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निरुद्देश्य नहीं हो सकता चीन के मुद्दे पर खुलकर कांग्रेस को नसीहत देना और केंद्र सरकार का साथ देना

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मुंबई। पिछले महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुशील कुमार शिंदे ने कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस को थकी-हारी पार्टी बताते हुए दोनों दलों को आपस में विलय करने का सुझाव रख दिया था। दरअसल उन दिनों महाराष्ट्र की हालत ही ऐसी थी कि मिलकर चुनाव लड़ रहीं भारतीय जनता पार्टी-शिवसेना के अलावा कोई और दल सत्ता में आने की कल्पना भी नहीं कर रहा था। यह और बात है कि चुनाव के बाद समीकरण बदले और शिवसेना ने अपनी 30 साल पुरानी सहयोगी भाजपा को दगा देकर कांग्रेस-राकांपा का दामन थाम लिया। अब सरकार इन तीनों दलों की ही चल रही है।

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खैर सुशील कुमार शिंदे ने जो प्रस्ताव उस समय रखा था, राकांपा अध्यक्ष शरद पवार ने तुरंत उसका खंडन करते हुए स्पष्ट कर दिया था कि कम से कम राकांपा तो थकी-हारी पार्टी नहीं है। तब पवार ने कहा था कि अपनी पार्टी का प्रमुख मैं हूं। मैं उसकी स्थिति शिंदे से ज्यादा बेहतर जानता हूं। हमारी पार्टी पूरी तरह ऊर्जावान है और हम चुनाव की तैयारियों में जुटे हैं। कुछ समय बाद उसी चुनाव में शरद पवार ने यह सिद्ध भी कर दिया कि वह 80 की उम्र में भी कतई थके-हारे नहीं हैं। चुनाव से ठीक पहले जैसे ही उन्हें भ्रष्टाचार के एक मामले में प्रवर्तन निदेशालय का नोटिस मिलाए उन्होंने तुरंत वहां उपस्थित होने का एलान करके सभी को सकते में डाल दिया। खुद ईडी को उनसे अपने कार्यालय न आने का निवेदन करना पड़ाए और मुंबई के पुलिस आयुक्त को उनके घर जाकर यह अपील करनी पड़ी कि वे अपने कार्यकर्ताओं को शांत रहने के लिए कहें। पवार ने दोनों की बातें मानीं। लेकिन एक परिपक्व राजनेता की तरह कमर कसकर इस तरह चुनाव में उतरे कि खुद को मिली ईडी की नोटिस को एक सहानुभूति लहर में बदलने में कामयाब रहे। चुनाव बाद भी ईडी के नोटिस की ही खुन्नस थी कि उन्होंने सबसे बड़े दल के रूप में उभरी भाजपा को सत्ता से दूर रखने की ठानी तो उसमें भी सफलता हासिल करके ही रहे।

यहां बार-बार उनकी परिपक्वता की बात इसलिए दोहराई जा रही है, क्योंकि उन्होंने हाल ही में दो बार भारत-चीन सीमा विवाद के मुद्दे पर कांग्रेस के एक अपरिपक्व नेता को आईना दिखाते हुए ऐसे मौके पर राजनीति न करने की सलाह दी। पवार देश की नब्ज समझनेवाले नेता हैं। इन दिनों चीन के मुद्दे पर खुलकर कांग्रेस को नसीहत देना और केंद्र सरकार का साथ देना निरुद्देश्य नहीं हो सकता। पवार चीन के मुद्दे पर देश का मूड देख रहे हैं। केंद्र सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदमों को भी भांप रहे हैं। उसे मिल रहा जनता का समर्थन भी देख रहे हैं। ऐसी स्थिति में कांग्रेस के सुर से सुर मिलाना और उसके साथ खड़े रहना उन्हें आत्मघाती लगता होगा। यही नहीं, कोविड-19 के कारण भारत में शुरू हुए पहले लॉकडाउन के दौरान अपने दक्षिण मुंबई स्थित घर के बाहर सपरिवार खड़े होकर ताली बजाते तस्वीरें भी देश देख चुका है। जबकि कांग्रेस के किसी भी बड़े नेता की कोई तस्वीर इस प्रकार नहीं देखी गई।

पवार जानते हैं कि लोकतंत्र में सत्ता जनता का मन भांपकर ही पाई जा सकती है। पवार इस समय महाराष्ट्र में सत्ता में भी हैं। यही नहीं, काफी मजबूत स्थिति में हैं। लेकिन सरकार तो तीन दलों की ही है। कोई ठिकाना नहीं, कि कब तीनों दलों के बीच पक रही खीर में किस मुद्दे पर नींबू निचुड़ जाए। एक परिपक्व राजनेता को ऐसी परिस्थिति के लिए भी तैयार रहना चाहिए। आज महाराष्ट्र की महाविकास आघाड़ी सरकार में उनकी पार्टी नंबर दो की स्थिति में है। उपमुख्यमंत्री सहित गृह, स्वास्थ्य और वित्त जैसे महत्त्वपूर्ण विभाग उसके पास हैं। पवार जानते हैं कि तीनों दलों में खटपट हुई तो भाजपा इस बार शिवसेना को लिफ्ट नहीं देगी। दूसरी ओर राज्य में सबसे अधिक विधायकों की संख्या वाली भाजपा को भी अगर सत्ता में आना है, तो उसे कांग्रेस, राकांपा और शिवसेना में से किसी एक को साथ लेना पड़ेगा। कांग्रेस उसकी राष्ट्रीय विरोधी है। शिवसेना के साथ रिश्ते काफी कड़वे हो चुके हैं। ऐसे में राकांपा का ही हाथ थामा जा सकता है। राज्य इस समय नए चुनाव में जाने की स्थिति में नहीं है, इस तर्क के साथ पवार को भी भाजपा के साथ जाने में कोई आपत्ति नहीं होगी। वर्ष 2014 के शुरुआती दिनों में भी शरद पवार इसी तर्क के साथ भाजपा को बाहर से समर्थन दे चुके हैं। यदि भविष्य में भी, राज्य की सत्ता में भागीदार बने रहने, और केंद्र की सरकार में अपने परिवार के किसी सदस्य को सहभागी बनाने का अवसर मिले, तो शरद पवार जैसा परिपक्व राजनेता कभी चूकेगा, फिलहाल ऐसा लगता तो नहीं।

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