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राकेश टिकैत : क्या किसान आंदोलन के एजेंडे से अलग चल रहे हैं?

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तारीख़: 29 सितम्बर 2013

स्थान: सरधाना, मेरठ

आयोजन: 40 गाँवों की महापंचायत

मुज़फ्फ़रनगर में हुए दंगों के सिलसिले में जांच की जो रिपोर्ट सामने आई, उसमें ये कहा गया कि 29 सितंबर, 2013 को हुई इस महापंचायत के बाद से ही ‘पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ गया’ था और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस इलाक़े के कई गाँव दंगे की चपेट में आ गए थे.

इन दंगों में दोनों पक्षों के कई लोगों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर भी दर्ज की गई, जिसमें भारतीय किसान यूनियन के नेताओं के नाम भी शामिल थे.

‘गन्ना बेल्ट’ के नाम से मशहूर उत्तर प्रदेश के इस इलाक़े को कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का मज़बूत गढ़ माना जाता रहा था. यहाँ की राजनीति में हमेशा ही किसान और उनसे जुड़े मुद्दे ही हावी रहे हैं. अलग-अलग राजनीतिक दलों पर आरोप लगता रहा है कि उन्होंने किसानों के मुद्दों हो भुनाकर ही इस क्षेत्र में वोट हासिल किए हैं.

लेकिन दंगों के बाद से इस क्षेत्र की राजनीति पूरी तरह से बदल गई और इस इलाक़े के राजनीतिक दंगल में भारतीय जनता पार्टी ने ज़ोरदार ‘एंट्री’ मारी. इतनी ज़ोरदार कि इस इलाक़े के सबसे बड़े और मज़बूत किसान माने जाने वाले चौधरी अजित सिंह को भी हार का सामना करना पड़ा.

‘दंगों से प्रभावित हुए’ ग़ुलाम मोहम्मद जौला को किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत का बहुत क़रीबी माना जाता था. दंगों से आहत जौला ने ख़ुद को भारतीय किसान यूनियन से अलग कर लिया और एक नया संगठन – भारतीय किसान मज़दूर मंच बना डाला.

तारीख़: 29 जनवरी 2021

स्थान: मुज़फ़्फ़रनगर का जीआईसी मैदान

आयोजन: महापंचायत

आठ सालों के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर में होने वाली ये सबसे बड़ी महापंचायत थी, जिसमें हज़ारों की संख्या में किसान और ग्रामीण जमा हुए. मंच पर महेंद्र सिंह टिकैत के क़रीबी रहे ग़ुलाम मोहम्मद जौला भी मौजूद थे.

मंच पर भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत मौजूद थे.

किसान नेता चौधरी अजित सिंह के पुत्र जयंत चौधरी मंच पर आते हैं और वो ग़ुलाम मोहम्मद जौला के पैर छूकर प्रणाम करते हैं. नरेश टिकैत ग़ुलाम मोहम्मद जौला को गले से लगा लेते हैं.

महापंचायत को संबोधित करते हुए जौला वहाँ मौजूद किसान और जाट नेताओं से कहते हैं – “जाटों ने दो ग़लतियाँ कर डालीं. एक चौधरी अजित सिंह को हराया और दूसरा मुसलमानों पर हमला किया.”

ग़ुलाम मोहम्मद जौला के इस बयान के बावजूद पूरी महापंचायत में सन्नाटा छाया रहा. किसी ने उनकी इस बात का कोई विरोध नहीं किया.

भारतीय किसान यूनियन के कुछ नेताओं ने बीबीसी से कहा कि ‘सन्नाटा इसलिए छा गया था क्योंकि महापंचायत में आए सभी जाट और किसान नेताओं का मानना था कि जो ग़ुलाम मोहम्मद जौला कह रहे थे. वो सही था.’

लेकिन बीकेयू के नेता मानते हैं कि जौला जो कह रहे थे, उसकी नींव 2018 के जनवरी महीने में ही पड़ गई थी, जब ग़ुलाम मोहम्मद जौला और नरेश टिकैत ने मिलकर जाटों और मुसलमानों को आपस में फिर जोड़ने की मुहिम शुरू की थी.

जानकार कहते हैं- पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट और किसानों ने समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी से किनारा कर अपना राजनीतिक भविष्य भारतीय जनता पार्टी में तलाशना शुरू कर दिया था. देखते ही देखते, टिकैत बंधुओं ने भी खुलकर ख़ुद को इस नई राजनीति में ढालना शुरू कर दिया.

नरेश टिकैत और राकेश टिकैत के क़रीबी बीकेयू के कुछ नेताओं ने बीबीसी से कहा, “साल 2018 में ग़ुलाम मोहम्मद जौला और नरेश टिकैत ने 20 सदस्यों की कमेटी बनाई थी, जिसने गाँव-गाँव जाकर मुसलमान और जाट किसानों से “पुरानी बातों को भूलकर फिर से एकजुट होने” के लिए मनाना शुरू किया था. इस क़वायद के बावजूद दोनों ही पक्षों ने कभी एक दूसरे पर किसी राजनीतिक दल के पक्ष लेने या विरोध करने के लिए कोई दबाव नहीं डाला.”

राकेश टिकैत का वो वीडियो

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ट्रैक्टर परेड के दौरान हुई हिंसा को लेकर अभी माहौल गर्म था ही कि इसी बीच पत्रकारों से बात करते हुए राकेश टिकैत भावुक हो गए. उनका ये वीडियो इस क़दर वायरल हुआ कि जो किसान आंदोलन से चले गए थे, वो लौट आए.

इस बार वो लोग भी ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पहुँच रहे हैं, जो पहले सीधे तौर पर आंदोलन में शामिल नहीं थे. ये लोग किसी एक धर्म या जाति के नहीं हैं.

किसानों और आम गाँववालों के अलावा कई राजनीतिक हस्तियाँ भी किसान नेता राकेश टिकैत से मिलने ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पहुँचीं. मुलाक़ात करने वालों में अकाली दल के नेता और पंजाब के पूर्व उप मुख्यमंत्री सुखबीर बादल के अलावा उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू, जयंत चौधरी और दीपेन्द्र सिंह हुड्डा भी शामिल थे.

चौधरी अजित सिंह के अलावा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव ने राकेश टिकैत से फ़ोन पर बात कर अपना समर्थन देने की घोषणा की.

तो क्या राकेश टिकैत दिल्ली की सरहदों पर किसानों का आंदोलन संचालित करने वाले संयुक्त किसान मोर्चा से अलग तरीक़ा अपनाए हुए हैं?

ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर चल रहे किसानों के धरने के संयोजक आशीष मित्तल ऐसा नहीं मानते.

बीबीसी से बात करते हुए वो कहते हैं, “शुरू में तो किसी नेता को मंच पर आने ही नहीं दिया गया था.”

वो कहते हैं, “शुरू में किसी भी राजनीतिक दल को हमने मंच से अलग ही रखा. लेकिन 26 जनवरी की रात से सब कुछ बदल गया और आंदोलन काफ़ी फैल गया. इसलिए राजनीतिक दलों के नेता भी आ रहे हैं और समर्थन देने की घोषणा कर रहे हैं.”

मित्तल कहते हैं कि अब भी किसी राजनीतिक दल के नेता को मंच से बोलने नहीं दिया जाता है.

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के नेता वीजू कृष्णन कहते हैं, “26 जनवरी के बाद से ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर नेता एकजुटता दिखाने पहुँच रहे हैं. उनका कहना है कि किसान संगठन सभी से समर्थन मांग रहे हैं और लोग आगे आकर समर्थन भी दे रहे हैं.”

नया प्रस्ताव

हाल ही में एक समाचार एजेंसी ने ख़बर चलाई जिसमें राकेश टिकैत के हवाले से कहा गया कि- वे चाहते हैं कि मौजूदा केंद्र सरकार अगले 36 महीनों तक तीनों कृषि क़ानूनों को स्थगित रखे. यानी इस सरकार के बाक़ी के बचे हुए कार्यकाल तक. यहाँ भी राकेश टिकैत ने मोर्चा से अलग लाइन ले ली, क्योंकि मोर्चा का कहना है कि जब तक तीनों क़ानून पूरी तरह से वापस नहीं होते, किसानों का आंदोलन वापस नहीं होगा.

ये प्रस्ताव नरेश टिकैत की तरफ़ से भी आया है कि सरकार 18 महीने की जगह 2024 तक के लिए नए कृषि क़ानून क्यों नहीं रद्द कर देती? ये सुझाव नरेश टिकैत ने बीबीसी हिंदी को दिए अपने इंटरव्यू में कहा है.

अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव अविक साहा का कहना है, “अभी तक राकेश टिकैत की बातें आंदोलन को नुक़सान नहीं पहुँचा रहीं हैं. अलबत्ता उन्होंने और भी ज़्यादा समर्थन जुटाने का काम किया है. वो इसी तरह बात करते हैं बिना किसी लाग-लपेट के, इसलिए मोर्चा को कोई आपत्ति नहीं है.”

साहा ने बीबीसी से कहा, “हर व्यक्ति का अपना विचार होता है, जिसे वो रखने के लिए स्वतंत्र है. संयुक्त किसान मोर्चा हर उस संगठन और व्यक्ति का स्वागत करता है जो किसानों की मांगों के समर्थन में आगे आए हैं.”

लेकिन हाल ही में किसान आंदोलन से अलग हुए राष्ट्रीय किसान मज़दूर संगठन के अध्यक्ष वीएम सिंह का आरोप है कि पहले समर्थन देने आने वाले नेताओं या राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं को मंच पर जाने की अनुमति नहीं थी. वो सामने नीचे बैठा करते थे.

वीएम सिंह कहते हैं कि 26 जनवरी के बाद से अब नेता न सिर्फ़ मंच पर आ रहे हैं, बल्कि वहाँ से अपना संबोधन भी कर रहे हैं.

वीएम सिंह ने टिकैत बंधुओं पर सत्तारूढ़ दल के लिए काम करने का आरोप भी लगाया था, जिसे बीकेयू के नेता आशीष मित्तल ने ख़ारिज करते हुए कहा, “सिर्फ़ एक अभय चौटाला थे, जिन्होंने मंच से लोगों को संबोधित किया था. बाक़ी के जितने नेता आए, एक तो उन्हें भाषण नहीं देने दिया गया. अगर किसी ने किसानों को संबोधित भी किया, तो उन्होंने मंच के नीचे से किया न कि मंच से.”

टिकरी बॉर्डर पर आंदोलन के संयोजक संजय माधव कहते हैं, “अगर वाकई में राकेश टिकैत ने 36 महीनों के लिए कृषि क़ानूनों को स्थगित करने की मांग की है तो ये उनका निजी विचार हो सकता है जिसका आदर करना चाहिए. लेकिन आंदोलन से संबंधित कोई भी नीतिगत फ़ैसला इसमें शामिल 40 किसान संगठनों के प्रतिनिधियों की आम राय से ही होगा.”

संयुक्त किसान मोर्चा के नेता चाहे जो कहें, ये बात तो सच है कि राकेश टिकैत, किसान आंदोलन में काफ़ी देर से शामिल हुए, लेकिन आज की तारीख़ में सबसे अधिक चर्चा में हैं.

जानकार कहते हैं कि 26 जनवरी को जो कुछ हुआ, उससे आंदोलन की छवि ख़राब हुई. ऐसा समय भी आया, जब लगने लगा कि आंदोलन ख़त्म हो जाएगा. लेकिन वो राकेश टिकैत ही हैं जिन्होंने इसमें दोबारा जान फूँक दी. इसलिए वो जो करते हैं, उस पर मोर्चा के नेताओं को फिलहाल ज़्यादा आपत्ति नहीं है.

वो कहते हैं कि राकेश टिकैत आंदोलन में काफ़ी देर से शामिल हुए थे, लेकिन इस वक़्त वही आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा बन गए हैं.

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