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Home » Blog » शराब बेचने की ये बेचैनी क्यों ?, इस गणित में छिपा है राज
राष्ट्रीय

शराब बेचने की ये बेचैनी क्यों ?, इस गणित में छिपा है राज

admin
Last updated: April 17, 2026 2:32 pm
admin
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नई दिल्ली ।  कोरोना वायरस से जंग में लॉकडाउन का पहला चरण और दूसरा चरण खत्म हो चुका है। आज से लॉकडाउन का तीसरा चरण (Lockdown 3.0) शुरू हो चुका है और इसमें सबसे अहम हैं शराब की दुकानें, जिसका इंजतार न सिर्फ शराब पीने और बेचने वालों को था, बल्कि राज्य सरकारें भी इसके लिए तरस रही थीं। लॉकडाउन शुरू होने के कुछ दिन बाद से ही राज्य सरकारों ने केंद्र को इस बावत पत्र लिखने शुरू कर दिए थे कि शराब की दुकानें खोल (Liquor shops Open in lockdown) दी जाएं। राज्य तो यहां तक तैयार थे कि शराब की होम डिलीवरी भी कर दी जाएगी। अब सवाल ये है कि ये बेचैनी क्यों? तो इसका जवाब छुपा है शराब से होने वाली कमाई (Revenue from liquor) के गणित में, जिसे देखने के बाद भले ही आप शराब पीते हों या उससे नफरत करते हों, लेकिन मानेंगे कि शराब की दुकानें अर्थव्यवस्था की रफ्तार के लिए जरूरी हैं।

पहले लॉकडाउन और लॉकडाउन 2.0 के दौरान सब कुछ बंद रहा। इस दौरान शराब की बिक्री भी बंद थी, जिसकी वजह से रोजाना 700 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। आज से लॉकडाउन 3.0 में शराब की दुकानें खुल रही हैं, जिससे एक बार फिर ये आय शुरू हो सकेगी।

अधिकतर राज्यों की 15-30 फीसदी आय शराब से ही होती है। सिर्फ महाराष्ट्र की बात करें तो शराब की वजह से एक्साइज ड्यूटी और अन्य टैक्सों की वजह से उसे एक महीने में करीब 2000 करोड़ रुपये का नुकसान होगा। सिर्फ शराब से ही राज्यों को हर साल (2019 के अनुसार) करीब 2.48 लाख करोड़ रुपए की कमाई होती है। 2018 में भी 2.17 लाख करोड़ रुपए और 2017 में 1.99 लाख करोड़ रुपए की कमाई हुई थी।

2019-20 में महाराष्ट्र को 24 हजार करोड़ रुपये, यूपी को 26 हजार करोड़ रुपये, तेलंगाना को 21,500 करोड़ रुपये, कर्नाटक को 20 हजार करोड़ रुपये, पश्चिम बंगाल को 11,874 करोड़ रुपये, राजस्थान को 7,800 करोड़ रुपये और पंजाब को 5,600 करोड़ रुपये की कमाई हुई थी। ये तो सिर्फ कुछ बड़े राज्य हैं, जहां पर शराब से भारी कमाई होती है।

शराब अभी जीएसटी के दायरे से बाहर है, जिससे राज्यों की तगड़ी कमाई होती है। ऐसे में राज्य अपने हिसाब से इसकी कीमत तय कर सकते हैं। अगर तमाम चीजें से कमाई कम हो जाए, तो राज्य शराब पर टैक्स और बढ़ाकर अपनी आय को आसानी से मैनेज कर लेते हैं। वैसे भी, शराब पीने वाले महंगी और सस्ती शराब नहीं देखते, उन्हें अगर शराब चाहिए तो हर कीमत पर चाहिए। हाल ही में राजस्थान ने शराब और बीयर पर 10 फीसदी टैक्स बढ़ाया था। तमाम चीजों पर जीएसटी घटने से राज्य सरकारों की कमाई पर भी असर पड़ा, लेकिन शराब हर नुकसान की भरपाई करने का जरिया बन गई है।

शराब की दुकानें खोले जाने से बहुत से लोग नाक-मुंह सिकोड़ते दिख जाएंगे। तर्क ये भी होंगे कि मंदिर-मस्जिद को छोड़कर शराब जैसी सामाजिक बुराई को तरजीह दी जा रही है। दरअसल, ये शराब ही है जो तमाम बुराइयों के बावजूद अर्थव्यवस्था को संभालने में सबसे अहम किरदार निभाती है। मंदी के दौरान भी शराब की बिक्री कम नहीं होती, क्योंकि लोग भरपेट खा भले ना पाएं, लेकिन शराब पीते हैं।

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