कांग्रेस शाषित राज्यों में होंगे जमानत के उदार कानून, क्या राजद्रोह के मामले में भी मिलेगी ढिलाई

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डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार को जमानत को सरल बनाने के लिए अलग जमानत कानून बनाने एवं संशोधन पर विचार करने को कहा था। सर्वोच्च अदालत की इस टिप्पणी के बाद कांग्रेस ने यह संकेत दिया है कि जिन राज्यों में उसकी सरकार है, वहां संशोधन के जरिए जमानत कानून को उदार बनाया जाएगा।

मंगलवार को कांग्रेस की ओर से संकेत दिया गया है कि पार्टी शासित राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में संशोधन लाकर जमानत कानून को उदार बनाने का  प्रयास किया जाएगा। कांग्रेस ने भाजपा पर यह आरोप लगाया कि भगवा पार्टी भय और नियंत्रण के जरिए शासन करने की कोशिश करती है। पार्टी के अनुसार इस बीच आईं सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां “बहुत आवश्यक मार्गदर्शन” कर रही हैं।

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता अभिषेक सिंघवी ने कहा कि हमने पिछले 7 सालों में सामान्य आधारों पर भी राजद्रोह, यूएपीए आदि जैसे कानूनों की गंभीर एवं संविधान के दायरे से बाहर कार्रवाई देखी है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र और कई राज्यों में भाजपा की सरकारें इस मामले में सबसे आगे रही हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि “कांग्रेस शासित राज्य, निश्चित रूप से, अपने संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत संशोधन अधिनियमित करने के लिए फ्री हैं। जो जमानत कानून को उदार बनाने के लिए कार्य करेंगे।” 

सिंघवी ने कहा कि कांग्रेस पार्टी का इरादा है कि संविधान के दायरे में रहकर कांग्रेस शासित राज्यों में SC के निर्देशानुसार इस कानून को उदार बनाया जाए।

इसके साथ ही सिंघवी ने सरकार पर न्यायपालिका को डराने, उसके काम में दखल देने और उसके फैसलों को प्रभावित करने का भी आरोप लगाया है।

बीते सोमवार(11 जुलाई) को सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि किसी कैदी को लगातार जेल में रखना और फिर बाद में बरी कर देना उसके प्रति ‘गंभीर अन्याय’ की श्रेणी में आएगा। अदालत ने केंद्र सरकार से कहा कि जमानत के मामलों को और सरल बनाने के लिए अलग से जमानत कानून बनाने पर केंद्र को विचार करना चाहिए।

बता दें कि देशभर की जेलों में कैदियों की संख्या और इनमें भी दो तिहाई से अधिक की विचाराधीन कैदी होने के मद्देनजर देश की सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार से इसपर विचार की सिफारिश की है। 

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि अगर यह नियम विशेष रूप से मना न करते हों तो दो सप्ताह में जमानत की याचिकाओं पर फैसला और छह सप्ताह में अग्रिम जमानत की याचिकाओं पर फैसला दे दिया जाना चाहिए।

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