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क्रिकेट की सनसनी : वनडे मैचों में डबल सेंचुरी मारने वाला दुनिया का सबसे यंग खिलाड़ी, जानें इसके बारे में और भी बहुत कुछ

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17 साल 292 दिन की उम्र में यह लड़का विजय हजारे ट्रॉफी में डबल सेंचुरी मारता है और लिस्ट-A वनडे मैचों में डबल सेंचुरी मारने वाला दुनिया का सबसे यंग खिलाड़ी बनता है। नाम- यशस्वी जायसवाल। जानें इसके बारे में और भी बहुत कुछ। ऑल इंडिया जूनियर सेलेक्शन कमेटी ने जैसे ही भारतीय टीम के ऐलान के साथ ही यशस्वी जायसवाल का नाम भी टीम के लिए घोषित किया, वैसे ही ये प्रतिभावान बल्लेबाज अपने खेल और संघर्षों के लिए एक बार चर्चा में आ गया। यशस्वी जायसवाल उत्तर प्रदेश के भदोही ज़िले के सुरियावां गांव के रहने वाले हैं। वह बचपन से ही क्रिकेटर बनने का सपना देखने लगे थे। उन्हें अपनी प्रतिभा पर भरोसा था।

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उन्होंने अपनी ख़्वाहिश अपने पिता भूपेंद्र जायसवाल को बताई. पिता ने बेटे को मुंबई के वर्ली में रहने वाले अपने एक रिश्तेदार के यहां भेज दिया। यहीं से यशस्वी का कठिन सफर शुरू हुआ। 11 साल की उम्र से यशस्वी खेलने तो लगे, लेकिन रिश्तेदार के घर में इतनी जगह नहीं थी कि वह रह पाते। इस पर यशस्वी ने कालबादेवी इलाके में स्थित एक दूध डेयरी में उन्हें सोने की जगह नहीं मिली, लेकिन इस शर्त पर अगर वहाँ सोने के लिए जगह चाहिए तो काम भी करना पड़ेगा।

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यशस्वी खेलकर लौटते तो थकान की वजह से काम करने की बजाय सो जाते थे। इस पर उन्हें वहाँ से निकाल दिया । जहां प्रैक्टिस की वहीं सो गए अगर वहां जगह नहीं मिली तो सड़क के किनारे सोए। आर्थिक तंगी के चलते गोलगप्पे तक बेचे। खिलाड़ियों की खोई गेंद तलाश पैसे कमाए। मैदान के टेंट में सोए। फिर भी कामयाबी नहीं मिलते देख घर वाले हिम्मत हारते नजर आए, लेकिन इस युवा ने बिना रुके, बिना थके इस तरह चलने की ठानी कि उनकी प्रतिभा को आज देश दुनिया सलाम कर रही है। जी हां, हम बात कर रहे हैं देश के उभरते क्रिकेटर यशस्वी जायसवाल Yashasvi Jaiswal की, जिनका चयन साउथ अफ्रीका में 2020 में खेले जाने वाले अंडर19 वर्ल्ड कप Under 19 World Cup के लिए टीम इंडिया में हुआ है। अंडर19 वर्ल्ड कप का आयोजन 17 जनवरी से 9 फरवरी तक किया जाएगा।

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यशस्वी ने फिर से नया ठिकाना तलाशा। इसके बाद यशस्वी का नया आसरा मिला मुंबई क्रिकेट की नर्सरी कहे जाने वाले आज़ाद मैदान में। इस मैदान ओर वह मुस्लिम यूनाइटेड क्लब में ग्राउंड्समैन के साथ टेंट में रहे. यहां अच्छा खेल दिखाने की शर्त पर रहने दिया गया। यशस्वी को खाना भी यहीं मिलने लगा। आर्थिक तंगी से निपटने के लिए वह खिलाड़ियों की बॉल तलाश कर देने के बदले कुछ पैसे कमा लेते। इसी बीच 2013 में आज़ाद मैदान पर प्रैक्टिस के दौरान कोच ज्वाला सिंह ने उन्हें खेलते हुए देखा।

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यशस्वी जायसवाल उत्तर प्रदेश के भदोही ज़िले के सुरियावां गांव के रहने वाले हैं. वह बचपन से ही क्रिकेटर बनने का सपना देखने लगे थे. उन्हें अपनी प्रतिभा पर भरोसा था। उन्होंने अपनी ख़्वाहिश अपने पिता भूपेंद्र जायसवाल को बताई. पिता ने बेटे को मुंबई के वर्ली में रहने वाले अपने एक रिश्तेदार के यहां भेज दिया. यहीं से यशस्वी का कठिन सफर शुरू हुआ। 11 साल की उम्र से यशस्वी खेलने तो लगे, लेकिन रिश्तेदार के घर में इतनी जगह नहीं थी कि वह रह पाते। इस पर यशस्वी ने कालबादेवी इलाके में स्थित एक दूध डेयरी में उन्हें सोने की जगह नहीं मिली, लेकिन इस शर्त पर अगर वहाँ सोने के लिए जगह चाहिए तो काम भी करना पड़ेगा. यशस्वी खेलकर लौटते तो थकान की वजह से काम करने की बजाय सो जाते थे. इस पर उन्हें वहाँ से निकाल दिया गया।

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