उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर जिले के टांडा तहसील से एक ऐसी खबर सामने आई है, जो सूबे की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर गंभीर सवालिया निशान लगाती है। सरकार भले ही ‘हर गांव, हर शहर’ में बेहतर इलाज का दावा करे, लेकिन टांडा के शहरी स्वास्थ्य केंद्रों (Urban Health Centers) की हकीकत इन दावों से कोसों दूर है। यहाँ के केंद्रों पर ताला लटका होना और डॉक्टरों की अनुपस्थिति ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है।
टांडा एक घनी आबादी वाला क्षेत्र है जहाँ बड़ी संख्या में बुनकर और मजदूर वर्ग रहता है। इन लोगों के लिए सरकारी स्वास्थ्य केंद्र ही एकमात्र सहारा होते हैं, लेकिन पिछले कुछ समय से यहाँ की सेवाएं पूरी तरह चरमरा गई हैं।
1. ताले में कैद स्वास्थ्य सेवाएं: गेट से लौट रहे हैं मरीज
टांडा के विभिन्न नगरीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का जब जायजा लिया गया, तो स्थिति बेहद डरावनी मिली। कई केंद्रों पर कार्यदिवस (Working Days) के दौरान भी ताला लटका रहता है। जो मरीज अपनी छोटी-मोटी बीमारियों, टीकाकरण या प्रसव संबंधी परामर्श के लिए आते हैं, उन्हें निराश होकर लौटना पड़ रहा है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि यहाँ तैनात कर्मचारी और डॉक्टर अपनी मर्जी से आते-जाते हैं। कई बार केंद्र खुलता भी है, तो वहाँ न तो दवाइयां होती हैं और न ही कोई जांच की सुविधा। ऐसे में गरीब मरीजों के पास अस्पताल के बाहर घंटों इंतजार करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। बुजुर्गों और छोटे बच्चों को गोद में लेकर आईं महिलाओं के चेहरे पर मायूसी और गुस्सा साफ देखा जा सकता है।
2. निजी अस्पतालों की चांदी: जेब पर पड़ रहा है भारी बोझ
सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के ठप होने का सबसे बड़ा असर गरीबों की जेब पर पड़ रहा है। टांडा में जब सरकारी केंद्र बंद मिलते हैं, तो मजबूरी में मरीजों को निजी नर्सिंग होम या झोलाछाप डॉक्टरों के पास जाना पड़ता है।
एक सामान्य बुखार या छोटी चोट के इलाज के लिए भी निजी डॉक्टर ₹200 से ₹500 तक की फीस ले रहे हैं। इसके बाद महंगी दवाइयों का खर्च अलग से। एक मजदूर, जो दिन भर में ₹300-₹400 कमाता है, उसके लिए एक दिन का इलाज उसके पूरे हफ्ते की कमाई चट कर जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन की इस लापरवाही की वजह से कस्बे में निजी क्लीनिकों की चांदी कट रही है और सरकारी पैसा बर्बाद हो रहा है।
3. प्रशासन का मौन और जनता का बढ़ता आक्रोश
टांडा की इस बदहाली पर स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारियों ने चुप्पी साध रखी है। बार-बार शिकायतों के बावजूद जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नजर नहीं आ रहा है। स्वास्थ्य केंद्रों के भवनों की हालत भी जर्जर होती जा रही है, जिससे वहाँ काम करने वाले स्टाफ को भी डर सताता है।
नाराज नागरिकों का कहना है कि चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन चुनाव बीतते ही जनता को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है। यदि जल्द ही इन केंद्रों पर डॉक्टरों की नियमित तैनाती और दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं की गई, तो जनता सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करने को मजबूर होगी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के तहत क्या इन लापरवाह अधिकारियों पर गाज गिरेगी? यह एक बड़ा सवाल है।
अंबेडकर नगर के टांडा में स्वास्थ्य सेवाओं का इस तरह पटरी से उतरना सिर्फ एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के साथ क्रूर मजाक है। स्वास्थ्य सेवा हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, और इसे सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस रिपोर्ट के बाद जागता है या टांडा की जनता ऐसे ही ‘राम भरोसे’ रहेगी।
FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न):
1. टांडा के शहरी स्वास्थ्य केंद्रों में मुख्य समस्या क्या है?
मुख्य समस्या डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की कमी, समय पर केंद्रों का न खुलना और बुनियादी दवाइयों का अभाव है।
2. इन केंद्रों के बंद होने से किस वर्ग पर सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है?
सबसे ज्यादा असर बुनकर समाज, दिहाड़ी मजदूरों और बीपीएल श्रेणी के परिवारों पर पड़ रहा है, जो महंगे निजी इलाज का खर्च नहीं उठा सकते।
3. क्या इस मामले की शिकायत उच्च अधिकारियों से की गई है?
हाँ, स्थानीय निवासियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कई बार मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) को पत्र लिखा है, लेकिन अभी तक ठोस कार्रवाई का इंतजार है।


