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टीचर से प्रिंसिपल बनी मुस्लिम महिला 21 साल तक SC बन कर नौकरी की, अब ऐसे खुल गयी पोल !

मुस्लिम महिला मुन्नी रानी अनुसूचित जाति का बनकर नौकरी कर रही और प्रधानाचार्य के पद पर प्रोन्नति (प्रमोशन) पा चुकी बर्खास्तगी को न्यायालय ने सही करार दिया. न्यायालय ने कहा कि उसके द्वारा की गई धोखाधड़ी से उसकी नियुक्ति ही निरस्त हो जाती है। उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के हरदोई (Hardoi) में एक मुस्लिम महिला अनुसूचित जाति (एससी) बनकर फर्जी प्रमाण-पत्र के जरिये शिक्षा विभाग में 21 साल तक नौकरी करती रही.
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 टीचर से प्रिंसिपल बनी मुस्लिम महिला 21 साल तक SC बन कर नौकरी की, अब ऐसे खुल गयी पोल !

हरदोई:  इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने 21 साल से अधिक समय से अनुसूचित जाति का बनकर नौकरी कर रही और प्रधानाचार्य के पद पर प्रोन्नति (प्रमोशन) पा चुकी मुस्लिम महिला मुन्नी रानी के बर्खास्तगी को सही करार दिया. न्यायालय ने कहा कि उसके द्वारा की गई धोखाधड़ी से उसकी नियुक्ति ही निरस्त हो जाती है। यह आदेश न्यायमूर्ति दिनेश कुमार सिंह की एकल पीठ ने मुन्नी रानी की याचिका को खारिज करते हुए पारित किया.उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के हरदोई (Hardoi) में एक मुस्लिम महिला अनुसूचित जाति (एससी) बनकर फर्जी प्रमाण-पत्र के जरिये शिक्षा विभाग में 21 साल तक नौकरी करती रही.

मामले की शिकायत पर जब जांच की गई और मामला सही पाया गया तो शिक्षिका की बर्खास्तगी हो गई, जिसके बाद उसने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, वहां भी उसे झटका ही लगा और कोर्ट ने उसे फर्जी माना और पूर्व के आदेश को सही ठहराया. याचिका में हरदोई के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी के 2 जुलाई 2021 के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसके द्वारा याची की सहायक अध्यापिका के पद पर नियुक्ति को निरस्त करते हुए उसकी सेवाओं को समाप्त कर दिया गया था. मामले की सुनवाई करते हुए 30 नवंबर को न्यायालय ने याची के सर्विस रिकॉर्ड को तलब किया.

न्यायालय ने पाया कि याची को 30 नवम्बर 1999 को सहायक अध्यापिका के पद पर नियुक्ति मिली थी. याची ने खुद को अनुसूचित जाति से सम्बंधित बताते हुए एक जाति प्रमाण पत्र भी लगाया था. वर्ष 2004 में उसे प्रधानाचार्य के पद पर प्रोन्नति भी मिल गई. राजीव खरे नाम के एक व्यक्ति ने जिलाधिकारी को शिकायत भेज कर बताया कि याची वास्तव में मुस्लिम समुदाय से है और उसके सर्विस बुक में भी उसका मजहब इस्लाम लिखा हुआ है. मामले की जांच शुरू हुई,

जिसमें पाया गया कि जाति प्रमाण पत्र 5 नवम्बर 1995 को लखनऊ सदरर के तहसीलदार द्वारा जारी किया गया है. वहीं याची के आवेदन पत्र में उसकी जाति ‘अंसारी’ लिखी हुई पाई गई. बावजूद इसके फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर याची ने नौकरी प्राप्त कर ली. न्यायालय ने कहा कि याची ने धोखाधड़ी व कूटरचना करते हुए उक्त नियुक्ति हासिल की थी. लिहाजा उसकी नियुक्ति ही अवैध थी. बीएसए बीपी सिंह ने बताया कि मामले में कार्यवाई की जा रही है.

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