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उपेन्द्र कुशवाहा
कुशीनगर। आज चार दिन बीत जाने के बाद भी गाय बरामदगी और उसके सुपुर्दगी का मामला पुलिस,नेता और पत्रकार किसी का भी पीछा नही छोड़ रहा है। सोसल मीडिया पर तरह तरह के वीडियो और मैसेज के वायरल होने के बाद कुछ लोग पुलिस के पक्ष में भी उतरते दिख रहे है। ऐसे में मामले का हाई प्रोफाइल होना लाजमी है।
पुलिस क्षेत्राधिकारी तमकुहीराज, बहादुरपुर चौकी की पुलिस ने ग्रामीणों के सहयोग से छः ट्रकों से 250 गौवंश सहित 11 तस्करों को गिरफ्तार कर हलचल मचा दी। दो दिन तक थाने में उपजिलाधिकारी तमकुहीराज ए आर फारूकी, सीओ फूलचंद ने लाटरी के जरिये सुपुर्दगी का फरमान जारी हुआ। ग्रामीणों के अनुसार लाटरी शुरू होने के पूर्व पुलिस ने लगभग सौ गायों का वितरण कर दिया। जिसमें सत्ताधारी दल के नेता और पुलिस के नजदीकी पत्रकारों सहित पुलिस के खास लोगों के नाम की चर्चा हो रही है।
सोसल मीडिया पर वायरल हो रहें वीडियो में गाय पाने के लिए नेता सांसद और मंत्री तक बात करने की बात उपजिलाधिकारी के सामने कह सबकों हैरत में डाल रहें। तो कुछ नेतागण पसंद का गाय लेने के लिए हजारों के भीड़ में आसमान ही सर पर उठाते नजर आ रहें।
दूसरी ओर वे ग्रामीण भी पुलिस के कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए बड़ा आरोप लगा रहें जो पुलिस के साथ इन गायों को बरामद करने और तस्करों को गिरफ्तार करने में अपने जान पर खेल गये थे। इन ग्रामीणों का कहना है कि जिन भी ग्रामीणों ने पुलिस का साथ दिया, उन्हें सुपुर्दगी में एक भी गाय नहीं मिली, वहीं पुलिस के नजदीक रहने वाले संदिग्ध लोग गाय पा गये। ऐसे में अब भविष्य में कुछ भी हो तो हम अपना जान क्यों जोखिम में डालेंगे। ग्रामीणों का सवाल भी जायज है, और यह सत्य है तो पुलिस पर सवाल उठना लाजमी भी।
250/223 की क्यों हो रही चर्चा
जानकार बताते है कि बरामद गौवंशों की संख्या 250 थी, जबकि पुलिस अपने लिखापढ़ी में 223 गौवंश का बरामद होने ही बता रही थी। ऐसे में 27 गायों का अचानक कम होना चर्चा में था ही, कि लगभग 40 से 50 अच्छी गायों को थाने के एक कोने में स्थित थाना प्रभारी के आवास के सामने बांधने और उनके सुरक्षा के लिए चौकीदारों की डियूटी लगाना भी कम चर्चा में नहीं है।
साहब ने लिया सोसल मीडिया का सहारा
अखबारों के पन्नों से लेकर सोसल मीडिया पर एक के बाद एक वीडियो वायरल होने के बाद तरयासुजान के थाना प्रभारी के पक्ष में गौवंश सुपुर्दगी में हुए खेल के लिए थाने के सिपाही, मुंसी को दोषी बता रहें, सवाल यहां भी उठ रहा कि जिस सुपुर्दगी को स्वयं थाना प्रभारी उपजिलाधिकारी और सीओ के मौजूदगी में देख रहे थे, उसमें सिपाही और मुंसी दोषी कैसे हो गये। यानी खेल पर खेल, छोटे कर्मचारियों की बलि भले चढ़ जाय। लेकिन अपनी कुर्सी और साख बनी रहनी चाहिए।
और जब नाराज हुए चौकी प्रभारी
एक ओर सुपुर्दगी में सिपाही और मुंसी को बदनाम किया जा रहा, जबकि इतनी बड़ी बरामदगी में अहम भूमिका निभाने वाले चौकी प्रभारी बहादुरपुर को चौकी पुलिस के सहयोग एवं बरामदगी में अपनी जान जोखिम में डालने वाले एक व्यक्ति को एक सुपुर्दगी में एक गाय दिलाने के लिए नाराजगी व्यक्त करना पड़ा था। यानी सब मिलाकर साहब का इंकलाब ही रहा।
सुपुर्दगी में दिए गौवंशों का सत्यापन जरूरी क्यों
जानकार बताते है कि दुपुर्दगी में दिए गये अधिकतर गायें मौके से नदारत है। यानी खेल में खेल, ऐसे में उसका सत्यापन आवश्यक है, ताकि पुलिस पर उठ रहें सवालों का जवाब मिल सकें।