प्रदेशकांग्रेस को फिर भी बैर, जबकि गैरसैंण नहीं गैर

कांग्रेस को फिर भी बैर, जबकि गैरसैंण नहीं गैर

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देहरादून। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र गैरसैंण को लेकर एक के बाद एक, मास्टर स्ट्रोक ठोक रहे हैं और विपक्ष कांग्रेस हाथ मलने के अलावा कुछ नहीं कर पा रही है। गैरसैंण में राजधानी, अलग उत्तराखंड राज्य की अवधारणा के मूल में था, मगर इस पर 19 सालों तक कुछ नहीं हुआ, सिवा सियासत के। इसी साल मार्च में गैरसैंण में विधानसभा के सत्र के दौरान मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अचानक गैरसैंण को राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित कर दिया।

कांग्रेस को काटो तो खून नहीं। गैरसैंण में कैबिनेट बैठक, विधानसभा सत्र की पहल कांग्रेस सरकार के समय हुई, मगर वह इससे आगे कदम बढ़ाने का साहस नहीं जुटा पाई। त्रिवेंद्र ने पहले गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया और हाल में राज्य स्थापना दिवस पर गैरसैंण में आधारभूत ढांचे के विकास के लिए 25 हजार करोड़ की योजना का एलान भी कर दिया। हाथ से मौका कैसे फिसलता है, कोई कांग्रेस से पूछे।

ये क्या हो रहा, ये क्यों हो रहा

सूबे में पिछले छह सालों में पूरी तरह भाजपा का वर्चस्व चला आ रहा है, जबकि कांग्रेस पूरी तरह हाशिए पर है। अब लग रहा कि कमजोर विपक्ष के बावजूद भाजपा को चुनौती मिल रही है, उसकी ही पार्टी के नेता मानों विपक्ष की भूमिका निभाने को आतुर हैं। एक विधायक को छह साल के लिए निष्कासित किया और सालभर बाद फिर गले लगा लिया। भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस के दावे पर सवाल उठाने वाले नेताजी का मामला फिलहाल पैंडिंग चल रहा है। एक कैबिनेट मंत्री के पर कतरे गए तो छटपटाहट सियासी परिदृश्य पर दिखनी ही थी। एक अन्य हैं, जिन्होंने अपने पुराने कप्तान पर कथित टिप्पणी को लेकर तूफान बरपाने में कोई कसर ही नहीं छोड़ी। ताजातरीन मामला एक पूर्व मंत्री लाखीराम जोशी का है, जो सरकार के खिलाफ सीधे पीएमओ में दस्तक दे बैठे। सूरतेहाल, सभी की जुबां पर यही है कि आखिर इसकी वजह क्या है।

चुनावी वैतरणी में नैया के दो नए खेवनहार

चुनाव हैं, तो हर कोई जीतना चाहता है। इसमें गलत कुछ भी नहीं। अब इसमें कौन कामयाब होगा, कैसे होगा, कब होगा, यह सब डिपेंड करता है मैदान में उतरने वाले राजनीतिक दलों के संगठन के नेटवर्क, नेतृत्व क्षमता और जनता पर पकड़ पर। अपने सूबे में सवा साल बाद विधानसभा चुनाव हैं, तो सत्तासीन भाजपा और विपक्ष कांग्रेस पूरी ताकत झोंकने को तैयार बैठे हैं। संगठन और पकड़ के पैमाने पर तो कांग्रेस फिलहाल भाजपा के मुकाबले बैकफुट पर ही दिख रही है, लेकिन नेतृत्व के पैमाने पर दोनों ने लगभग एक ही साथ एक जैसा कदम उठाया है। आलाकमान के नुमाइंदे के तौर पर प्रदेश प्रभारी का काफी अहम रोल होता है। भाजपा ने दुष्यंत कुमार गौतम, तो कांग्रेस ने देवेंद्र यादव पर दांव खेला है। अब चुनाव की कसौटी पर गौतम खरा उतरते हैं या फिर यादव, काफी कुछ तय करेगा कि मिशन 2022 कौन फतेह करेगा।

बिहार में मोदी मैजिक, भाजपा उत्तराखंड में खुश

तमाम तरह के वर्चुअल सर्वे पोल के नतीजों को दरकिनार करते हुए बिहार में फिर एनडीए को बहुमत हासिल हुआ। इसके साथ ही अन्य राज्यों में हुए उपचुनावों में भी भाजपा को जबर्दस्त सफलता मिली। हालांकि, अबकी बार बिहार में जेडीयू के मुकाबले भाजपा काफी आगे निकल गई। भाजपा की इस जबरदस्त कामयाबी का एकमात्र कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जादू को ही माना जा सकता है। बिहार के नतीजों से उत्तराखंड में भी भाजपा अब काफी कुछ निश्चिंतता में नजर आ रही है। हो भी क्यों न, पिछले दो लोकसभा चुनाव और एक विधानसभा चुनाव में नमो लहर में ही तो पार्टी को इस कदर कामयाबी मिली। लब्बोलुआब यह कि छह साल से जब लहर पर सवार हैं तो सवा साल बाद भी सवारी का मौका मिलेगा ही। फिर यहां तो वैसे ही कांग्रेस कोने में दुबकी बैठी है, बाकी कोई और चुनौती देने वाला भी तो है नहीं।

 

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