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एक परिवार की गाथा विभाजन के दर्द को बयाँ करती…

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नई दिल्ली । रिश्ते जब टूटते हैं, तो जख़म बनकर रिसते हैं, टीस बनकर उभरते हैं और परिवार जब बिखरते हैं, तो व्यक्ति ख़ुद टूट जाता है। जब पल भर में राजा और रंक का अंतर खतम हो जाता है।अपनों का लहू देखकर पीड़ा, दुख जैसे शब्द छोटे पड़ जाते हैं, शून्य की स्थिति आ जाती है, व्यक्ति अंधकार में चला जाता है। संपन्नपरिवार से ताल्लुक रखने वालेउपन्यास के मुख्य किरदार राम लाल भी अपनी चेतना खो बैठते हैं, जब उन्हें पता चलता है कि उनकी बेटी ‘कम्मो’ दंगों की चपेट में आ गई है, उपद्रवियों के शर्मनाक कारनामों की वजह से घर धू-धू जलकर राख हो गया है।

विभाजन के दर्द को समेटे एक बिखरते, टूटते परिवार की कहानी है–‘द फैमिली सागाः ए नॉवेल इन द टाइम ऑफ पार्टिशन’।नियोगी बुक्स द्वारा प्रकाशित इस उपन्यास के लेखक हैं हैदराबाद के नरेंद्र लूथर। उपन्यास का ताना-बाना इतना दिलचस्प है कि हर पड़ाव उत्सुकतापूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

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लाहौर में ख़ासा रुत्बा रखने वाले राम लाल खन्ना के लिए अब जीना सिर्फ़ जीने की ख़ातिर है, क्योंकि साँसें तो अपने समय सेछूटती हैं। बेहतर है, जीवन के मक़सद को बदला जाए, जीने की राह को तलाश किया जाए और आस के सहारे आने वाले पलों को आबाद किए जाने की कोशिश की जाए।अपने इसी आशावादी सिद्धांत के साथ राम लाल जीवन में संघर्ष को स्वीकार करते हुए लाहौर से दिल्ली तक का एक नया सफ़र शुरू करते हैं। चलते-चलते वे मिसाल बन जाते हैं अन्य संघर्षशील उन सैक़ड़ों ज़िंदगियों की, जो अपना सब कुछ ज़मीन के टुक़ड़ों पर लुटा चुके होते हैं। विभाजन हुआ, ज़मीं मिल गई, दरारें पड़ गईं, उन्हें अब सिर्फ़ आँसुओं से भरना है, धैर्य की क़ीमत चुकानी है, और सब बातों से परे यही बात सटीक लगती है कि दोष अपनी ‘क़िस्मत’ का ही तो है।

उपन्यास का हर शब्द, प्रत्येक वाक्य और उनके पीछे छिपे भाव, मानो दिल को छू लेते हैं। लेखक की मनोसंवेदनाएँ इस उपन्यास में बखूबी उभर कर सामने आई हैं। नरेंद्र लूथरएक पूर्व प्रशासनिक अधिकारी हैं। अपनी प्रखर सोच एवं लेखन शैली की गुणवत्ता के साथ-साथ हास्यपटुता में भी उनकी अच्छी-ख़ासी पकड़ है। इसी कारण उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। सन 2016 में ‘चिश्ती भारत सौहार्द सम्मान’ से नवाज़ा गया। उन्हें कई विभिन्न विश्वविद्यालयों व प्रतिष्ठित संस्थानों में व्याख्यान देने के गौरव भी प्राप्त है। वे ‘सोसाइटी टू सेव रॉक्स’ और ‘युद्धवीर फाउंडेशन’ के अध्यक्ष भी हैं। इससे पूर्व नियोगी बुक्स से उनकी दो अन्य पुस्तकें ‘ए बोनसाई ट्री’ और ‘लीजेंडोट्स ऑफ हैदराबाद’ भी प्रकाशित की गई हैं।

उल्लेखनीय है कि नियोगी बुक्स द्वारा प्रकाशित पुस्तकों में न केवल सचित्र पुस्तकें बल्कि अनुवादित, काल्पनिक एवं ग़ैर काल्पनिक पुस्तकों ने भी ख़ास जगह बनाई है। वर्ष 2004 में शुरू की गई इस पुस्तक प्रकाशन की श्रृंखला में सैकड़ों पुस्तकें शामिल हैं, जो कम क़ीमत एवं गुणवत्ता के मानकों परभी उत्तम हैं एवं पाठकों तक उनकी व्यापक पहुँच है।

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