लखनऊ, हिमालय क्षेत्र में बढ़ता रहन सहन वैश्विक तपन में वृद्धि का कारण बनता जा रहा है। वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन का कारण भी इसे बताया है। राजनीतिक इच्छा शक्ति और स्वयंसेवी संस्थानों के सहयोग से ही इस बदलाव को रोका जा सकता है। दिल्ली विवि के समाजशास्त्र विभाग के आचार्य डा.सोमेंद्र माेहन पटनायक बुधवार को बोल रहे थे। वह सोसाइटी फॉर हिमालयन इंवायरमेंट एंड पीपुल्स एक्शन और लखनऊ विवि के समाजशास्त्र विभाग की ओर से आयोजित ई-संगोष्ठी में बतौर मुख्य वक्ता बोल रहे थे।
नृजाति एवं लोक संस्कृति समाज के सहयोग से आयोजित दो दिवसीस ई संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे जी पटनायक ने हिमालय क्षेत्र में बढ़ती पर्यटन की गतिविधियों पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहाकि हिमालय के द्वारा ही भारतीय सभ्यता उत्पन्न हुई है। औद्योगीकरण, नगरीयकरण, उपभोगवाद व वृहद अधोसंरचना के निर्माण से पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। बाजारीकरण व पर्यटन के बढ़ने से हिमालय क्षेत्र का पारिस्थितिकीतंत्र बिगड़ गया है जिसे समय रहते रोकने की आवश्यकता है। प्रो.सुकांत चौधरी ने 2030 तक हिमालय क्षेत्र के तापमान को 1.5 तक सीमित रखने के लिए सभी को काम करना होगा।
दिल्ली विवि के भूगोलशास्त्री डा.बी डब्लू पांडेय ने कहाकि जलवायु परिवर्तन से वर्षा में कमी के साथ की बर्फबारी में भी कमी देख्री जा रही है। जवाहर लाल नेहरू विवि के डा.संजीव शर्मा ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का असर वहां के लोगों की जीवन शैली पर पड़ने लगा है। हैदराबाद स्थित केंद्रीय विवि के मानवशास्त्री प्रो.वेकटराव ने जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए सभी देशों को मिलकर पहल करने की वकालत की। दिल्ली के डा.एनके वेद ने भाषण के बजाय सक्रिय भागीदारी पर बल दिया। संगोष्ठी में भातखंडे संगीत महाविद्यालय की पूर्व कुलपति कुमकुमधर व सुकांत के चौधरी के अलावा कई वक्ताओं ने विचार व्यक्त किए।

