जब मन कही नहीं लगता तब मैं खुद के साथ होती हूं।

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जब मन कही नहीं लगता 
तब मैं खुद के साथ होती हूं। 
कई किस्से याद आते हैं
कई पुरानी यादें झझकोरती हैं
कलम आहिस्ता चलती है 
बिना सोचे समझे लिखती है
जो जीवन मे हस्तक्षेप नहीं बर्दाश्त होते  
उनका परित्याग करती है
कुछ शब्दों का जाल बुनती हूँ 
शब्दों को कई रंग देती है
विचार भावन सब एक साथ होते हैं
बंधता है जीवन का एक एक तार शब्दों में
विस्तृत माया से मुक्ति मिलती है
मोह नहीं रहता किसी भी चीज का
मन शान्त होता है शफ्फाक पानी की भांति
संसार का कोई दुख मुझे सुख से कम नहीं लगता
परंपरा कर्तव्य सब की पोटली एक कोने में रखी होती है
और मैं एकांत में सुख के साथ होती हूँ
क्योंकि जब मन कही नहीं लगता 
तब मैं खुद के साथ होती हूं।।
Priyanshi

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