राष्ट्रीयकांग्रेस में नई जिम्मेदारियां मुसीबत का संकेत तो नहीं!

कांग्रेस में नई जिम्मेदारियां मुसीबत का संकेत तो नहीं!

सियासत में राजनेताओं को नई जिम्मेदारियां अमूमन उत्साहित कर देती हैं मगर मध्य प्रदेश की कांग्रेस द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारियों ने नेताओं को नाराज कर दिया है। इसके चलते ऐसा लगने लगा है कहीं यह नई जिम्मेदारी का बंटवारा कांग्रेस के लिए मुसीबत न बन जाए। राज्य में इसी साल विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं और कांग्रेस जमीनी जमावट में जुटी हुई है। एक तरफ पूर्व मुख्यमंत्री और राज्य सभा सदस्य दिग्विजय सिंह राज्य की 230 में से ऐसी 66 सीटों का दौरा कर रहे हैं जहां कांग्रेस लंबे अरसे से हारती आ रही हैं। इसी क्रम में पार्टी ने 16 प्रमुख नेताओं को चुनाव अभियान के मद्देनजर अलग-अलग जिलों की जिम्मेदारी सौंपी है।

राज्य में कुल 53 जिले हैं और यह 16 नेताओं के जिम्मे किए गए हैं। कांग्रेस ने नेता प्रतिपक्ष गोविंद सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया, अरुण यादव, सुरेश पचौरी, पूर्व मंत्री अजय सिंह, जीतू पटवारी, तरुण भनोट, सज्जन सिंह वर्मा, बाला बच्चन, कमलेश्वर पटेल, जयवर्धन सिंह, रामनिवास रावत, के पी सिंह, लाखन सिंह यादव और पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन व फूल सिंह बरैया को दो से लेकर पांच जिलों तक की जिम्मेदारी सौंपी है।

जिलों की जिम्मेदारी सौंपी जाने के बाद से इन नेताओं में खुशी नहीं है बल्कि नाराजगी नजर आ रही है। कई नेताओं ने तो अपनी आपत्ति भी दर्ज करा दी है। यह बात अलग है कि कोई भी नेता खुलकर बोलने को तैयार नहीं हैं मगर उन्हें जिलों के बंटवारे में भी सियासी बू नजर आ रही है।

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि इसी साल लगभग छह महीने बाद विधानसभा चुनाव हैं और जिन नेताओं में जिलों का बंटवारा किया गया है और उन्हें जिस जिले की जिम्मेदारी सौंपी गई है, उनमें से कई नेता तो खुद विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी में जुटे हैं, वहीं संबंधित नेता का ज्यादा प्रभाव जिन क्षेत्रों में नहीं है वहां की उसे जिम्मेदारी दी गई है। पार्टी हित में तो यह होता कि जनाधार वाले जो नेता हैं उन्हें उनके प्रभाव वाले क्षेत्र की जिम्मेदारी सौंपी जाती, इससे पार्टी को ही लाभ होता।

कांग्रेस के गलियारे में तो इस बात को लेकर भी चर्चा है, क्या नेताओं के प्रभाव को कम करने के लिए उनके प्रभाव वाले क्षेत्र से दूर भेजा गया है या उनके चुनाव को प्रभावित करने के मकसद से। इसके लिए उदाहरण भी दिए जा रहे हैं कि चंबल के नेता को विंध्य भेजा गया है, विंध्य के नेता को चंबल, निमाड़ मालवा के नेता को बुंदेलखंड। आखिर ऐसा क्यों किया गया और ऐसा करने के पीछे मंशा क्या है यह कांग्रेस के नेताओं की भी समझ से परे है।

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