कैसे अर्थव्यवस्था के मामले में चीन को पछाड़ेगा भारत

भारत का पड़ोसी देश चीन हर मामले में स्वयं को ताकतवर दिखाता है। भारत लगातार अपने बल से चीन को टक्कर देता है। जनसंख्या के मामले में भारत चीन से आगे निकल चुका है लेकिन अर्थव्यवस्था के मामले में भारत चीन से अभी काफी पीछे है। अभी हाल ही में खबर आई की भारत जल्द ही अर्थव्यवस्था के मामले में दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश जर्मनी से आगे निकल जाएगा। लेकिन अब एक सवाल यह भी है कि क्या भारत अर्थव्यस्था के मामले में चीन से आगे निकल पाएगा और अगर भारत चीन को अर्थव्यवस्था के मामले में टक्कर देना चाहता है तो उसे क्या करना चाहिए। 

एक समय ऐसा भी था जब भारत और उसके पड़ोसी देश का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) लगभग एक जैसा ही था. साल 1990 में चीनी अर्थव्यवस्था भारत की तुलना में बहुत ज्यादा बड़ी नहीं थी, लेकिन चीन ने अपने विकास की गति ऐसी बढ़ाई की आज इस देश की जीडीपी भारत से 5 गुना ज्यादा है और चीन की प्रगति, निवेश और आर्थिक स्थिति को देखते हुए अमेरिका ने चीन से उसके विकासशील देश का दर्जा हटा दिया है.

मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस की एक रिपोर्ट आई है जिसमें कहा गया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार हाल ही में 3.5 ट्रिलियन डॉलर को पार कर गया है और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) को उम्मीद है कि इस साल यह 3.7 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो जाएगा.  आसान भाषा में समझें तो फिलहाल भारत की अर्थव्यवस्था साल 2007  के चीन की अर्थव्यवस्था जैसी ही है. हालांकि आंकड़ों के हिसाब से उस वक्त भी चीनी अर्थव्यवस्था तुलनात्मक रूप से भारत से बड़ी ही थी.  साल 2007 में चीन की प्रति व्यक्ति आय 2,694 डॉलर थी, जबकि आईएमएफ को उम्मीद है कि भारत की प्रति व्यक्ति आय 2022 में 2,379 डॉलर से बढ़कर 2023 में 2,601 डॉलर हो जाएगी.

भारत की अर्थव्यवस्था की रफ्तार चीन से धीमी क्यों –

आयात- निर्यात

दरअसल भारत और चीन के विकास का तरीका बिल्कुल अलग-अलग है. चीन के जीडीपी के ग्रोथ का सबसे बड़ा कारण यह है कि इस देश ने इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में काफी निवेश किया है. इसके साथ ही एक्सपोर्ट को बढ़ावा दिया गया है जिसके कारण अर्थव्यवस्था में काफी तेजी आई है. 

साल 2003 से 2011 के बीच चीन के कुल जीडीपी का 40 प्रतिशत सिर्फ निवेश के कारण आया था. साल 2012 से 2021 के बीच जैसे-जैसे चीनी अर्थव्यवस्था आगे बढ़ी, इसका निवेश अनुपात और भी ज्यादा बढ़ गया. जबकि भारत में हाई ग्रोथ फेज के दौरान भी निवेश अनुपात औसतन 33 प्रतिशत के आसपास ही रहा है. 

किसी भी देश में निवेश के बाद जीडीपी ग्रोथ का दूसरा सबसे बड़ा कारण निर्यात होता है. साल 2022-23 में, भारत में वस्तुओं और सेवाओं का निर्यात 770 बिलियन डॉलर से अधिक हुआ, जबकि आयात लगभग 890 बिलियन डॉलर था.  इसकी तुलना साल 2007 के चीनी अर्थव्यवस्था से करें तो उस साल चीन का निर्यात 1.2 ट्रिलियन डॉलर को पार कर गया था, जबकि आयात 950 बिलियन डॉलर रहा था. 

श्रम बल 

चीन के जीडीपी ग्रोथ का एक कारण श्रम बल भी है. भारत और चीन के पास दुनिया के कुल कार्य आबादी का 40 प्रतिशत से ज्यादा आबादी है. चीन ने साक्षरता स्तर को बढ़ाकर अपने मानव पूंजी को बेहतर बनाने पर काम किया है. ये देश बढ़ते श्रमिक वर्ग के लिए पर्याप्त रोजगार पैदा करने में सफल रहें, जो उच्च बचत निवेश और अधिक विकास में सहायता करते हैं. 

वहीं दूसरी तरफ भारत की बात करें तो भारत बुनियादी शिक्षा में पीछे है. साल 2007 में, इस चीन में श्रम शक्ति भागीदारी लगभग 73 प्रतिशत थी. लेकिन अब यह घटकर 67 प्रतिशत रह गया है. वहीं भारत में यह भागीदारी दर साल 2022 में लगभग 50 प्रतिशत होने का अनुमान है.

दोनों देशों में पुरुष श्रम तो बल लगभग समान है लेकिन चीन में महिला श्रम बल भागीदारी ज्यादा है. साल 2007 में चीन में महिला श्रम बल में 66 प्रतिशत थी जो कि साल 2022 तक घटकर 61 प्रतिशत हो गई. वही दूसरी तरफ भारत में साल 2007 में महिला श्रम बल केवल 30 प्रतिशत थी और 2022 में यह और भी गिरकर 24 प्रतिशत पर आ गई है. 

रोजगार 

रोजगार की कमी भारत के विकास में आज भी रास्ते का कांटा बना हुआ है. भारत में पिछले कुछ सालों में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में ज्यादा नौकरियां पैदा नहीं हुई है. हमारे देश में ज्यादातर नौकरियां निर्माण, व्यापार और परिवहन सेक्टर में पैदा होती है. लेकिन मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर इन क्षेत्रों की तुलना में बहुत अधिक उत्पादक है. यह परिवहन सेक्टर की तुलना में दोगुना उत्पादक है, व्यापार की तुलना में 2.5 गुना अधिक उत्पादक है, और आर्थिक सर्वेक्षण जारी किए गए अनुमान के अनुसार निर्माण की तुलना में 3.75 गुना अधिक उत्पादक है. 

विदेशी निवेश

एक तरफ जहां साल 2019 से लेकर साल 2021 तक, पिछले 2 साल के बीच भारत में विदेशी निवेश की हिस्सेदारी 3.4 प्रतिशत से कम होकर 2.8 प्रतिशत हो गई है. वहीं भारत के पड़ोसी देश चीन की बात करें तो साल 2019 से 21 के बीच इस देश का विदेशी निवेश 14.5 फ़ीसदी से बढ़कर 20.3 फीसदी हो गया है. भारत को विदेशी निवेश को बढ़ाने के लिए एफडीआई नीतियों और उदार निवेश व्यवस्थाओं पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है.

क्या भारत आने वाले डेढ़ दशक में अगला चीन हो सकता है?? 

बीबीसी की एक रिपोर्ट में प्रख्यात अमेरिकी अर्थशास्त्री स्टीव हैंके जॉन्स इस सवाल के जवाब में कहते हैं, ‘भारत जनसंख्या के मामले में तो चीन को पछाड़ चुका है लेकिन विकास के मामले में आज भी कहीं ज्यादा पीछे है. भारत समस्याओं से दबा हुआ देश है. वर्ल्ड बैंक के अनुसार साल 2021 में भारत और चीन की जीडीपी के बीच 9 साल का अंतर है. जहां भारत की जीडीपी 3.1 ट्रिलियन डॉलर थी तो वहीं चीन की 17.7 ट्रिलियन डॉलर की.

ऐसे में अगर चीनी अर्थव्यवस्था को रोक दिया जाए और भारत की अर्थव्यवस्था 7-7.50 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़े, तो आज की चीनी अर्थव्यवस्था को पार करने में भारत को लगभग 25 साल लग जाएंगे. न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार कुछ साल पहले ‘व्हार्टन’ के डीन जेफ्री से पूछा गया था कि भारत आर्थिक वृद्धि को गति देकर चीन की अर्थव्यवस्था को पीछे छोड़ सकता है या नहीं. इसके जवाब में उन्होंने कहा था, ‘हां ऐसा संभव है क्योंकि चीन इतिहास का ऐसा पहला देश बनेगा जो अमीर होने से पहले बूढ़ा हो जाएगा. अगले 10 सालों में इस देश की आबादी 1.5 बिलियन से कम होगी और धीरे-धीरे मध्य शताब्दी तक लगभग 1.3 बिलियन तक सीमित हो जाएगी.

वहीं 2050 तक 70 फीसदी आबादी ऐसी होगी जो काम करने वाले लोगों पर निर्भर रहेंगे. फिलहाल यह 35 फीसदी है. इससे चीन और वहां की स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ेगा.बीबीसी की एक रिपोर्ट में चीनी पत्रकार सन शी कहते हैं, “एक जैसा लोकतंत्र होने के कारण पश्चिमी देश ज्यादातर अंतरराष्ट्रीय मामलों में चीन से ज्यादा भारत को तरजीह देता है और अक्सर ही चीन को संतुलित करने के लिए भारत का इस्तेमाल करना चाहता है. 

चीन से छीना गया विकासशील देश का दर्जा

हाल ही में अमेरिकी सीनेट ने एक नए कानून को मंजूरी दी, जिसके अनुसार चीन को अब विकाशील देश का दर्जा नहीं दिया जा सकेगा. विकासशील देश का दर्जा वापस लिए जाने के बाद चीन को अब विश्व बैंक और अन्य वित्तीय संस्थानों से  आसानी से और कम ब्याज दर पर लोन नहीं मिल पाएगा. दरअसल विकासशील देश होने के कारण चीन को आसानी से सस्ता कर्ज मिलता था. लेकिन सस्ता कर्जा लेने के बाद चीन दुनिया के अन्य गरीब देशों को महंगे कर्ज देकर अपने कर्ज की जाल में फंसा लेता था.

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