वैश्विक मंच पर भारत की विदेश नीति एक जटिल एवं गतिशील समीकरण का प्रतिनिधित्व करती है, जो देश के राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखने के साथ-साथ एक स्थिर और न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लगातार विकसित हो रही है। बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच, भारत ने रणनीतिक स्वायत्तता और बहु-संरेखण के सिद्धांतों को अपनाकर अपनी वैश्विक भूमिका को मजबूती से स्थापित किया है। भारत की विदेश नीति, ऐतिहासिक रूप से गुटनिरपेक्षता पर आधारित रही है, किंतु वर्तमान में यह अधिक व्यावहारिक और उद्देश्य-उन्मुख दृष्टिकोण अपना रही है, जहां भारत विभिन्न शक्तियों के साथ संबंधों को संतुलित करता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वर्तमान सिद्धांत
भारत की विदेश नीति की नींव गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) के सिद्धांतों पर आधारित है, जिसने शीत युद्ध के दौरान किसी भी महाशक्ति गुट में शामिल न होकर स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने पर जोर दिया। हालांकि, इक्कीसवीं सदी में, एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के उद्भव के साथ, भारत ने 'रणनीतिक स्वायत्तता' को अपने केंद्रीय सिद्धांत के रूप में बनाए रखा है। इसका अर्थ है कि भारत अपने हितों के आधार पर निर्णय लेता है, न कि किसी एक शक्ति के प्रभाव में। यह दृष्टिकोण भारत को संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, यूरोपीय संघ और उभरती शक्तियों जैसे विभिन्न प्रमुख वैश्विक खिलाड़ियों के साथ संबंध बनाए रखने की सुविधा प्रदान करता है। बदलते वैश्विक समीकरणों में भारत अपनी स्थिति को प्रभावी ढंग से प्रबंधित कर रहा है।
प्रमुख शक्तियों के साथ संबंध
भारत-अमेरिका संबंध रणनीतिक साझेदारी के रूप में उभरे हैं, जिसमें रक्षा सहयोग, व्यापार और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर ध्यान केंद्रित किया गया है। वहीं, रूस के साथ भारत के पारंपरिक संबंध अभी भी मजबूत हैं, विशेषकर रक्षा और ऊर्जा के क्षेत्र में। भारत-चीन संबंध एक जटिल चुनौती प्रस्तुत करते हैं, जहां आर्थिक जुड़ाव के बावजूद सीमा विवाद और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बनी हुई है। भारत ने चीन के साथ संतुलन बनाए रखने के लिए चतुर्भुज सुरक्षा वार्ता (QUAD) जैसे मंचों में सक्रिय भागीदारी की है, जो मुक्त और खुले इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है। भारतीय विदेश नीति के सिद्धांत इन संबंधों को ध्यान में रखते हुए बनाए गए हैं।
पड़ोसी देशों के साथ संबंध और क्षेत्रीय पहल
भारत की ‘पड़ोसी पहले’ की नीति उसके क्षेत्रीय स्थिरता और समृद्धि के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है। पाकिस्तान के साथ संबंध अभी भी तनावपूर्ण बने हुए हैं, जबकि बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और मालदीव जैसे अन्य पड़ोसी देशों के साथ सहयोग और कनेक्टिविटी को बढ़ावा दिया जा रहा है। सार्क (SAARC) के निष्क्रिय होने के बावजूद, भारत बिम्सटेक (BIMSTEC) और आईओआरए (IORA) जैसे क्षेत्रीय मंचों के माध्यम से सहयोग को सुदृढ़ कर रहा है, जो हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा और आर्थिक एकीकरण के लिए महत्वपूर्ण हैं। भारत की वैश्विक भूमिका इसके पड़ोसी संबंधों से भी निर्धारित होती है।
बहुपक्षीय मंचों पर भारत की भूमिका
संयुक्त राष्ट्र, जी20 (G20), ब्रिक्स (BRICS), और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे बहुपक्षीय मंचों पर भारत की सक्रिय भागीदारी वैश्विक शासन में उसकी बढ़ती आकांक्षाओं को दर्शाती है। भारत वैश्विक मुद्दों जैसे जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, महामारी प्रतिक्रिया और आर्थिक अस्थिरता के समाधान में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। विशेष रूप से जी20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने 'एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य' के मंत्र के साथ वैश्विक सहयोग को बढ़ावा दिया, जिससे बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में भारत की स्थिति और मजबूत हुई।
निष्कर्ष
भारत की विदेश नीति आज एक परिपक्व और बहुआयामी दृष्टिकोण को दर्शाती है, जो बदलती वैश्विक गतिशीलता के अनुरूप ढल रही है। रणनीतिक स्वायत्तता, बहु-संरेखण और ‘पड़ोसी पहले’ के सिद्धांतों पर आधारित यह नीति भारत के राष्ट्रीय हितों को साधने और एक अधिक न्यायपूर्ण व संतुलित विश्व व्यवस्था में योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध है। जैसे-जैसे वैश्विक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं, भारत की कूटनीति भविष्य की चुनौतियों का सामना करने और अवसरों का लाभ उठाने के लिए सुसज्जित है, जिससे अंतरराष्ट्रीय संबंधों में उसकी एक अद्वितीय पहचान बनी रहेगी।