नई संसद का उद्घाटन और सावरकर कनेक्शन

admin
By admin
4 Min Read

देश- 28 मई को प्रधानमंत्री नई संसद भवन का उद्घाटन करेंगे। इसको लेकर विपक्ष हंगामा कर रहा है और कई लोग उद्घाटन की कड़ी को सावरकर से जोड़ रहे हैं और जोड़े भी क्यों न इस दिन वीर सावरकर की 140वीं जयंती है और भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का इस दिन अंतिम संस्कार किया गया था। 

सावरकर को लेकर जिस तरह के विवाद रहे हैं उनके चलते इस बात की कड़ी आलोचना की जा रही है कि केंद्र सरकार ने उनके जन्मदिवस को नई संसद का उद्घाटन करने के लिए चुना.

सावरकर की आलोचना उन माफ़ीनामों के लिए तो की ही जाती है जो उन्होंने अंडमान की सेल्यूलर जेल में बतौर क़ैदी, ब्रितानी सरकार को लिखे लेकिन साथ-साथ बहुत से इतिहासकार और लेखकों का मानना है कि महात्मा गाँधी की हत्या की साज़िश में सावरकर की भूमिका को लेकर लगा सवालिया निशान कभी भी पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुआ.

नए संसद भवन के उद्घाटन की ख़बर आने के बाद महात्मा गाँधी के प्रपौत्र तुषार गाँधी ने ट्वीट कर कहा, “प्रधानमंत्री 28 मई को वीडी सावरकर की जयंती पर नए संसद भवन का उद्घाटन करेंगे. उन्हें भवन का नाम ‘सावरकर सदन’ और सेंट्रल हॉल का नाम ‘माफ़ी कक्ष’ रखना चाहिए.” कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस उद्घाटन को “हमारे सभी संस्थापक पिताओं और माताओं का पूर्ण अपमान” बताया है. साथ ही ये भी कहा कि ये गांधी, नेहरू, पटेल, बोस, और आंबेडकर जैसे नेताओं को पूरी तरह नकारना है.

सावरकर से जुड़े विवादों के बारे में तुषार गाँधी कहते हैं कि सावरकर के इतने सारे पहलू हैं कि जिसे जो भी पहलू पसंद आए उसके आधार पर उनकी भक्ति या तिरस्कार कर सकता है.

वे कहते हैं, “ये मानना होगा कि सावरकर ने शुरुआत में क्रांतिकारी स्वरुप लिया था जब इंग्लैंड में रहते हुए भारत में क्रांति को उन्होंने प्रोत्साहन दिया. क्रांतिकारी की जो व्याख्या है उसके मुताबिक सावरकर को ज़्यादा से ज़्यादा क्रांतिकारियों का समर्थक कहा जा सकता है. उन्हें क्रांतिकारी तो कहा नहीं जा सकता.”

सावरकर की एक बड़ी आलोचना कालापानी जेल में रहते हुए ब्रितानी सरकार को लिखे उनके माफ़ीनामों को लेकर होती है.

तुषार गाँधी कहते हैं, “कालापानी में जितने भी क़ैदी गए थे उन सब के ऊपर वैसी ही बर्बरता से बर्ताव हुआ. सावरकर उन चंद लोगों में से थे जिन्होंने अंग्रेज़ों से माफ़ी मांगी. बहुत सारे ऐसे क्रन्तिकारी और सत्याग्रही थे जिन्होंने हँसते-हँसते अपनी पूरी कालापानी की सज़ा काटी और अगर स्वतंत्रता के बाद अगर जीवित रहे तो छूट के वापस आए. सावरकर को वीर कहना उन सबका अपमान होगा.”

सावरकर के समर्थकों और प्रशंसकों का कहना है कि माफ़ी मांगना उनकी रणनीति थी ताकि वो छूट के आएं और फिर अंग्रेज़ों से लड़ें. तुषार गाँधी के मुताबिक ये सब बाद में सोचे गए विचार हैं.

वे कहते हैं, “अगर ये मान भी लिया जाए कि वो उनकी रणनीति थी तो छूट के आने के बाद भी उन्होंने स्वतंत्र संग्राम में क्या योगदान दिया? एक भी प्रमाण मिलता नहीं है. उल्टा ये दिखता है कि छूट के आने के बाद उन्होंने कांग्रेस ने जितने भी सत्याग्रह किए, उन सारे सत्याग्रहों को कैसे नाकाम किया जाए उसके ही बारे में अंग्रेज़ों के साथ काम किया. तो माफ़ीनामों को रणनीति कहना एक बचकाना बहाना है.”

ए सूर्य प्रकाश प्रसार भारती के अध्यक्ष रह चुके हैं. वे कहते हैं कि जहां तक सावरकर के लिखे माफ़ीनामों की बात है, तो अगर महात्मा गाँधी और कांग्रेस के कई अन्य नेताओं की लिखी याचिकाओं पर नज़र डाली जाए तो उनमें और सावरकर की याचिकाओं में कोई फ़र्क़ नहीं दिखेगा.

source-bbc

Share This Article
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *