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महान स्वतंत्रता सेनानी श्यामलाल गुप्त पार्षद जिनका स्मारक व घर आज भी जर्जर अवस्था में है 

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आज भी जर्जर हालत में है आजाद भारत के प्रथम राष्ट्रकवि का घर व स्मारक 

आज़ादी के दीवाने 16 साल के युवा के अंदर अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ आक्रोश इस कदर पनप रहा था कि उसने नरवल में सरे बाज़ार युद्ध के लिए लिया जाने वाले कर का विरोध किया. यह वह दौर था जब लोग अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ मुंह खोलने तक से डरते थे. इस दौरान प्रथम विश्व युद्ध अपने चरम पर था और युद्ध के साजों सामान की आपूर्ति के लिए लोगों से जबरन टैक्स वसूला जाता था. श्याम लाल गुप्त के शिष्य आर के बाजपेई बताते हैं कि अंग्रेज़ी हुकूमत का विरोध करने पर पार्षद जी को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें कई यातनाएं दी गई. लेकिन, यह उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ. सज़ा काटने के बाद जब वह वापस आए तो कहानीकार भगवती प्रसाद ने उनकी मुलाक़ात प्रताप अख़बार के संपादक प. गणेश शंकर विद्यार्थी से कराई. जिसका उनके जीवन पर काफ़ी गहरा असर पड़ा. गणेश शंकर विद्यार्थी के साथ मिलकर ही उन्होंने अपने अंदर आज़ादी के लिए उठ रही चिंगारी को ज्वालामुखी का रूप दिया. आर के बाजपेई बताते हैं कि पार्षद जी बहुत ही सादा जीवन व्यतीत करने में विश्वास रखते थे. उन्होंने अपने पैरों में कभी जूते नहीं पहने. वह नंगे पांव ही सभी जगह की यात्रा करते थे.

आज़ादी के उन्ही दीवाने महान स्वतंत्रता सेनानी और झंडा गीत को लिखने वाले पद्मश्री श्यामलाल गुप्त पार्षद जी की आज 125 वीं जयंती है. आज़ाद भारत के पहले राष्ट्र कवि के जन्मोत्सव पर शहर में कोई  बड़ा जलसा या समारोह होता तो नज़र नही आ रहा है. हां इतना जरूर है कि लोक सेवक मंडल और पार्षद स्मृति संस्थान मिल कर एक गोष्ठी आयोजित कर रहे है. यह संस्था हर साल शहर में उनके जन्मदिन पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन करती आ रही है, ताकि आने वाली पीढ़ी उनको याद रखे. इसके अलावा उनके फूलबाग में स्थित उनका स्मारक व जनरलगंज स्थित उनका घर जर्जर स्तिथि में हैं.

आर के बाजपेई ने बताया कि 1920 में कांग्रेस अधिवेशन में तिरंगे झंडे (जिसमें चक्र की जगह चरखा था) को राष्ट्रीय ध्वज या हिंदुस्तानियों के झंडे रूप में सर्वसम्मति से मान्यता दी गई थी. इसके बाद 13 अप्रैल 1924 में कानपुर में होने वाले अधिवेशन में तिरंगे की शान में एक गीत गाया जाना था. जिसे लिखने की ज़िम्मेदारी महात्मा गांधी ने प. गणेश शंकर विद्यार्थी को दी थी. उन्होंने पार्षद जी के अलावा कई अन्य लोगों से भी इस बारे में लिखने को कहा. लेकिन, सिर्फ़ पार्षद जी ने ही मात्र तीन रातों में जागकर तिरंगे की शान में दो गीत लिखकर तैयार कर दिए. चूंकि गांधी जी चाहते थे कि झंडा गीत लोक भाषा व संगीत में हो. इसलिए उन्होंने झंडा ऊंचा रहे हमारा विजयी विश्व तिरंगा प्यारा को पूरे शान के साथ कानपुर अधिवेशन में गाया. उनके साथ पंडित जवाहार लाल नेहरू व आज़ादी के हर एक दीवाने की ज़ुबान पर यह गीत आ गाया था. आरके बाजपेई कहते हैं कि वास्तव में हमारा असल राष्ट्रगान यही है. इसे ही पहली बार तिरंगे की आन बान शान के लिए गाया गया था.

आर के बाजपेई ने बताया कि श्याम लाल जी बचपन से ही काव्य की ओर रुझान रखते थे. राम चरित मानस पढ़ने के बाद भगवान राम के प्रति उनका विशेष झुकाव हो गया था. उन्होंने 13 साल की उम्र में बाल कांड के सभी दोहे शास्त्रीय छंद में लिख डाले थे. हालांकि यह देख उनके पिता काफ़ी परेशान हो गए थे और उनकी लिखी किताब को कुएं में फेंक दिया था. जिससे रूष्ट होकर वह भगवान राम की शरण में अयोध्या चले गए थे. उन्होंने बताया कि उन्हें कविताएं लिखने का काफ़ी शौक़ था. उनकी कविताएं प्रताप अख़बार में राम श्याम किनकर के नाम से प्रकाशित होती थीं.

आज़ादी के मतवाले कभी गुमनाम हो जाएंगे उनका नाम लेने वाले चंद लोग ही रह जाएंगे. यह लाइनें आज लगभग सच साबित हो रही है. आज पार्षद जी ने परिवार में उनके इकलौते प्रपौत्र ही बचे हैं. वह जनरलगंज स्थित उसी मकान में रहते है, जहां पद्मश्री श्यामलाल गुप्त जी ने अंतिम सांस ली थी. लगभग सौ साल पुराना मकान जर्जर हो चुका है और गिरने की कगार पर है. किसी तरह से दो नये पिलर के सहारे उसे गिरने से बचाया गया है. लेकिन, बरसात के मौसम में परिजन की  सांसें थमी रहती है.

पार्षद जी प्रपौत्र संजय गुप्त गंगादीन गौरीशंकर इंटर स्कूल में चपरासी पद पर कार्यरत हैं. उनके दो बच्चे है.  वह किसी तरह परिवार के लिए दो वक़्त की रोटी जुटा पा रहे हैं. उनका कहना है यदि यह घर गिर गया तो वह परिवार सहित खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हो जाएंगे. पार्षद जी की पुत्र वधू का कहना है कि इतनी महंगाई में दो बच्चों को पालने में बहुत मुश्किल हो रही है. तमाम सरकारें आई और गईं, लेकिन किसी ने भी हमारी सुध नही ली.

पार्षद जी ने स्वतंत्रता की लड़ाई के समय व्रत लिया था कि वह देश के आज़ाद होने के बाद ही पांव में चप्पल या जूते पहनेंगे. इस व्रत को उन्होंने देश के आज़ाद होने बाद यह कह कर निभाया की बापू सिर्फ धोती में ज़िंदगी काट सकते है तो हम नंगे पैर क्यो नही. उनका मानना था इस पैसे से देश और समाज का विकास होना चाहिये. इसके लिये सभी को अपनी जरूरतें कम करनी चाहिये. यही व्रत उनकी मौत कारण भी बना. संजय ने बताया कि नंगे पैर होने में लगी चोट इतनी बढ़ गयी कि उसी से उनकी मौत हो गई थी.

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