कुछ साल पहले दूरदर्शन पर संजीव कुमार की एक फिल्म ‘अंगूर’ देखी थी। यह मार्च 1982 में रिलीज हुई और बहुत ही रोचक विषय पर आधारित है। इसका नायक अशोक अपनी पत्नी के लिए सोने का हार बनवाने जाता है। उसके बाद एक-एक कर ऐसी घटनाएं होती हैं कि मामला ग़लतफ़हमी से लेकर पुलिस थाने तक जा पहुंचता है। आखिर में सबकुछ ठीक हो जाता है।

इसी तरह मुंशी प्रेमचंद की कई कहानियों से पता चलता है कि भारतीय समाज गहनों की भूख से कितना पीड़ित रहा है। समाज के शातिर लोगों ने इसे रस्मो-रिवाजों से जोड़ दिया, जिसके बाद आम इन्सान की ज़िंदगी और ज्यादा मुश्किल हो गई है।

मैं गहनों के बोझ को भारतीय समाज का ऐसा नकारात्मक बिंदु समझता हूं जिसे रूढ़िवादियों ने बहुत चालाकी से गढ़ा है। मैंने गौर किया कि शादियों में जितने गहने महिलाओं के लिए दिए जाते हैं, उतने पुरुषों के नहीं दिए जाते।

पुरुष अंगूठी या चेन पहनकर आजाद घूमते हैं, जबकि महिलाओं की गर्दन, सिर, नाक, कान, हाथ, पांव में भारी-भरकम गहने लाद दिए जाते हैं। वे इन्हें खुशी-खुशी पहनती हैं कि देखो, मेरा पति मुझसे कितना प्रेम करता है!

मैं ऐसे जेवरों को जंजीर कहता हूं। ये महिलाओं की प्रगति, वास्तविक स्वतंत्रता में बहुत बड़ी रुकावट हैं। मैं अक्सर कहता हूं कि ‘जितना सोना, उतना रोना’। प्राय: कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवार सोना खरीदकर उनके गहने बनवाने तक कर्जों में डूब चुके होते हैं।

कीमती गहने घर में रखने से चोरी का खतरा बना रहता है। उन्हें रोज-रोज पहन नहीं सकते। किसी खास मौके पर पहनें तो यह डर रहता है कि कहीं खो न जाएं। अगर खो जाएं तो अलग सिरदर्द। जब दूसरे की पत्नी गहनों से लदी घूमे और खुद की पत्नी उन्हें देख ले और फरमाइश कर दे तो घर में क्लेश।

अगर गहने हों लेकिन खुद न पहनें तो रिश्तेदार आ धमकें- ‘दीदी, दो-चार घंटे की तो बात है, अपने झुमके दे दीजिए!’

अब न दें तो संबंध बिगड़ें और दे दें तो वापसी के लिए पीछे घूमते रहें। इस बीच एक भी जेवर गायब हो जाए तो रोना-धोना अलग। बुढ़ापे या मौत के बाद जब इन गहनों का बंटवारा होता है तो झगड़े, मुकदमेबाजी तक की नौबत आ जाती है।

हर भारतीय शादी में फूफा का रूठना और किसी का गहना गुम हो जाना/समय पर न मिलना जैसी घटनाएं होती ही होती हैं। कई बार इनसे रंग में भंग पड़ जाता है।

फिल्मों और परंपराओं में गहनों का अत्यधिक महिमा मंडन कर दिया गया है। उन्हें देखकर लगता है कि वही व्यक्ति अपनी पत्नी से सच्चा प्रेम करता है जो हर खास मौके पर उसे गहना पहनाए और तारीफ करते हुए कहे- तुम इसमें बहुत खूबसूरत नजर आती हो!

भारतीय समाज में गहनों की परंपरा के कई पहलू हैं। मैंने जो देखा, उसके मुताबिक जब कोई शख्स शादी जैसे मौकों पर गहने बनवाता है तो उसके लिए रुपया उधार लेता है। इधर सूदखोर का सूद चढ़ता जाता है, उधर घर में हाहाकार मचता है। आखिर किस काम की यह परंपरा?

अगर पश्चिमी देशों में देखें तो वहां जनसामान्य में अंगूठी से ज्यादा गहनों का चलन नहीं है। बहुत कम परिवार इससे ज्यादा गहने खरीदने के प्रति आकर्षण रखते हैं। वे लोग अपनी ऊर्जा इन चीजों में बर्बाद नहीं करते। इसलिए वे हमसे ज्यादा संपन्न, स्वतंत्र और विकसित हैं। हां, कई लोग सोने में निवेश करते हैं, पर यह कोई धार्मिक, सामाजिक परंपरा नहीं है। इसके पीछे लाभ कमाने की मंशा होती है।

यहां मेरा आशय यह कहना बिल्कुल नहीं है कि गहने खरीदना, पहनना पाप है। जहां पारिवारिक मान्यताओं में इसे सौभाग्य का चिह्न माना जाता है, उतने गहने जरूर पहनें, पर इसे अनावश्यक संग्रह का विषय नहीं बनाना चाहिए। मैं मानता हूं कि हर बेटी अपने आप में सुंदर है। उसे इसके लिए दुनिया के किसी गहने की कोई जरूरत नहीं है।

आपको सशक्त होने की जरूरत है। गहनों का बोझ आपको शक्तिशाली नहीं, कमजोर बनाता है। सिर्फ शिक्षा ही वह अस्त्र है जो गुलामी, गरीबी, भेदभाव, असमानता को मिटा सकता है। अपने बटुए में अपनी कमाई का रुपया इकट्ठा कीजिए। तभी समाज आपका आदर करेगा। खाली बटुए का कोई आदर नहीं करता, परिवार और रिश्तेदार भी नहीं।