पीएम ने 100 लाख करोड़ रुपये गतिशक्ति – राष्ट्रीय मास्टर प्लान को लॉन्च किया

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भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के विभिन्न पहलुओं को एक आम रास्ते पर लाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को पीएम गतिशक्ति- राष्ट्रीय मास्टर प्लान (PM GatiShakti- National Master Plan) को लॉन्च किया। 100 लाख करोड़ रुपये के इस पीएम गति शक्ति नेशनल मास्टर प्लान का मकसद मौजूदा और भविष्य के इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में तेजी लाना और उनकी लागत कम करना है।

प्रधानमंत्री मोदी की भाषा में ही कहें तो अब देश में कोई भी इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट न अटकेगा, न लटकेगा और ना ही भटकेगा यानि अब ऐसा नहीं होगा कि एक एजेंसी सड़क बनाए तो दूसरी केबल या पाईप बिछाने के लिए बनी बनाई सड़क को फिर से खोद कर चली जाए। सरकार के अलग अलग मंत्रालयों, विभागों और एजेंसियों में तालमेल नहीं होने की वजह से ऐसे उदाहरण अक्सर देखने को मिलते हैं।

इसी कार्यशैली में आमूल-चूल बदलाव के लिए सरकार ने एक राष्ट्रीय मास्टर प्लान तैयार किया है। करीब दो महीने पहले 75वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लालकिले के प्राचीर से खुद प्रधानमंत्री ने ही गति शक्ति प्रोजेक्ट का ऐलान किया था।

गति शक्ति प्रोजेक्ट के तहत अब महत्वपूर्ण इन्फ्रा डेवलपमेंट का काम कॉमन टेंडरिंग के ज़रिए होगा। जैसे ग्रीनफील्ड रोड, रेल, ऑप्टिकल फाईबर, गैस पाईपलाईन, इलेक्ट्रिफिकेशन के लिए एक ही टेंडर जारी किया जाएगा ताकि केंद्र और राज्यों की अलग अगल एजेंसियां और लोकल अथॉरिटी के साथ साथ प्राईवेट सेक्टर बेहतर तालमेल के साथ काम को अंजाम दे सके।

इसके लिए रेलवे, सड़क राजमार्ग, पेट्रोलियम, टेलीकॉम, एविएशन और इंडस्ट्रियल पार्क बनाने वाले विभागों समेत 16 मंत्रालयों का एक ग्रुप बनाया गया है। इन मंत्रालयों में जो भी प्रोजेक्ट्स अभी चल रहे हैं या साल 2024-25 तक पूरे होने हैं उन्हें गति शक्ति के तहत ही पूरा किया जाएगा। राज्यों  के पास भी इस कॉमन टेंडरिंग का हिस्सा बनने का विकल्प मौजूद रहेगा। सिंगल नोडल एजेंसी DPIIT पूरे प्रोजेक्ट की निगरानी करेगी।

प्रधानमंत्री मोदी जब पहली बार 2014 में जीतकर केंद्र की सत्ता में आए थे तभी उन्होंने इस प्रोजेक्ट की नींव रखी थी और एक ग्रुप ऑफ मिनिस्टर का गठन किया था। इसके पीछे कारोबार और जीवन को आसान बनाने यानि ईज़ ऑफ डूइंड के साथ साथ ईज़ ऑफ लिविंग की सोच है। मकसद है- प्रोजेक्ट्स सही समय पर पूरे हो, लागत कम रहे, व्यापार बढ़े और निवेशक भरोसा मिले कि मंजूरी नहीं मिलने की वजह से पूंजी डूबेगी नहीं। सरकार को उम्मीद है कि कॉमन टेंडरिंग प्रोसेस एक गेम चेंजर साबित होगा।

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