Home प्रदेश आम आदमी पार्टी ने मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग की

आम आदमी पार्टी ने मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग की

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देहरादून। आम आदमी पार्टी (आप) के प्रदेश प्रवक्ता रविंद्र आनंद ने कहा कि उत्तराखंड सरकार ब्लैकलिस्टेड कंपनियों पर मेहरबानी दिखा रही है। राज्य औद्योगिक विकास निगम लिमिटेड (सिडकुल) की ओर से उत्तर प्रदेश की ब्लैकलिस्टेड एजेंसियों को काम देने से एक बार फिर सरकार और अधिकारियों के बीच का गतिरोध सामने आया है। इससे यह भी साफ है कि मुख्यमंत्री अफसरशाही पर लगाम लगाने में नाकाम साबित हो रहे हैं, जिसका खामियाजा आमजन को भुगतना पड़ रहा है। उन्होंने मुख्यमंत्री से इस्तीफे की मांग की है।

रविंद्र सिंह आनंद ने कहा कि एक विभाग स्थानीय ठेकेदारों और एजेंसियों को दरकिनार करके उत्तरप्रदेश की ब्लैकलिस्टेड निर्माण एजेंसियों को काम दे रहा है, यह स्थानीय एजेंसियों के साथ धोखा है। पहले भी कई बार ऐसे मामले सामने आए हैं। उन्होंने कहा कि यहां पर सवाल यह उठता है कि क्यों सरकार की ओर से इस पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाने के लिए कोई रणनीति नहीं बनाई जाती। एक तरफ सरकार जीरो टॉलरेंस की बात करती है, वहीं दूसरी ओर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने का काम कर रही है। पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष अमित जोशी ने प्रदेश सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि राज्य का आपदा प्रबंधन विभाग खुद अपने रेस्क्यू के इंतजार में है। गंगोत्री ग्लेशियर पर उच्च न्यायालय की टिप्पणी से ऐसा ही प्रतीत हो रहा है। अगर सरकार ने इसी तरह से आंखे बंद रखी तो उत्तराखंड को केदारनाथ जैसी ही आपदा का सामना करना पड़ सकता है।

अमित जोशी ने कहा कि उच्च न्यायालय ने गंगोत्री ग्लेशियर में कूड़े से बन रही झील को लेकर एक जनहित याचिका में आपदा सचिव को कोर्ट की अवमानना करने व पद और सरकारी नौकरी के अयोग्य बताया है। कोर्ट की इस टिप्पणी से प्रदेश के आपदा प्रबंधन का हाल साफ नजर आ रहा है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री और विधायक, मंत्रियों के बीच समन्वय की कमी तो जनता पहले कई बार देख चुकी है, लेकिन अब अधिकारियों और सरकार के बीच समन्वय भी जनता देख रही है। उन्होंने नमामि गंगा परियोजना के नाम पर तंज कसते हुए कहा कि इस परियोजना पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाये जा रहे हैं, लेकिन जिस गंगा के लिए केंद्र व राज्य सरकार बार-बार अपनी पीठ थपथपा रही हैं, आज उसी मां गंगा के उद्गम स्थल गंगोत्री ग्लेशियर को लेकर लापरवाही पर कोर्ट को टिप्पणी करनी पड़ रही है।