दलाई लामा का जन्मदिन सार्थक विचारों के साथ मनाएगा संघ

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30 जून। दुनिया में तिब्बत के सर्वमान्य सर्वोच्च धर्मगुरु परम् पावन दलाई लामा के 86वें जन्मदिन को भारत तिब्बत समन्वय संघ (पंजीकृत) मनायेगा। तिब्बत से भारत सन 1959 में आकर यहीं बस जाने वाले इन 14वें दलाई लामा को पूरे विश्व में करुणा व शांति का धर्मदूत माना जाता है। नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित दलाई लामा की वजह से तिब्बत की स्वतंत्रता आंदोलन को ले कर तिब्बती एक जुट रहते हैं। इसलिए इनसे कम्युनिष्ट चीन चिढ़ता है और पुनर्जन्म से अवतार परम्परा वाले दलाई लामा में अपनी ओर से एक नया 15वां दलाई लामा बना के तिब्बती समुदाय पर थोपना चाहता है।

बीटीएसएस के ऑनलाइन कार्यक्रम के साथ पूर्वसंध्या पर होगी शुभ शुरुआत।
-तिब्बत पर बढ़ती वैश्विक जागरूकता व चीन के कोरोना-कुकर्म पर होगी चर्चा।

हालांकि कोरोना वायरस मामले में पूरी तरह चिन्हित दोषी चीन के विरुद्ध विश्व समुदाय में वातावरण बना है। ऐसे माहौल में परम पावन दलाई लामा मानवता के शांति दूत की तरह सबको शांति का संदेश दे रहे हैं। ऐसे महात्मा के जीवन से हम सबको प्रेरणा लेनी चाहिए। यही कारण है कि संघ परम् पावन दलाई लामा को अपने भारत का भी रत्न मानते हुए उनका जन्मदिन मनाता रहेगा। इस बार 5 जुलाई को उनके जन्मदिन की पूर्व संध्या पर संघ शाम 5 बजे से एक ऑनलाइन कार्यक्रम गूगल मीट के जरिये करेगा। संघ के राष्ट्रीय सह संयोजक (प्रचार व आईटी) व कार्यक्रम संयोजक अखिलेश पाठक ने बताया कि इसमें तिब्बती केंद्रीय विश्वविद्यालय, सारनाथ, वाराणसी के कुलपति प्रो गेशे गवांग सैमतेन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रीय प्रचार प्रमुख पदम सिंह, जय प्रकाश विवि, बिहार के पूर्व कुलपति प्रो हरिकेश सिंह, उत्तराखंड की ख्यातिलब्ध शिक्षाविद डॉ रश्मि त्यागी रावत व तिब्बती सरकार के इटको, नई दिल्ली के डिप्टी कोऑर्डिनेटर तेन्ज़िन जॉर्डन वक्ता के रूप में शामिल होंगे।

संघ के संयुक्त क्षेत्र के द्वि-क्षेत्र सह संयोजक व कार्यक्रम-समन्वयक विवेक सोनी ने कहा कि तिब्बत की स्वतंत्रता से सबसे बड़ा फायदा भारत को है, यह हर भारतीय को समझना चाहिए इसलिए अपने सभी भारतीयों को तिब्बती भाई-बहनों के साथ खड़े होना चाहिए। संघ खड़ा है और तिब्बत की स्वतंत्रता व कैलाश मानसरोवर की मुक्ति तक एक न एक दिन अवश्य पहुंचेगा। उन्होंने कहा कि इस कार्यक्रम में प्रतिभागी अवश्य बनें ताकि समझ सकें कि दलाई लामा आखिर भारतीय संस्कृति के किस प्रकार से अमूल्य व पवित्र धरोहर हैं।

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