दुनिया इस समय एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहां मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में कभी भी महायुद्ध भड़क सकता है। इजरायल, हमास और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और शांति को खतरे में डाल दिया है। लेकिन इसी बीच एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने सबको चौंका दिया है। खबर है कि पाकिस्तान, अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ (Mediator) की भूमिका निभा रहा है और इस्लामाबाद में दोनों देशों के बीच गुप्त बातचीत की सुगबुगाहट तेज हो गई है।
यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका और ईरान के बीच दशकों से ’36 का आंकड़ा’ रहा है। अगर पाकिस्तान इन दोनों कट्टर दुश्मनों को एक मेज पर लाने में सफल रहता है, तो यह न केवल दक्षिण एशिया बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत होगी।
इस्लामाबाद बना कूटनीति का अखाड़ा: क्या है पाकिस्तान का नया रोल?
ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के उच्च अधिकारियों के बीच बातचीत का एक खाका तैयार किया गया है। पाकिस्तान के पास ईरान के साथ एक लंबी सीमा है और अमेरिका के साथ उसके पुराने सामरिक संबंध रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तान खुद को एक ऐसे ‘पुल’ के रूप में पेश कर रहा है जो दोनों देशों की गलतफहमियों को दूर कर सके।
सूत्रों का कहना है कि इस बातचीत का मुख्य उद्देश्य मिडिल ईस्ट में जारी हिंसा को रोकना और गाजा में सीजफायर (युद्धविराम) के लिए ईरान की मदद लेना है। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने समर्थित समूहों (जैसे हिजबुल्लाह और हूती) को शांत रखे, ताकि युद्ध और न फैले। वहीं, ईरान चाहता है कि अमेरिका उस पर लगे कड़े आर्थिक प्रतिबंधों में ढील दे।
मिडिल ईस्ट संकट और $100 बिलियन का खतरा: क्यों जरूरी है यह समझौता?
मिडिल ईस्ट का यह तनाव सिर्फ मिसाइलों तक सीमित नहीं है, यह सीधे तौर पर दुनिया की जेब पर असर डाल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान और अमेरिका के बीच सीधे तौर पर युद्ध छिड़ता है, तो:
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कच्चे तेल की कीमतें: दुनिया भर में तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार जा सकती हैं, जिससे भारत जैसे देशों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी।
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शिपिंग रूट पर संकट: लाल सागर (Red Sea) में हूती विद्रोहियों के हमलों से वैश्विक व्यापार को हर दिन अरबों डॉलर का नुकसान हो रहा है।
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अर्थव्यवस्था की कमर: एक पूर्ण युद्ध से वैश्विक अर्थव्यवस्था को सालाना $1 ट्रिलियन से ज्यादा का झटका लग सकता है।
इन्हीं खतरों को देखते हुए अमेरिका अब पर्दे के पीछे से ईरान से बात करने की कोशिश कर रहा है और इसके लिए पाकिस्तान से बेहतर विकल्प फिलहाल कोई दूसरा नजर नहीं आ रहा।
क्या सफल होगी यह मध्यस्थता? चुनौतियां और उम्मीदें
पाकिस्तान के लिए यह राह इतनी आसान नहीं है। अतीत में भी कई देशों ने इन दोनों के बीच सुलह कराने की कोशिश की है, लेकिन हर बार बात बिगड़ गई। पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह एक तरफ सऊदी अरब और अमेरिका को खुश रखे और दूसरी तरफ अपने पड़ोसी देश ईरान का भरोसा न तोड़े।
ईरान का परमाणु कार्यक्रम और इजरायल के प्रति उसका कड़ा रुख इस बातचीत में सबसे बड़ा रोड़ा है। दूसरी तरफ, अमेरिका के भीतर भी इस बातचीत का विरोध हो सकता है। हालांकि, अगर इस्लामाबाद में हो रही यह शुरुआती बातचीत किसी समझौते तक पहुंचती है, तो दुनिया के नक्शे पर पाकिस्तान की छवि एक ‘शांतिदूत’ के रूप में उभरेगी।
दुनिया भर के कूटनीतिज्ञों की नजरें अब इस्लामाबाद की तरफ टिकी हैं। क्या पाकिस्तान वाकई इस महायुद्ध को टालने में सफल होगा? यह आने वाले कुछ हफ्ते साफ कर देंगे।
FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न):
1. पाकिस्तान ही अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता क्यों कर रहा है?
पाकिस्तान के ईरान के साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध हैं, साथ ही वह अमेरिका का एक पुराना सैन्य सहयोगी (Major Non-NATO Ally) भी है। पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति उसे इस बातचीत के लिए एक आदर्श जगह बनाती है।
2. इस बातचीत का मुख्य मुद्दा क्या है?
मुख्य मुद्दा मिडिल ईस्ट (विशेषकर गाजा और इजरायल-ईरान तनाव) में युद्ध को रोकना, लाल सागर में जहाजों पर होने वाले हमलों को बंद करना और ईरान पर लगे प्रतिबंधों के बीच कोई बीच का रास्ता निकालना है।
3. इस समझौते का भारत पर क्या असर होगा?
अगर यह बातचीत सफल होती है, तो तेल की कीमतें स्थिर होंगी जो भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत अच्छी खबर होगी। साथ ही, चाबहार पोर्ट जैसे प्रोजेक्ट्स पर काम करने में भी आसानी होगी।



