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सरकार के मत से अलग मत रखना और व्यक्त करना राजद्रोह नहीं बनता 
 

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सरकार के मत से अलग मत रखना और व्यक्त करना राजद्रोह नहीं बनता 

राजद्रोह तभी बनेगा जब नारेबाजी के बाद विद्रोह पैदा हो जाए और समुदाय में नफरत फैल जाए

विशेष रिपोर्ट-
देश मे राजद्रोह को लेकर तमाम तरह की चर्चाओं से बाजार गर्म रहा है  लेकिन वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ को एक बड़ी राहत देते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने  अपने फैसले में, उनके यूट्यूब चैनल में उनकी कथित आरोपों वाली टिप्पणियों के लिए शिमला, हिमाचल प्रदेश में उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द कर दिया था । अदालत ने देशद्रोह के मामले को रद्द करने की मांग करने वाली उनकी याचिका पर फैसला सुनाया था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में प्राथमिकी और कार्यवाही को रद्द करते हुए कहा कि "केदार नाथ सिंह के फैसले के अनुसार हर पत्रकार की रक्षा की जाएगी।शीर्ष अदालत ने, हालांकि, विनोद दुआ की दूसरी प्रार्थना को खारिज कर दिया, जिसमें 10 साल या उससे अधिक के कई पत्रकारों के खिलाफ लगाए गए राजद्रोह के आरोपों की जांच के लिए प्रत्येक राज्य में एक हाई लेवल समिति गठित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट से निर्देश देने की मांग की गई थी।

दुआ ने पिछले साल सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, जिसमें उनके खिलाफ शिमला, हिमाचल प्रदेश में पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ अपने यूट्यूब चैनल में कथित आरोप लगाने वाली टिप्पणियों के लिए दर्ज देशद्रोह की प्राथमिकी (प्रथम सूचना रिपोर्ट) को रद्द करने की मांग की गई थी।1962 में सुप्रीम कोर्ट ने केदारनाथ बनाम बिहार राज्य के वाद में महत्वपूर्ण व्यवस्था दी थी। अदालत ने कहा था कि सरकार की आलोचना या फिर प्रशासन पर कॉमेंट करने से राजद्रोह का मुकदमा नहीं बनता। राजद्रोह का केस तभी बनेगा जब कोई भी वक्तव्य ऐसा हो जिसमें हिंसा फैलाने की मंशा हो या फिर हिंसा बढ़ाने का तत्व मौजूद हो।राजद्रोह का मामला शुरू से ही विवादों के घेरे में रहा है। पांच साल पहले सुप्रीम कोर्ट में इसको लेकर एक अर्जी दाखिल की गई थी और राजद्रोह कानून पर सवाल उठाया गया था। तब सुप्रीम कोर्ट में आरोप लगाया गया था कि राजद्रोह से संबंधित कानून का सरकार दुरुपयोग कर रही है। याचिकाकर्ता ने तब कहा था कि संवैधानिक बेंच ने राजद्रोह मामले में व्यवस्था दे रखी है बावजूद इसके कानून का दुरुपयोग हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट में कॉमनकॉज की ओर से दाखिल अर्जी में कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट ने 1962 ने केदारनाथ बनाम बिहार राज्य के मामले में जो व्यवस्था दे रखी है उसे पालन किया जाना चाहिए और इसको लेकर सरकार को निर्देश दिया जाना चाहिए।
हाल ही में 3 मार्च  2021  को सुप्रीम कोर्ट में जम्मू कश्मीर के पूर्व सीएम फारुख अब्दुल्ला का मामला आया था।

तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सरकार से अलग मत रखना राजद्रोह नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद-370 पर जम्मू कश्मीर के पूर्व सीएम फारुख अब्दुल्ला के बयान के मामले में उनके खिलाफ दाखिल याचिका को खारिज करते हुए उक्त टिप्पणी की थी। याचिका में कहा गया था कि फारुख अब्दुल्ला ने 370 को बहाल करने का जो बयान दिया है वह राजद्रोह है और उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। 3 मार्च को इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सरकार के मत से अलग मत रखना और व्यक्त करना राजद्रोह नहीं बनता है। अदालत ने याचिकाकर्ता की अर्जी खारिज करते हुए उन पर 50 हजार रुपये का हर्जाना भी लगाया है।
वहीं 14 सितंबर 2020 को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस मदन बी लोकुर ने कहा था कि विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाने के लिए राजद्रोह जैसे कानून का इस्तेमाल किया जा रहा है जो चिंता का विषय है। फ्रीडम ऑफ स्पीच एंड जूडिशरी विषय पर आयोजित कार्यक्रम में लोकुर ने ये बात कही थी। विचार अभिव्यक्ति के मामले में जर्नलिस्टों को जेल में डालने के मामले का हवाला दिया था और कहा था कि विचार अभिव्यक्ति के मामले में अनुमान लगाया जा रहा है और गलत संदर्भ में देखा जा रहा है जो चिंता का विषय है।

1995 में बलवंत सिंह बनाम स्टेट ऑफ पंजाब केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सिर्फ नारेबाजी से राजद्रोह नहीं हो सकता। कैजुअल तरीके से कोई नारेबाजी करता है तो वह राजद्रोह नहीं माना जाएगा। उक्त मामले में दो सरकारी कर्मियों ने देश के खिलाफ नारेबाजी की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नारेबाजी भर से देश को खतरा का मामला नहीं बनता। राजद्रोह तभी बनेगा जब नारेबाजी के बाद विद्रोह पैदा हो जाए और समुदाय में नफरत फैल जाए। 1959 में राम नंदर बनाम यूपी सरकार के वाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आईपीसी की धारा-124 ए को ही गैर संवैधानिक घोषित कर दिया था।