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50 हजार लोगों से गुलजार रहने वाला शहर अब है वीरान, 6 लाख लोगो को है घर वापसी का इंतजार

बाकू, अजरबैजान (एपी)। अजरबैजान और आर्मेनिया के बीच नार्गोनो-कराबाख को लेकर चली लड़ाई ने लोगों का काफी नुकसान किया है। इस जगह का इतिहास भी काफी खून-खराबे वाला रहा है। इसको लेकर 1990 से जारी संघर्ष में अब तक 6 लाख लोग बेघर होकर यहां से जा चुके हैं। इस जगह पर आर्मेनिया का कब्जा है। इस बार
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50 हजार लोगों से गुलजार रहने वाला शहर अब है वीरान, 6 लाख लोगो को है घर वापसी का इंतजार

बाकू, अजरबैजान (एपी)। अजरबैजान और आर्मेनिया के बीच नार्गोनो-कराबाख को लेकर चली लड़ाई ने लोगों का काफी नुकसान किया है। इस जगह का इतिहास भी काफी खून-खराबे वाला रहा है। इसको लेकर 1990 से जारी संघर्ष में अब तक 6 लाख लोग बेघर होकर यहां से जा चुके हैं। इस जगह पर आर्मेनिया का कब्‍जा है। इस बार इस जगह को लेकर लड़ाई करीब डेढ़ माह तक चली थी। रूस के हस्‍तक्षेप के बाद इसको रोका जा सका है। इसके बावजूद दोनों ही तरफ की सेनाएं और राजनेता इस बात को कहने से नहीं चूक रहे हैं कि ये युद्ध विराम केवल अस्‍थाई तौर पर है। इस युद्ध ने यहां के बसे-बसाए इलाकों को उजाड़ कर रख दिया है। अघदाम इन्‍हीं में से एक इलाका है। यह इलाका कभी यहां पर रहने वाले 50 हजार लोगों से गुलजार रहता था। लेकिन अब ये पूरी तरह से उजड़ चुका है। खाली पड़ी सड़कें, सूनसान बाजार और टूटे मकान इसकी बर्बादी की कहानी बयां कर रहे हैं।

50 हजार लोगों से गुलजार रहने वाला शहर अब है वीरान, 6 लाख लोगो को है घर वापसी का इंतजार
अजरबैजान और आर्मेनिया के बीच संघर्ष की वजह बने नार्गोनो-कराबाख से लाखों लोग बेघर हो चुके हैं। युद्ध की वजह से वर्षों से दूसरे इलाकों में गुजरबसर करने वाले इन लोगों को अपनी वापसी की हर पल उम्‍मीद रहती है।

वापसी की बाट जोह रहे लोग 

नार्गोनो-कराबाख से दूर होकर जीवन जीने वाले लाखों लोगों अपनी वापसी का इंतजार है। ये लोग वापस अपने घरों में लौटना चाहते हैं, लेकिन हालात के कभी भी बेकाबू होने की आशंका के डर से ये ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। अघदम 62 वर्षीय आदिल का होम टाउन है। 1992 में नार्गोनो-कराबाख को लेकर जब अजरबैजान और आर्मेनिया के बीच संघर्ष हुआ तो उन्‍होंने इस जगह को हमेशा के लिए छोड़ दिया और अजरबैजान की राजधानी बाकू आ गए। यहां आने के बाद भी आदिल का दिल अपने गृह नगर के लिए मचलता ही रहता है।

हर तरफ फैली है डराने वाली खामोशी 

अघदम की ही तरह जैबराइल भी ऐसा ही इलाका है जो कभी लोगों की चहल-पहल से गुलजार रहा करता था लेकिन अब विरान है। आदिल के एक भतीजे ने बताया कि डेढ़ माह तक चले युद्ध ने इस इलाके में सब कुछ खत्‍म कर दिया है। अब ये इलाका पूरी तरह से खंडहर नजर आता है। हर जगह टूटे मकान और सड़कों पर खड़े जले वाहनों के अवशेष ही दिखाई देते हैं।

दिल दहला देने वाली है यहां की बर्बादी 

आदिल के भतीते के मुताबिक एक दिन जब उसको वहां पर जाने का मौका मिला तो वो इसको लेकर काफी खुश था। उसने यहां की खबरों को इंटरनेट के जरिए जाना था। उसने बताया कि यहां पर होने वाला नुकसान दिल दहला देने वाला है। यहां हुई बर्बादी के बाद भी आदिल की मां को कोई उम्‍मीद बांधे ही रखती है। उनको लगता है कि उनका घर ठीक-ठाक हाल में होगा। इसको उन्‍होंने बड़ी हसरत से बनवाया था।

शौसा की भी कहानी है ऐसी ही 

ऐसी ही है शौसा की कहानी अजरबैजान के कब्‍जे वाले शौसा इलाके की भी कुछ ऐसी ही कहानी है। 50 वर्षीय जुमेवा का कहना है कि यहां पर फिलहाल वापसी के हालात नहीं हैं। उसके एक भाई नासिमी ने भी इस युद्ध में हिस्‍सा लिया था। नासिमी उसको यहां की जानकारी देता रहता है। 1992 में उसके परिवार ने भी जंग को देखते हुए यहां से विदा ले ली थी। यहां के ही एक अपार्टमेंट में उन्‍होंने काफी समय बिताया था। उनका कहना है कि यहां पर आखिर आर्मेनियन ही रहेंगे, यह तय है। यहां से अलग हुए उन्‍हें काफी समय बीत गया है, इसके बावजूद जब भी उन्‍हें अपना बचपन याद आता है तो उनका मन यहां पर वापस आने के लिए मचल उठता है। लेकिन हालात बार-बार उनकी राह रोक लेते हैं।

वापसी की उम्‍मीद 

उन्‍हें इस बात की भी उम्‍मीद है कि उनके नाती-पोते एक दिन यहां पर जरूर जाएंगे और उनकी भावनाओं को समझेंगे। उन्‍होंने बताया कि बाकू में ऐसे कई परिवार हैं जो अपनी जमीन अपना घर छोड़कर यहां पर रहने को मजबूर हुए हैं। ऐसे लगभग सभी लोगों के पास उनका अपना घर है। इसके बाद भी उन्‍हें ये लगता है कि वो यहां पर स्‍थायी तौर पर नहीं रहेंगे। हर किसी को उम्‍मीद है कि एक दिन वो उस जगह पर वापस चला जाएगा, जहां से वो आया है। इनका दिल हमेशा अपने घर पर वापसी के लिए मचलता रहता है। जुमैवा का कहना है कि उनके कई सारे दोस्‍त आर्मेनियन हैं। दोनों देशों में छिड़े संघर्ष के बाद भी आर्मेनियन को लेकर उनकी भावनाएं गलत नहीं हैं। लेकिन वो ये भी मानती हैं कि नेताओं की वजह से शुरू की गई लड़ाई का खामियाजा आखिर में आम जनता ही उठाती है।