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हाथरस : बूलगढ़ी गांव में सिर्फ एक घटना नहीं घटी, मानवाधिकारों और नौकरशाही की संवेदनशीलता पर भी सवाल खड़े

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यदि आप राजनीति को गंभीर मानते और समझते हैं तो निश्चित रूप से हाथरस के बूलगढ़ी गांव से यह सवाल उठेगा कि आखिर वहां क्या हुआ? बूलगढ़ी एक छोटा-सा गांव है। इतना छोटा कि शायद जिले के बाहर के लोग भी नहीं जानते होंगे, लेकिन एक युवती पर जानलेवा हमले के बाद राजनीति ने न सिर्फ इसको अनचाही पहचान दी है, बल्कि खुद को बेनकाब भी किया है।

हाथरस पहला ऐसा मामला नहीं है जिसने विपक्ष की राजनीति के पराभव को सामने लाकर खड़ा किया। इससे पहले लॉकडाउन के दौरान प्रदेश के बाहर से आ रहे श्रमिकों को वाहन उपलब्ध कराने के नाम पर भी राजनीति का विद्रूप चेहरा सामने आया था।

इस गांव से उठता एक बड़ा सवाल तो यही है कि क्या राजनीति का पराभव इस स्तर पर होगा कि एक युवती से अनाचार के मामलों में सियासत का कच्चा माल तलाशा जाएगा और यदि न मिला तो गढ़ा भी जाएगा? सिर्फ इसलिए कि पूरे घटनाक्रम में एक महत्वपूर्ण तथ्य लड़की का दलित होना है।

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राजनीति मुद्दे तलाशती है और 14 सितंबर को बूलगढ़ी गांव में एक दलित युवती पर हमले के बाद राजनीतिक दलों का वहां पहुंचना भी एक सहज प्रतिक्रिया थी, लेकिन इसके बाद घटना को लेकर जो कुछ हुआ वह राजनीतिक दलों, मीडिया और नौकरशाही तीनों की तस्वीर को बदरंग करता है। हाथरस की घटना में शुरुआती दिनों में दुष्कर्म नहीं शामिल था और युवती ने ऐसा बयान भी नहीं दिया था। इस बीच पूरे मसले में एक राजनेता की इंट्री ने घटना को मोड़ दिया और आठवें दिन लड़की का बयान बदल गया। तब इसमें दुष्कर्म की धाराएं भी जुड़ गईं और आरोपित गिरफ्तार भी कर लिए गए। हालांकि बाद में फॉरेंसिक जांच में दुष्कर्म प्रमाणित नहीं हो सका, लेकिन तब तक दूषित राजनीति के खतरे उभरकर सामने आ चुके थे और पूरे क्षेत्र में दलित-ठाकुर का जातीय विभाजन अपनी नींव मजबूत कर चुका था। युवती के परिजनों की हिमायत में ही राजनीति की संभावनाएं थीं और इसे कांग्रेस ने देखा, रालोद ने देखा और उन संगठनों ने भी देखा, जो दलितों के बहाने राजनीति की मुख्य धारा में आने को अधीर हैं।

खतरनाक दिशा में सत्ता की अधीरता : बूलगढ़ी की घटना को प्रदेश को जातीय तनाव में धकेलने की राजनीतिक साजिश के रूप में देखा जाना चाहिए। लोगों को दलित, सवर्ण, पिछड़ा में बांटने की साजिश उत्तर प्रदेश में कई दलों के लिए खाद का काम करती है और इसीलिए उनकी कोशिश होती है कि ऐसी किसी घटना पर जातीय खांचे मजबूत होते रहें और उनके लिए सत्ता की सीढ़ी बन सकें। इसी मंशा से दलित परिवार के साथ कुछ लोग रहस्यमय ढंग से रहते नजर भी आए। पूर्व में इसी तरह समाज में जातीय उभार देकर सत्ता हासिल करने के उदाहरण भी हैं। पिछले कुछ सालों में जातीयता की यह जंजीरें टूटती नजर आई हैं और इसलिए विपक्षी दलों की बेचैनी भी बढ़ी है। यही वजहें बूलगढ़ी को सियासत के केंद्र में लाती हैं और इस तरह की अन्य घटनाओं को भी तूल देने की कोशिश करती हैं।

सवाल जीवन के अधिकार का : बूलगढ़ी ने राजनीतिक दलों को यदि कठघरे में खड़ा किया तो जीवन के अधिकार के सवाल भी उठाए। वस्तुत: प्रशासनिक स्तर पर इस पक्ष की अनदेखी ने ही इसे व्यापक मुद्दा बनाया। भारतीय संविधान में यह व्यवस्था है कि व्यक्ति को उसके जीवन और वैयक्तिक स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है। गरिमापूर्ण ढंग से अंतिम संस्कार इसी का हिस्सा है, लेकिन युवती के अंतिम संस्कार में न सिर्फ मानवाधिकारों का हनन हुआ, बल्कि परिजनों को शव दिखाए बिना रात में अंतिम संस्कार ने इस पूरी घटना को जीवन के अधिकारों से जोड़ दिया। मान्य परंपराओं को किनारे कर रात्रि में ही अंतिम संस्कार को कोई भी तर्क जायज तो नहीं ही ठहरा सकता।

अभिव्यक्ति की आजादी कहां तक : हाथरस की घटना के आईने में हाई कोर्ट ने मीडिया को भी आईना दिखाया है, जिसकी अतिसक्रियता अक्सर दायरे से बाहर जाती नजर आती है। घटना को सनसनीखेज बनाने की कोशिश में शब्दों को किसी के मुंह में ठूंसना अब मीडिया की प्रवृत्ति बनती जा रही है। एक युवती से अनाचार की घटना यदि मसाले के रूप में रखा जाती है, तो यह सामाजिक रूप से खराब तो है ही, सामाजिक अपराध भी है और मीडिया इस जिम्मेदारी से मुंह मोड़ता भी नजर आता है। कोर्ट का यह कहना महत्वपूर्ण था कि ट्रायल पूरा होने से पहले अभियुक्तों को दोषी नहीं ठहराना चाहिए। इसी तरह किसी को पीड़िता के चरित्र हनन में भी शामिल नहीं होना चाहिए।

एक और बात। हाथरस को सिर्फ संदर्भ मानें तो दुष्कर्म जैसे मामलों में अधिकारियों की संवेदनशीलता के प्रश्न विचारणीय हैं। क्या किसी जिलाधिकारी, अपर पुलिस महानिदेशक जैसे अधिकारी को मीडिया में जाकर यह बयान देने का अधिकार है कि दुष्कर्म हुआ या नहीं। सांविधानिक संस्थाओं का सम्मान बनाए रखना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है। इस घटना का ही सबक था कि हाथरस के बाद जब बलरामपुर में एक दलित किशोरी से अनाचार की घटना सामने आई तो वहां के अधिकारियों ने धीरज का परिचय दिया। यही वजह थी कि राजनीतिक दलों की सक्रियता के बावजूद घटना की जांच विधि व्यवस्था के अनुसार ही आगे बढ़ती रही और बड़ा मुद्दा भी नहीं खड़ा हुआ।

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