रो-रोकर बहनें बोलीं-मोर भइया कहां चलो गऔ…, इकलौता चिराग बुझने से मां बेसुध

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कानपुर, उत्तर प्रदेश के महोबा जनपद में किसान के लिए खेत में खुदवाया गया बोरवेल इकलौते बेटे की कब्रगह बन गया। बोरवेल में गिरने से मासूम की मौत के बाद घर में करुण क्रंदन का शोर है तो मोहल्ले में मातम छाया हुआ है। इकलौता चिराग बुझने से मां और पिता बदहवास हैं, वहीं परिवारी और रिश्तेदारों के भी आंसू थम नहीं रहे हैं।

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महोबा जनपद के बुधौरा गांव में बोरवेल में गिरे मासूम बच्चे को करीब बीस घंटे बाद बाहर निकाला जा सका लेकिन उसकी मौत हो गई। मासूम की मौत से गांव में मातम छाया है और घरवालों का रो रोकर बुरा हाल हो रहा है।

यह हुई घटना

बुंदेलखंड के जनपद महोबा के कुलपहाड़ क्षेत्र में ग्राम बुधौरा में रहने वाले भगीरथ कुशवाहा ने खेत पर नलकूप के लिए बोरवल खुदवाया था। पानी न निकलने पर बोरवेल खुला पड़ा था। बुधवार को वह खेत पर गेहूं की फसल की सिंचाई के लिए पहुंचे थे, उनके साथ छह साल का छोटा बेटा घनेंद्र भी था। वह सिंचाई के काम में व्यस्त हो गए और इस बीच खेलते खलते घनेंद्र एक फीट की चौड़ाई वाले बोरवेल में गिर गया। घटना की जानकारी होते ही गांव में अफरा तफरी मच गई। पूरे गांव से लोग खेत पर जमा हो गए और पुलिस भी आ गई। दोपहर करीब तीन बजे से डीएम के नेतृत्व में पुलिस, प्रशासन और दमकल टीम ने बच्चे को बोर वेल से निकालने का प्रयास शुरू किया लेकिन देर शाम तक सफल नहीं हो सके।

इसके बाद लखनऊ से एसडीआरएफ की टीम बुलाई गई। बोर वेल में नली डालकर बच्चे को ऑक्सीजन दी गई और शुरुआत में बिस्कट और पानी भी डाला गया। देर शाम जब बच्चे की आवाज सुनाई देनी बंद हो गई तो सभी की चिंता और बढ़ गई। लोग भगवान से बच्चे के सकुशल बाहर आने की प्रार्थना करने लगे। देर रात करीब 12 बजे एसडीआरएफ टीम पहुंची और बच्चे काे निकालने का प्रयास शुरू किया। पूरी रात चले रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद सुबह करीब पौने नौ बजे बच्चे को बाहर निकाला लेकिन उसकी जान नहीं बचाई जा सकी।

बच्चे की मौत की खबर मिलते ही कुलपहाड़ के गांव में मातम छा गया। माता-पिता रो-रोकर बेसुध हो गए। पिता भागीरथ ने बताया कि घनेंद्र होनहार था लेकिन अभी स्कूल जाना शुरू नहीं किया था। दो बेटियों के बाद घनेंद्र का जन्म हुआ था, वह उनका इकलौता चिराग था। प्राथमिक तक की शिक्षा यहां दिलाने के बाद उसे शहर में पढ़ाने का सपना था। वह उसे पढ़ाकर बड़ा अधिकारी बनाना चाहते थे। इकलौते बेटे की मौत के बाद मां क्रांति बार-बार बेहोश हो रही हैं। उन्हें अभी भी विश्वास नहीं हो रहा कि कलेजे का टुकड़ा अब इस दुनिया में नहीं है।

मोर भाइया कहां चलो गौ

बहन आठ वर्षीय रेखा और तीन साल की छोटी का भी रो रोकर बुरा हाल है। बड़ी बहन रेखा बार-बार यही कह रही है, मोर भइया कहां चलो गौ, अब राखी कइके बंधि हौं, वहां मौजूद नाते रिश्तेदार उसे समझाते रहे। पूरी रात दोनों बहनों को कैंप में अधिकारियों ने परिवार के साथ सुरक्षित रखा। उनके खाने आदि की व्यवस्था भी की गई थी।

काश हाथ न छोड़ा होता

बड़ी बहन रेखा को अफसोस है कि उसने अपने मासूम भाई का हाथ छोड़ कर उसे अकेले खेलने क्यों जाने दिया। पिता-माता के साथ तीनों बच्चे बुधवार सुबह ही खेत पर प्रतिदिन की तरह पहुंच गए थे। वहां तीनों बच्चे खेल रहे थे। माता-पिता गेहूं की फसल में पानी सिंचाई करवा रहे थे। इधर खेलते हुए बच्चा कब बोरवेल के पास जा पहुंचा इस पर किसी की भी नजर नहीं गई।

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