जाना ही पड़ता है। यह इतिहास से सबक सीखने के लिए है या फिर कबाड़ को भी संभाल कर रखने की आदत के कारण, यह तो मागध ही जानते होंगे।

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