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आवश्यकता है चीन को संतुलित करने की, जो एशिया को…

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हाल ही में भारतीय प्रधानमंत्री ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) गुवाहाटी के दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए इस संस्थान को भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी को अधिक परिणाम मूलक बनाने के लिए अपनी सशक्त भूमिका निभाने का आवाहन किया। प्रधानमंत्री ने कहा है कि एक्ट ईस्ट पॉलिसी के भाग के रूप में अब भारत और दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के संबंधों को मजबूती देने में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका होने वाली है। पूर्वोत्तर का ये क्षेत्र, भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी का केंद्र भी है। यही क्षेत्र, साउथ ईस्ट एशिया से भारत के संबंध का मुख्य द्वार भी है। इन देशों से संबंधों का मुख्य आधार संस्कृति, व्यापार, आपसी संपर्क और क्षमता रहा है तथा अब शिक्षा भी एक और नया माध्यम बनने जा रही है।

उल्लेखनीय है कि असम सरकार ने कुछ वर्ष पहले एक्ट ईस्ट पॉलिसी डिपार्टमेंट का गठन किया है और ऐसा करने वाला असम भारत का पहला राज्य है। उत्तर पूर्वी भारत की आंतरिक सुरक्षा और सीमा सुरक्षा की दृष्टि से असम की महत्वपूर्ण भूमिका है जिसकी पहचान भारत की विदेश नीति के स्तर पर की गई है। हाल के समय में विदेश नीति में राज्यों की सकारात्मक भूमिका को जिस तरह से तरजीह दी गई है, वो राज्यों के मनोबल को भी बढ़ाने वाला है और इस रूप में पैराडिप्लोमेसी (विदेश नीति के संचालन में राज्यों की भूमिका) को भी महत्ता मिलनी शुरू हुई है। जिन भारतीय राज्यों की पड़ोसी देशों के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमाएं साझा होती हैं, उनकी भूमिका विदेश नीति में बढ़ाने से महत्वपूर्ण परिणामों की प्राप्ति हो सकती है।

एक्ट ईस्ट पॉलिसी : भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी एशिया प्रशांत क्षेत्र और इंडो पैसिफिक क्षेत्र के विस्तारित पड़ोसी देशों पर केंद्रित है, जिन्हें भारत अब एक्सटेंडेड नेबरहुड के रूप में देखने लगा है। इस नीति को मूल रूप से आर्थिक पहल के तौर पर शुरू किया गया था, जिसमें वार्ता एवं सहयोग के लिए संस्थागत तंत्रों को स्थापित किए जाने के साथ ही राजनीतिक, रणनीतिक तथा सांस्कृतिक आयामों को भी शामिल किया गया हैं। भारत ने इंडोनेशिया, वियतनाम, मलेशिया, जापान, कोरिया गणराज्य (आरओके), ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर तथा दक्षिणपूर्व एशियाई राष्ट्र (आसियान) संघ के साथ इसी एक्ट ईस्ट पॉलिसी के तहत रणनीतिक भागीदारी के अपने संबंधों को सुधारा है तथा एशिया प्रशांत क्षेत्र के सभी देशों के साथ निकट संबंध स्थापित किए हैं। इसके अलावा, आसियान क्षेत्रीय मंच (एआरएफ) दक्षिणपूर्व एशियाई राष्ट्र (आसियान) संघ तथा पूर्व एशिया शिखर सम्मेलन (ईएएस) के साथ-साथ भारत बहु-क्षेत्रीय तकनीकी तथा आर्थिक सहयोग हेतु बंगाल की खाड़ी पहल (बिमस्टेक), एशिया सहयोग वार्ता (एसीडी), मेकोंग गंगा सहयोग (एमजीसी) तथा हिंद महासागर परिधि संघ (आइओआरए) जैसे क्षेत्रीय मंच पर भी एक्ट ईस्ट पॉलिसी के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए सक्रिय तौर पर कार्य कर रहा है। एक्ट ईस्ट पॉलिसी में अवसंरचना, विनिर्माण, व्यापार, कौशल, शहरी नवीनीकरण, स्मार्ट सिटी, मेक इन इंडिया तथा अन्य पहलुओं पर भारत की घरेलू कार्यसूची में भारत-आसियान सहयोग पर बल दिया गया है।

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भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी के उद्देश्य : भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी का उद्देश्य द्विपक्षीय, क्षेत्रीय तथा बहुपक्षीय स्तरों पर मजबूत गठजोड़ के जरिये एशिया-प्रशांत क्षेत्र के देशों के साथ आर्थिक सहयोग, सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ावा देने के साथ ही सामरिक संबंधों का विकास करना है, जिससे अरुणाचल प्रदेश, असम सहित भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के राज्यों के साथ पड़ोसी देशों का संपर्क बढ़ाया जा सकेगा। भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी में पूर्वोत्तर भारत को प्राथमिकता दी गई है। यही कारण है कि भारत इसकी सुरक्षा और विकास के लिए आसियान देशों के साथ ही जापान, भूटान और बांग्लादेश को उत्तर पूर्वी भारत में कई परियोजनाओं में सहभाग कराने में सफल रहा है। एक्ट ईस्ट पॉलिसी अरुणाचल प्रदेश सहित पूर्वोत्तर भारत तथा आसियान क्षेत्रों के बीच मिलन बिंदु का कार्य करती है। द्विपक्षीय तथा क्षेत्रीय स्तरों पर विभिन्न योजनाओं में व्यापार, संस्कृति, लोगों का लोगों से संपर्क तथा मूलभूत अवसंरचना मसलन सडक, संचार आदि के माध्यम से आसियान क्षेत्रों के साथ पूर्वोत्तर राज्यों के संपर्क को विकसित तथा सुदृढ़ करने का सतत प्रयास भी शामिल है। कुछ प्रमुख परियोजनाओं में कलादान मल्टी-मॉडल पारगमन परिवहन परियोजना, भारत-म्यांमार-थाइलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग परियोजना, री-टिडिम सड़क परियोजना, सीमा हाट आदि शामिल हैं। एक्ट ईस्ट पॉलिसी को इंडो पैसिफिक विजन का अभिन्न हिस्सा बनाने की बात भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा की जा चुकी है।

भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु उपाय : वर्ष 2016-20 की अवधि के लिए आसियान-भारत कार्य योजना को अगस्त 2015 में अपनाया गया था, जो राजनीतिक सुरक्षा, आर्थिक तथा सामाजिक-सांस्कृतिक स्तंभों के साथ ठोस पहलों तथा सहयोग के क्षेत्रों की पहचान करता है। अमेरिका की इंडो पैसिफिक स्ट्रैटेजी और क्वाड सुरक्षा समूह से अपने गठजोड़ के चलते भारत आज प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में महासागरीय संप्रभुता की सुरक्षा को एक वैश्विक महत्व का मुद्दा बनाने में लगा है और इसका परिणाम यह मिला है कि जर्मनी ने हिंद प्रशांत क्षेत्र के लोकतांत्रिक देशों के साथ भागीदारी मजबूत करने के लिए नई इंडो पैसिफिक पॉलिसी बनाई है जिसका समर्थन भारत, जापान और आसियान देशों ने कर दिया है। इसके साथ ही दक्षिण कोरिया भी भारत के एक्ट ईस्ट पॉलिसी का रणनीतिक साझेदार बना है।

वर्ष 2015 में भारत सरकार ने एक्ट ईस्ट पॉलिसी को भारत की विदेश नीति का एक अनिवार्य अंग बना लिया। अब भारत महाशक्तियों के साथ सामरिक, राजनीतिक वार्ताओं में एशिया प्रशांत क्षेत्र के सुरक्षा परिदृश्य को सबसे अधिक महत्व देता है। इसके पीछे प्रमुख कारण यह भी है कि आज भारत ब्लू इकोनॉमी अथवा महासागरीय अर्थव्यवस्था के लाभों को प्राप्त करने का इच्छुक है। ऐसे में जब तक महासागरों में नौगमन की स्वतंत्रता और सागरीय व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा पर ध्यान नहीं दिया जाएगा तब तक भारत सागर का लाभ नहीं उठा पाएगा। इसी क्रम में वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जापान यात्रा के दौरान दोनों देश इस बात पर सहमत हुए कि उनके बीच -विशेष सामरिक और वैश्विक साझेदारी- केंद्रित संबंध रहेंगे। इसी के बाद 2015 में भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा जिस एक्ट ईस्ट पॉलिसी की शुरुआत की गई उस पॉलिसी के एक अपरिहार्य हिस्से के रूप में भारत ने जापान की पहचान की और फिर वर्ष 2015 में दोनों देशों ने -जापान भारत विजन 2025 विशेष सामरिक और वैश्विक साझेदारी- की घोषणा की जिसका मुख्य उद्देश्य हिंद प्रशांत क्षेत्र और विश्व में शांति और समृद्धि के लिए काम करना है। वर्ष 2016 में जापानी प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि भारत जापान संबंध का नया युग शुरू हो चुका है। आपसी संबंधों को मजबूती देने के इन क्रमिक प्रयासों के पीछे दोनों देशों के साझे और व्यक्तिगत हित दोनों ही छिपे हुए हैं। इसमें सबसे बड़ा कारण एशिया को एक ध्रुवीय अर्थव्यवस्था बनाने की चाह रखने वाले चीन को प्रतिसंतुलित करने की जरूरत है।

जापान और रूस तक समुद्री संबंधों का विस्तार : भारत की मजबूत नौसैनिक शक्ति को देखते हुए जापान का भारत की तरफ रुझान होना स्वाभाविक है। आज भारत दुनियाभर के देशों के साथ संयुक्त नौसैनिक, सैन्य और वायु सेना अभ्यास के जरिये महाशक्तियों को भरोसा दिलाने में सफल हुआ है कि समुद्री सुरक्षा और समुद्री व्यापार में भारत की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हाल के समय में रूस द्वारा भारत के साथ मिलकर दक्षिण चीन सागर में एक वैकल्पिक समुद्री व्यापारिक मार्ग खोलने की बात इस बात का प्रमाण है। अमेरिका की विश्व राजनीति में चौतरफा चुनौतियों के झेलने और उससे उत्पन्न शक्ति शून्यता को भारत एक बड़ी क्षेत्रीय एशियाई देश के रूप में कुछ हद तक भरने की क्षमता रखता है। जापान को ऐसा लगता है और यह महत्वपूर्ण बात है कि जापान अभी तक अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश पर ही रणनीतिक महत्व के मामलों पर विश्वास कर पाया है।

भारत भी उसके लिए एक अति विश्वसनीय मित्र है। जापान को इस बात का भी भरोसा है कि भारत दक्षिण पूर्वी एशिया में सुरक्षा प्रदाता की भूमिका निभा सकता है और वास्तव में भारत ने फिलीपींस और चीन के विवाद में फिलीपींस का साथ देकर, वियतनाम के अधिकारों की बात कर, म्यांमार में विकासात्मक गतिविधियों पर बल देकर इस बात को सिद्ध भी किया है। वर्ष 2012 में जापान ने पहली बार इंडियन ओशन नेवल सिम्पोजियम में भाग लिया और हिंद महासागर की सुरक्षा के प्रति अधिक संवेदनशील हुआ। इसके बाद भारत जापान ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के बीच मालाबार संयुक्त नौसैनिक अभ्यास के जरिये प्रतिरक्षा संबंधों को बढ़ावा मिला। जापान एक मात्र विदेशी शक्ति है जिसे भारत के संवेदनशील उत्तर पूर्वी क्षेत्र में अवसंरचनात्मक विकास की परियोजनाओं को चलाने की मंजूरी मिली है। इसके लिए 2017 में भारत और जापान ने मिलकर एक्ट ईस्ट फोरम का गठन किया, जिसका मुख्य उद्देश्य जापान द्वारा उत्तर पूर्वी भारतीय राज्यों में अवसंरचनात्मक विकास के लिए निवेश को बढ़ावा देना है। भारत और जापान ने चीन के -मोतियों की लड़ी- की नीति के जवाब में एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर की शुरुआत का फैसला 2019 में किया था, जो भारत और जापान की एक महत्वाकांक्षी सामुद्रिक अंतरसंपर्क पहल है।

अपनी एक्ट ईस्ट पॉलिसी के तहत भारत दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों की स्वतंत्रता और सुरक्षा की वकालत करने वाला देश है। सागर सुरक्षित है तो समृद्धि और स्थिरता सुरक्षित है, भारत इस सोच के साथ सागरीय नौगमन की स्वतंत्रता की बात करता है। इसके अलावा भारत ने समुद्री व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा के प्रश्न को तीन-चार सितंबर को इंडियन ओशन कॉन्फ्रेंस के मालदीव में आयोजित हुए चौथे संस्करण में प्राथमिकता के साथ रखा। इस अधिवेशन में भारत, श्रीलंका, सिंगापुर जैसे प्रमुख देशों ने अपनी सहभागिता दर्ज की। सागरीय सुरक्षा और स्वतंत्रता के प्रश्न को एक कदम और बढ़ाते हुए भारत और रूस ने हाल ही में एक नया इंडो पैसिफिक मैरीटाइम रूट लॉन्च करने पर सहमति व्यक्त की है जो कि रूस के सुदूर पूर्व के बंदरगाह शहर व्लादिवोस्तोक से चेन्नई तक विस्तृत होगा। इस प्रकार एक्ट ईस्ट पॉलिसी भारत के एशिया प्रशांत क्षेत्र, हिंद प्रशांत क्षेत्र में संलग्न व्यावसायिक और रणनीतिक हितों को साधने का प्रभावी उपकरण है।

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